पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है और अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण पर हैं. इस बीच, न्यूज तक के खास कार्यक्रम 'साप्ताहिक सभा' में तक चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर और सी-वोटर के फाउंडर यशवंत देशमुख के बीच बंगाल चुनाव को लेकर कई चर्चाएं हुई. यशवंत देशमुख ने चुनाव के रुझानों और रणनीतियों का एनालिसिस करते हुए बताया है कि बंगाल की सत्ता की चाबी किसके हाथ में है. उनके मुताबिक, इस बार का चुनाव महिलाओं के टर्न आउट और मुस्लिम वोट बैंक के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है. आइए जानते है पूरी बात.
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महिलाओं का टर्न आउट तय करेगा नतीजा
यशवंत देशमुख के अनुसार, बंगाल में पिछले 15 सालों से महिलाओं का झुकाव ममता बनर्जी की ओर रहा है. उन्होंने कहा, 'अगर मतदान में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा रहती है, तो यह ममता बनर्जी के लिए एक नेचुरल एडवांटेज होगा.' उन्होंने बताया कि बीजेपी ने इस बार अपनी पूरी ताकत महिलाओं के वोट बैंक को भेदने में लगा दी है, क्योंकि जब तक वे महिला वोटरों को ममता से दूर नहीं करेंगे, उनके लिए बड़ी जीत मुश्किल है.
'ममता के पास महिला और मुस्लिम, दोनों का साथ'
एनालिसिस के दौरान यह बात सामने आई कि मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. यशवंत ने कहा कि बीजेपी ने हिंदू-मुस्लिम पोलराइजेशन की कोशिश की, लेकिन वह मुख्य रूप से पुरुष मतदाताओं तक ही सीमित रही. हिंदू महिलाएं अभी भी ममता बनर्जी के पक्ष में दिख रही हैं, जिसके कारण बीजेपी का पूर्ण ध्रुवीकरण का फॉर्मूला वहां उस तरह काम नहीं कर पाया जैसा असम में दिखा था.
सुरक्षा बनाम लाभार्थी योजनाएं
चुनाव प्रचार अब सुरक्षा और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के बीच की जंग बन गया है. ममता बनर्जी जहां कन्याश्री और लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं को सीधे आर्थिक लाभ पहुंचा रही हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी सुरक्षा, सिंडिकेट राज खत्म करने और ₹3000 देने का वादा कर रहे हैं. यशवंत देशमुख का मानना है कि जो पैसा अकाउंट में आ रहा है, उसका असर वादों से ज्यादा होता है, जो ममता को मजबूती देता है.
'दीदी से नहीं, कैडर से है नाराजगी'
ग्राउंड रिपोर्ट का हवाला देते हुए यशवंत ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया कि बंगाल की महिलाओं को ममता बनर्जी से व्यक्तिगत रूप से कोई बड़ी नाराजगी नहीं है, बल्कि उनकी नाराजगी टीएमसी के नीचे के कैडर और उनकी कथित गुंडागर्दी से है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने भाषणों में इसी 'दुखती रग' पर हाथ रखा है, जहां वे अपराध को सीधे टीएमसी कैडर से जोड़ रहे हैं.
क्या ओड़िशा जैसा चमत्कार होगा?
यशवंत ने ओड़िशा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां नवीन पटनायक व्यक्तिगत रूप से बहुत लोकप्रिय थे, फिर भी वे हार गए क्योंकि जनता निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से नाराज थी. बंगाल में भी मुकाबला इसी तरह का है, एक तरफ ममता की व्यक्तिगत लोकप्रियता है और दूसरी तरफ उनके संगठन के खिलाफ असंतोष. अब देखना यह होगा कि 4 मई को नतीजे किसके पक्ष में आते हैं.
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