हरियाणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पार्टी की एक अहम बैठक के दौरान कांग्रेस की अंदरूनी कड़वी वास्तविकता को खुलकर सबके सामने रख दिया है. सुरजेवाला ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा का जिक्र करते हुए पार्टी संगठन और चुनावी प्रदर्शन पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि जब तक हम अपनी कमियों और जमीनी सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक चुनावी राजनीति का हल ढूंढना नामुमकिन होगा. सुरजेवाला ने इस दौरान इतिहास के आंकड़ों का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश की कि कांग्रेस का हरियाणा में चुनावी रिकॉर्ड उतना मजबूत नहीं रहा है जितना दावा किया जाता है.
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सत्ता के बिना सामाजिक बदलाव मुमकिन नहीं
रणदीप सिंह सुरजेवाला ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि बिना सत्ता में आए किसी भी कार्यक्रम या नीतियों का क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर पार्टी सामाजिक बदलाव और कोई बड़ी तब्दीली लाना चाहती है, तो उसके लिए सत्ता का होना एक कड़वी लेकिन सबसे बड़ी वास्तविकता है. सुरजेवाला ने मंच पर मौजूद संजय जी को संबोधित करते हुए कहा कि हरियाणा के गठन के बाद से बीते 56 वर्षों के इतिहास में एक ऐसी सच्चाई भी है, जिसे स्वीकार करने से अक्सर नेता और कार्यकर्ता एक-दूसरे के सामने गुरेज करते हैं.
56 साल के इतिहास में कांग्रेस सिर्फ तीन बार जीती
पार्टी के इतिहास पर बात करते हुए सुरजेवाला ने कहा कि साल 1966-67 में हरियाणा बनने के बाद से लेकर अब तक के 56 सालों में कांग्रेस अपने दम पर केवल तीन बार ही पूर्ण बहुमत का चुनाव जीत सकी है. उन्होंने अतीत के चुनावों की याद दिलाते हुए मंच पर बैठे भूपेंद्र सिंह हुड्डा की तरफ इशारा किया और कहा कि हुड्डा साहब को भी याद होगा कि साल 1972 के चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला था, तब संभवतः 48 सीटें आई थीं. इसके बाद कांग्रेस साल 1977, 1982 और 1987 के चुनावों में लगातार हारती रही.
चुनावी आंकड़ों का दिया पूरा ब्योरा
सुरजेवाला ने आगे के आंकड़े गिनाते हुए बताया कि साल 1972 के बाद कांग्रेस सीधे 1991 के चुनाव में जीती, जब पार्टी को 51 या 52 सीटें हासिल हुई थीं. इसके बाद अगला बड़ा चुनावी मुकाबला कांग्रेस ने साल 2005 में जीता, जब पार्टी रिकॉर्ड 67 सीटों के साथ सत्ता में आई थी. उन्होंने स्पष्ट किया कि 2005 के बाद से कांग्रेस अपने बूते कोई चुनाव नहीं जीत पाई है. हालांकि, बीच में कभी कुछ निर्दलीय या अन्य साथी विधायकों को साथ लाकर या लड़ाकर जोड़-तोड़ से सरकारें जरूर बना ली गईं, लेकिन वास्तविक जीत सिर्फ तीन ही रही है. उन्होंने कहा कि हर कार्यकर्ता और नेता को इस हकीकत को पहचानना होगा.
दीपेंद्र हुड्डा का जिक्र कर कसा तंज
सुरजेवाला ने अपने संबोधन में पूर्व सांसद और हुड्डा के बेटे दीपेंद्र हुड्डा का विशेष रूप से जिक्र किया. उन्होंने कहा कि वह अपने छोटे भाई दीपेंद्र का बहुत आदर करते हैं, लेकिन वह अक्सर यह कहते रहते हैं कि हमारे पास 60 सांसद-विधायक (एमपी-एमएलए) आ गए थे, तो फिर हम चुनाव क्यों नहीं जीते. सुरजेवाला ने इस दावे पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आप भले ही कहते रहो कि 60 आए थे, चाहे 600 और ले आओ, उससे क्या फर्क पड़ेगा, क्योंकि आखिर में सरकार बनाने के लिए तो 46 विधायक ही आने चाहिए.
प्रभारियों की नाकामी की ओर किया इशारा
रणदीप सुरजेवाला ने पिछले चुनावों में वोट शेयर के दावों को भी खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि हम भले ही यह दावा करते रहें कि हमारा वोट प्रतिशत सबसे ज्यादा आया है, लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि विधायक केवल 37 ही बनकर आए. सुरजेवाला ने स्पष्ट किया कि वह इसके लिए किसी भी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार या ब्लेम नहीं कर रहे हैं, लेकिन जो जमीनी और कड़वी सच्चाई है, उससे मुंह मोड़ना किसी भी लिहाज से सही नहीं है. उन्होंने मंच पर बैठे प्रभारी को सचेत करते हुए यह भी कहा कि अगर वे भी इस सच्चाई से मुंह मोड़ेंगे, तो इससे पहले भी कई प्रभारी इसी तरह से यहां नाकामयाब होकर लौट चुके हैं.
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