'वह एक प्योर सोल था, हम साथ में...', दिल्ली हादसे में जान गंवाने वाले CA विवेक को याद कर रो पड़े दोस्त

दिल्ली के मालवीय नगर में लगी भीषण आग में गुरुग्राम के चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) विवेक अग्रवाल, उनकी पत्नी और दो बेटियों की दर्दनाक मौत हो गई.विवेक अपने बीमार पिता की देखरेख के लिए दिल्ली गए थे. इस दर्दनाक हादसे से गुरुग्राम में मातम पसरा है और लचर व्यवस्था के खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश है.

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न्यूज तक डेस्क

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दिल्ली के मालवीय नगर में हुए एक दर्दनाक अग्निकांड ने गुरुग्राम के एक हंसते-खेलते परिवार को हमेशा के लिए खत्म कर दिया. गुरुग्राम के रहने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) विवेक अग्रवाल, उनकी पत्नी तर्जनी और उनकी दो मासूम बेटियों की इस भीषण आग में झुलसने से मौत हो गई. इस हादसे के बाद से विवेक के दोस्तों, करीबियों और पूरे इलाके में मातम पसरा हुआ है. हर आंख नम है और लोग इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि पूरा का पूरा परिवार अब इस दुनिया में नहीं रहा.

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बुजुर्ग पिता की तीमारदारी के लिए गया था परिवार

बताया जा रहा है कि विवेक अग्रवाल के बुजुर्ग पिता दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हैं. पिता की बीमारी और उनकी देखरेख के लिए विवेक अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ दिल्ली गए हुए थे. किसे पता था कि पिता की सेवा में जुटा यह परिवार खुद एक ऐसी भीषण लापरवाही का शिकार हो जाएगा, जहां से कोई वापस नहीं लौट पाएगा. अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे बुजुर्ग पिता को अभी भी इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनका पूरा संसार उजड़ चुका है.

रो पड़े दोस्त, बोले- 'वह एक प्योर सोल था'

हरियाणा तक से बातचीत करते हुए विवेक अग्रवाल के पड़ोसी और बेहद करीबी दोस्त (जिनका नाम भी विवेक है) बेहद भावुक हो गए. उन्होंने नम आंखों से बताया, "विवेक बहुत अच्छा इंसान था, वह एक प्योर सोल था. हम लोग बहुत अच्छे मित्र थे. हम दोनों साथ में मॉर्निंग वॉक और साइकिलिंग करते थे. उसकी पत्नी तर्जनी भी बेहद मिलनसार थीं और दोनों बच्चियां बहुत प्यारी थीं. हमारे पास शब्द नहीं हैं कि इस दुख को कैसे बयां करें. पूरा हंसता-खेलता परिवार एक झटके में चला गया."

व्यवस्था के खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश

इस दर्दनाक हादसे के बाद मृतकों के शव जब गुरुग्राम पहुंचे, तो वहां का माहौल गमगीन होने के साथ-साथ गुस्से से भर गया. स्थानीय लोगों में प्रशासन और लचर व्यवस्था के खिलाफ भारी आक्रोश है. लोगों का कहना है कि हर बार इस तरह की बड़ी लापरवाही मासूमों की जान ले लेती है, लेकिन प्रशासन सिर्फ पल्ला झाड़ने का काम करता है. व्यवस्थाओं में कोई सुधार नहीं होता, जिसके कारण आए दिन ऐसे लाक्षागृहों में मासूम लोग अपनी जान गंवाते हैं.

 

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