महेंद्रगढ़: दिव्यांगता को मात देकर किसान के बेटे नीतीश ने फहराया परचम, UPSC में हासिल की 847वीं रैंक

UPSC success story: हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के खकखोटी कलां गांव के रहने वाले दिव्यांग युवक नीतीश कुमार ने कड़ी मेहनत और मजबूत हौसले के दम पर यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 847वीं रैंक हासिल कर अपने परिवार और जिले का नाम रोशन किया है. जानिए उनकी प्रेरणादायक सफलता की पूरी कहानी, संघर्ष, तैयारी की रणनीति और युवाओं के लिए उनका संदेश.

UPSC success story
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आशीष कुमार झा

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'मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है.' इस कहावत को हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के एक छोटे से गांव खकखोटी कलां के रहने वाले नीतीश कुमार ने सच कर दिखाया है. शारीरिक चुनौतियों और आर्थिक तंगी के बावजूद नीतीश ने देश की सबसे प्रतिष्ठित यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 847वीं रैंक हासिल कर अपने परिवार और प्रदेश का नाम रोशन किया है.

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पांचवें प्रयास में मिली बड़ी सफलता

नीतीश कुमार के लिए यह सफर आसान नहीं था क्योंकि यह उनका पांचवां प्रयास था. लगातार चार बार असफलता मिलने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत जारी रखी. अंततः पांचवें प्रयास में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 847 प्राप्त की. नीतीश की यह सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने बिना किसी बड़े शहर में जाकर कोचिंग लिए, घर पर रहकर ही ऑनलाइन माध्यम से यह मुकाम हासिल किया है.

डीसी की प्रेरणा ने बदली जिंदगी की राह

शुरुआत में नीतीश का रुझान सिविल सेवा की तरफ नहीं था और वह कानून (Law) की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन शारीरिक सीमाओं के कारण बाहर जाकर पढ़ाई करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी. इसी दौरान उनके स्कूल के एक वार्षिक कार्यक्रम में जिले की महिला उपायुक्त (DC) आई थीं. उन्हें देखकर नीतीश इतने प्रेरित हुए कि उन्होंने ठान लिया कि वह भी सिविल सेवा में जाएंगे और समाज के लिए कुछ करेंगे.

मां की ममता और पिता का संघर्ष

नीतीश के पिता श्रद्धानंद पेशे से किसान हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. नीतीश ने बताया कि बचपन में वह बिल्कुल ठीक थे, लेकिन 5 साल की उम्र में एक बीमारी के बाद उन्हें शारीरिक दिव्यांगता का सामना करना पड़ा. नीतीश की मां ने उन्हें गोद में उठाकर स्कूल पहुंचाया और हर कदम पर उनका साथ दिया. नीतीश कहते हैं कि वह अपनी मां के जीवन के संघर्षों को खत्म करना चाहते थे और यही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा थी.

अनुशासन और कड़ी मेहनत का मंत्र

अपनी तैयारी के बारे में बात करते हुए नीतीश ने बताया कि वह पूरी तरह अनुशासित होकर पढ़ाई करते थे. वह रोजाना करीब 10 से 11 घंटे पढ़ाई करते थे और उनका शेड्यूल काफी सख्त था. वह रात को 10 से 11 बजे के बीच सो जाते थे और सुबह जल्दी उठकर अपनी पढ़ाई शुरू कर देते थे. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल से पूरी की और इसके बाद पीजी कॉलेज से हिंदी विषय में एमए किया.

युवाओं के लिए बने मिसाल

नीतीश कुमार की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी या शारीरिक चुनौतियों के कारण अपने सपनों को छोड़ देते हैं. नीतीश के पिता ने गर्व से कहा कि उन्होंने कभी अपने बेटे को बोझ नहीं समझा और आज उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति ने उनकी मुराद पूरी कर दी है.

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