खत्म हो गया अशोक तंवर का जलवा? खाली हाथ बीता साल 2025! कांग्रेस में वापसी के बाद न पद मिला न सम्मान!

Ashok Tanwar: अशोक तंवर के लिए कांग्रेस में वापसी घाटे का सौदा साबित हुई है. 2024 चुनाव से पहले बीजेपी छोड़ने वाले तंवर को 2025 में न तो पार्टी में पद मिला और न ही सम्मान. हुड्डा के साथ पुरानी प्रतिद्वंद्विता और गुटबाजी के कारण वह फिलहाल हरियाणा की राजनीति में हाशिए पर हैं.

Ashok Tanwar
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न्यूज तक डेस्क

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Ashok Tanwar: अशोक तंवर ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में वापसी की थी. उस समय कयास लगाए जा रहे थे कि कांग्रेस की लहर है और सरकार बनते ही तंवर को बड़ा पद मिलेगा. लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया. न तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी और न ही पार्टी के भीतर तंवर को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली. वर्तमान में वह पार्टी में पूरी तरह साइलेंट नजर आ रहे हैं.

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पार्टी के भीतर बढ़ी दूरियां

कांग्रेस में वापसी के बाद से ही तंवर गुटबाजी और भ्रम की स्थिति में फंसे दिख रहे हैं. जहां एक ओर कांग्रेस के अपने अलग-अलग धड़े ताकत दिखा रहे हैं, वहीं तंवर किसी भी खेमे में फिट नहीं बैठ पा रहे हैं.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उन्होंने जल्दबाजी में बीजेपी छोड़कर अपनी जमी-जमाई सियासत को खुद ही संकट में डाल लिया है. आज आलम यह है कि कांग्रेस की अहम बैठकों और नीतिगत फैसलों में भी उनकी राय शुमारी नहीं ली जा रही.

पगड़ी पॉलिटिक्स और हुड्डा से पुरानी अदावत

अशोक तंवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बीच का विवाद किसी से छिपा नहीं है. एक दौर था जब हरियाणा कांग्रेस में "पगड़ी पॉलिटिक्स" चरम पर थी. हुड्डा के समर्थक गुलाबी और तंवर के समर्थक लाल पगड़ी में नजर आते थे. दोनों नेताओं के बीच की यह जंग रैलियों के मंच से लेकर सड़कों तक दिखती थी. साल 2018 में जहां हुड्डा 'रथ यात्रा' निकाल रहे थे, वहीं तंवर 'साइकिल यात्रा' के जरिए शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे. यह पुरानी कड़वाहट आज भी उनकी राह का कांटा बनी हुई है.

कौन हैं अशोक तंवर?

झज्जर के एक किसान परिवार में जन्मे अशोक तंवर ने जेएनयू छात्र संघ से अपनी राजनीति शुरू की थी. वह भारतीय युवा कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने और साल 2009 में सिरसा से सांसद चुनकर दिल्ली पहुंचे. हालांकि, 2014 की हार और संगठन के भीतर मतभेदों के कारण उन्होंने 2019 में कांग्रेस को अलविदा कह दिया था. इसके बाद उन्होंने AAP, TMC और BJP का सफर तय किया, लेकिन आखिर में कांग्रेस की शरण में आए.

बीजेपी में होते तो शायद हालात अलग होते?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर तंवर बीजेपी में बने रहते, तो उन्हें एक बड़े दलित चेहरे के तौर पर कोई महत्वपूर्ण संवैधानिक पद या संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती थी. लेकिन कांग्रेस में वापसी के बाद उन्हें 'वेटिंग लिस्ट' में डाल दिया गया है. साल 2025 में उनकी राजनीतिक चुप्पी यह संकेत दे रही है कि फिलहाल उनके लिए कांग्रेस के भीतर अनुकूल परिस्थितियां नहीं हैं.

 

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