कहते हैं कि रणभूमि तैयार कोई और करता है और फतेह कोई और हासिल करता है. तमिलनाडु चुनाव में विजय की जीत के बाद यही कहा जा रहा है. सुपरस्टार विजय की पार्टी TVK ने 108 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रहे हैं, सीएम बनने जा रहे हैं. विजय की जीत को तमिलनाडु की राजनीति का नया सूरज कहा जा रहा है. चारों तरफ शोर विजय के करिश्मे का, चारों ओर चर्चा विजय की लेकिन इसी सब में एक चर्चा हो रही है बीजेपी के धाकड़ नेता के अन्नामलाई की. चुनाव में तो अन्नामलाई कहीं थे नहीं. चुनाव तक नहीं लड़े लेकिन विजय की जीत का क्रेडिट अन्नामलाई को दिया जा रहा है.
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कुप्पुस्वामी अन्नामलाई कर्नाटक कैडर का वो आईपीएस अधिकारी जिसने आईपीएस छोड़कर राजनीति चुनी, जिसने चप्पे-चप्पे तक पैदल पहुंचकर बीजेपी के पक्ष में और डीएमके के खिलाफ माहौल बनाया. इसरा सारा फायदा बीजेपी और अन्नामलाई को मिलना था. अन्नामलाई कतई नहीं चाहते थे कि बीजेपी AIADMK के साथ अलायंस करे लेकिन पार्टी में किसी ने उनकी नहीं सुनी. बस यही अनसुनी विजय के लिए संजीवनी बन गई.
विजय की झोली में अन्नामलाई की मेहनत का फल
अब विजय महफिल लूट ले गए तो कहा जा रहा है कि अन्नामलाई की मेहनत का पका हुआ फल विजय की झोली में गिरा. बीजेपी ताकती रह गई. अन्नामलाई चुपचाप अपनी मेहनत को टीवीके के वोट बैंक में बदलता देखते रहे. सवाल ये है कि अगर मेहनत अन्नामलाई की थी, तो जीत का सेहरा विजय के सिर कैसे बंधा? इसके पीछे छिपी है वो कहानी जिसे कोई नहीं बता रहा.
अन्नामलाई ने सालों तक जनता को ये समझाया कि DMK और AIADMK के अलावा भी एक विकल्प मुमकिन है. उन्होंने जनता के मन से द्रविड़ पार्टियों का डर निकालने का काम किया. लेकिन जब चुनाव आए, तो समीकरण बदल गए. जनता के तीसरे विकल्प के तौर पर विजय का नाम छाप दिया. विजय ने उसी 'नए चेहरे' और 'तीसरी शक्ति' वाली छवि को लपका जिसे अन्नामलाई ने बनाया था. लोगों ने द्रविड़ पार्टियों के विकल्प के रूप में TVK को चुना, क्योंकि अन्नामलाई ऐन वक्त पर बीजेपी के स्टेज, पोस्टर से गायब थे.
आईपीएस की नौकरी राजनीति में आए अन्नामलाई
इंजीनियरिंग और IIM लखनऊ से MBA करने वाले अन्नामलाई ने कर्नाटक कैडर के एक सख्त IPS अधिकारी के रूप में पहचान बनाई थी. आप जिस तरह से चीजें अपने लिए प्लान करते हैं जरुरी नहीं तो जिंदगी वैसे ही चले. इंडियन पुलिस सर्विस आईपीएस छोड़कर राजनीति में आए अन्नामलाई कुप्पुस्वामी के साथ बिलकुल ऐसा ही हुआ. उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि आईपीएस की नौकरी छोड़कर राजनीति और जिस पार्टी में आ रहे हैं उसमें चीजें एक दिन एकदम खिलाफ होती जाएंगी. इतनी खिलाफ कि एक दिन चुनाव लड़ना तक मुश्किल हो जाएगा.
बीजेपी में शामिल होने के बाद आक्रामक शैली से तमिलनाडु में बीजेपी को मुख्य विपक्षी आवाज बना दिया. पिछले 3 सालों में अन्नामलाई ने वो किया जो पिछले 50 साल में कोई गैर-द्रविड़ नेता नहीं कर पाया. उन्होंने DMK के खिलाफ जो 'सत्ता विरोधी लहर' तैयार की थी. उनकी मेहनत ने बीजेपी को चर्चा में ला दिया.
भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ नैरेटिव सेट
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए 2023-24 में तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर एन मन, एन मक्केल यानी मेरी मिट्टी, मेरे लोग पदयात्रा की थी. जमीनी स्तर पर DMK के खिलाफ भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ नैरेटिव सेट किया. एक नेता के तौर पर जो कर सकते थे वो सब किया. बस कसर ये रह गई कि बहुत शोर के बाद भी 2024 के लोकसभा चुनाव में भी तमिलनाडु में बीजेपी का खाता नहीं खुला. वहीं अन्नामलाई की मेहनत का वजन अपनी ही पार्टी में कम होने लगा. अन्नामलाई साइडलाइन होते चले गए.
अन्नामलाई की मेहनत का फायदा बीजेपी को उसकी पॉलिसी के चलते नहीं मिला. पार्टी ने पुराने गठबंधन AIADMK के साथ नहीं होने में रिस्क देखा. अन्नामलाई की ताबड़तोड़ बलि देकर बीजेपी ने AIADDMK से अलायंस किया.
अन्नामलाई ने विजय के राजनीति में आने का स्वागत किया था, लेकिन कई सवालों के साथ. विजय की विचारधारा को ऐसी खिचड़ी राजनीति का नाम दिया जिसमें रसम, सांबर, दही सब मिला दिया गया हो. मजाक उड़ाते थे कि राजनीति पार्ट-टाइम काम नहीं जो फिल्म के सेट से चले. वर्क फ्रॉम होम पॉलिटिक्स, वीकेंड पर एक्टिव होने वाला नेता तक कहा. हो सकता है वो भी विजय की लहर भांपने में चूक कर गए हों या सब जानते हुए भी विपक्ष की ड्यूटी करने के लिए कह रहे हों.
चुनाव के बाद अन्नामलाई ने विजय को दी बधाई
चुनाव नतीजों के बाद खुद अन्नामलाई ने विजय को बधाई देते हुए इसे वंशवाद की राजनीति और वोट खरीदने की प्रथा के खिलाफ जनादेश कहा है. उन्होंने इसे वह 'जेनरेशन चेंज माना है जिसके लिए वो पहले दिन से जूते घिस रहे थे. चुनाव के समय बीजेपी के गठबंधन समीकरणों और लापता होने से विजय उस खाली जगह को भरने में सफल रहे.
चुनाव 360 घूमा तो लोगों को याद करने का मौका मिला कि अन्नामलाई ने पिच तैयार की, घास काटी, रोलर चलाया, लेकिन जैसे ही मैच शुरू हुआ, बैटिंग के लिए विजय मैदान में उतर गए. जो युवा अन्नामलाई के साथ 'परिवर्तन' के नारे लगा रहे थे, उन्हें विजय के रूप में नया चेहरा मिला. लोगों को जो नया चेहरा चाहिए थे वो अन्नामलाई दे सकते थे लेकिन बीजेपी के AIADMK की ओर झुकाव के कारण अन्नामलाई देने की स्थिति में नहीं रहे. लोगों ने विजय के रूप में एक 'फ्रेश स्टार्ट' दिखा. अन्नामलाई की 'एंटी-इन्कंबेंसी' लहर पर सवार होकर विजय ने वो जादुई आंकड़ा छू लिया जो बीजेपी के लिए आज भी सपना बना है.
पुरजोर चर्चा हुई कि तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के खिलाफ बीजेपी को स्थापित करने वाला हनुमान अन्नामलाई ही होंगे. डीएमके के साथ AIADMK को भी रगड़ा. जयललिता के शासन में करप्शन का मुद्दा बनाया. पलानीस्वामी को 'अनपढ़' और 'ट्रेटर' तक करार दिया. ये तक बोला कि पलानीस्वामी ने सबसे ऊंची बोली लगाकर सीएम का पद हासिल किया था. ये सब पलानीस्वामी डायरी में नोट करते रहे. जब अमित शाह अलायंस करने आए तब सारा बदला चुकता कर दिया. AIADMK चीफ ईपीएस पलानीस्वामी अन्नामलाई को कतई पसंद नहीं करते थे. बीजेपी के साथ अलायंस की शर्त के तौर पर उन्होंने अन्नामलाई के सारे पर कतरवा दिए.
विजय मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर बढ़ रहे हैं
शायद सीधे पुलिस सर्विस से अन्नामलाई राजनीति में आए थे इसलिए पार्टी उनकी फिलॉसफी पर यकीन नहीं कर पाई कि बीजेपी को अपने दम पर खड़ा होना चाहिए. लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उनकी बात मान ली लेकिन वो बैकफायर कर गया. बीजेपी को वोट शेयर 10 के पार हो गया. इसका क्रेडिट अन्नामलाई को गया लेकिन चुनाव में वोट शेयर तब मायने नहीं रखती जब सीटें न मिलें. चुनाव में हार ने उनको हवा हवाई का नेता बना देना जिसके लिए पार्टी अपनी चुनावी संभावनाएं दांव पर लगाने के लिए तैयार नहीं है अब.
आज भले ही विजय मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह रहेगा कि इस जीत की नींव अन्नामलाई के जूतों के घिसे हुए तलवों और उनके पसीने से रखी गई थी. ये जीत सिर्फ विजय की नहीं, बल्कि उस बदलाव की है जिसका बिगुल अन्नामलाई ने फूंका था. क्या आपको भी लगता है कि अन्नामलाई के बिना विजय की ये जीत मुमकिन नहीं थी? अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताएं और तमिलनाडु की राजनीति की हर अपडेट के लिए जुड़े रहें हमारे साथ.
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