कौन हैं सतलुज फिल्म के असली हीरो जसवंत सिंह खालड़ा, जिनपर बनी फिल्म को Zee5 से हटाया गया, जानें पूरा विवाद

न्यूज तक डेस्क

06 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 6 2026 1:22 PM)

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को रिलीज के महज दो दिन बाद ही OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दिया गया है.

जसवंत सिंह खालड़ा
जसवंत सिंह खालड़ा
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पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर दिलजीत दोसांझ की एक फिल्म की काफी चर्चा हो रही है. इस फिल्म का नाम है सतलुज जो कि  लंबे इंतजार के बाद 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई थी लेकिन रिलीज के दो दिन बाद ही  3 जुलाई को इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दिया है. ये फिल्म पंजाब के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित है. लोगों को काफी पसंद भी आ रही थी यही वजह है कि अब लोग सोशल मीडिया पर सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से क्यों हटाया गया. 

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वहीं फिल्म को अचानक हटाए जाने के बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर एक बयान जारी किया. प्लेटफॉर्म ने दर्शकों से मिले प्यार के लिए आभार जताते हुए कहा, "इस फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त समर्थन मिला है. हम इस फिल्म और इसके क्रिएटिव विजन के साथ मजबूती से खड़े हैं. हालांकि, अगले आदेश तक यह फिल्म भारत में उपलब्ध नहीं होगी लेकिन हम इसे जल्द से जल्द वापस लाने के लिए सभी कानूनी और उचित विकल्पों पर काम कर रहे हैं."

इतना ही नहीं फिल्म में लीड रोल में नजर आ रहें दिलजीत दोसांझ ने भी इस पर अपना रिएक्शन दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "अब ये फिल्म रुकने वाली नहीं है. खालड़ा साहब की आवाज को कोई दबा नहीं सकता."

कौन हैं जसवंत सिंह खालड़ा

जसवंत सिंह खालड़ा कोई पेशेवर एक्टिविस्ट नहीं थे. वे अमृतसर के सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर के पद पर काम करने वाले एक आम इंसान थे. लेकिन साल 1992 में उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल दिया. पुलिस ने उनके बैंक के सहकर्मी पियारा सिंह को गिरफ्तार किया और कुछ ही दिनों बाद खबर आई कि उन्हें एक एनकाउंटर में मार गिराया गया है. हैरानी की बात ये थी कि पुलिस ने अमृतसर के दुर्गियाना मंदिर श्मशान घाट में पियारा सिंह का अंतिम संस्कार 'लावारिस' बताकर गुपचुप तरीके से कर दिया था. मल्लिका कौर की किताब 'Faith, Gender, and Activism in The Punjab Conflict' में दर्ज परमजीत कौर (खालड़ा की पत्नी) के बयानों के मुताबिक, जब जसवंत इस सच का पीछा करते हुए श्मशान घाट पहुंचे तो वहां के कर्मचारियों से उन्हें पता चला कि पुलिस रोज वहां 8 से 10 ऐसी लाशें लाती है.

खालड़ा ने अकाली दल की ह्यूमन राइट्स विंग के चेयरमैन जसपाल सिंह ढिल्लों के साथ मिलकर जब रिकॉर्ड्स और रजिस्टरों को खंगालना शुरू किया तो आंखें फटी की फटी रह गईं. सिर्फ साल 1992 में एक ही श्मशान घाट पर 300 से ज्यादा बेनाम शव जलाए गए थे.

25 हजार लापता युवाओं का वो सनसनीखेज दावा

इस खोजबीन के बाद जसवंत सिंह खालड़ा ने अमृतसर नगर निगम के आधिकारिक दस्तावेजों के हवाले से एक ऐसा दावा किया जिसने देश-दुनिया को चौंका दिया. उन्होंने कहा कि 1984 से 1994 के बीच पंजाब से लगभग 25 हजार सिख युवा रहस्यमयी ढंग से गायब हुए हैं. उन्होंने सबूतों के साथ बताया कि पुलिस ने करीब 2000 युवाओं को लावारिस या अज्ञात घोषित करके उनका अंतिम संस्कार कर दिया या उनकी लाशें नदियों में बहा दीं. इस बात की पुष्टि पॉलिटिकल एक्टिविस्ट राम कुमार नारायण ने ऑस्ट्रेलियन डॉक्यूमेंट्री 'India Who Killed The Sikhs' में भी की थी, जहां उन्होंने बताया था कि पुलिस अक्सर पैसों के लिए नौजवानों को उठाती थी, झूठे केस बनाती थी और रिहाई के बदले लाखों की फिरौती मांगती थी.

दिनदहाड़े अपहरण और इंसाफ की लंबी लड़ाई

जसवंत सिंह खालड़ा का यह खुलासा सीधे पुलिस और सिस्टम पर उंगली उठा रहा था, इसलिए वे कई बड़े अधिकारियों के निशाने पर आ गए. सितंबर 1995 में जब वे अपने घर के बाहर कार धो रहे थे. तब दिनदहाड़े कुछ लोगों ने उन्हें अगवा कर लिया. साल 1996 में जब मामला सीबीआई (CBI) के पास गया तो जांच में साफ हुआ कि खालड़ा को तरनतारन पुलिस स्टेशन में गैर-कानूनी तरीके से बंधक बनाकर रखा गया था. discoversikhism की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरी साजिश एसएसपी अजीत सिंह संधू के इशारे पर रची गई थी और इसकी देखरेख डीएसपी जसपाल सिंह कर रहे थे (बाद में अजीत सिंह संधू ने खुद की जान ले ली थी). सालों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने इस अपहरण और हत्या में शामिल दोषी पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई

कनाडा में दिया गया वो आखिरी संदेश

अपनी मौत से कुछ समय पहले 1995 में कनाडा के एक कार्यक्रम में जसवंत सिंह खालड़ा ने कहा था, "अब मुझे पूरा विश्वास है कि जब अंधेरा अपनी पूरी ताकत से सच्चाई को मिटाने की कोशिश करेगा, तो कुछ और नहीं तो मैं यही कहूंगा कि 'अणखीला पंजाब' (स्वाभिमानी पंजाब) वह रोशनी है जो उसे चुनौती देगी और मैं उस गुरु से प्रार्थना करता हूं जो सच्चाई का प्रतीक है, कि वह इस रोशनी को हमेशा जलाए रखे."

पंजाब 95 से सतलुज बनने का सफर

यह पहली बार नहीं है जब इस फिल्म को लेकर कोई विवाद हुआ है. असल में इस फिल्म का शुरुआती नाम 'पंजाब 95' था और इसकी रिलीज का रास्ता शुरू से ही कांटों भरा रहा है. फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने पहले BBC की एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि सेंसर बोर्ड (CBFC) ने इस फिल्म पर कड़ा रुख अपनाया था. शुरुआती दौर में बोर्ड ने फिल्म में 21 कट लगाने को कहा था, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 120 से पार हो गई. त्रेहन के मुताबिक, सेंसर बोर्ड ने फिल्म से जसवंत सिंह खालड़ा का नाम तक हटाने की मांग कर दी थी, जो कि फिल्म के मुख्य किरदार हैं. निर्देशक का कहना था कि बिना किसी ठोस वजह के इतने सारे कट लगाना उनकी समझ से परे था और वे अपनी बात के लिए न्यायपालिका तक जाने को तैयार थे. तमाम अड़चनों के बाद फिल्म का नाम बदलकर 'सतलुज' किया गया और इसे बिना किसी कट के ओटीटी पर रिलीज करने की बात कही गई थी, लेकिन अब यह फिर से होल्ड पर चली गई है.

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