Shilu Balhara Wife Muskan death Case: अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी शीलू बल्हारा की पत्नी मुस्कान की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में एक नया मोड़ आया है. महम चौबीसी के फरमाना गांव में हुई महापंचायत के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया है. फरमाना की पंचायत ने शीलू बल्हारा और उनके परिवार को माफ करते हुए इसे शीलू के लिए 'जीवनदान' बताया है. हालांकि, पंचायत में माफी और समझौते के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या शीलू पर दर्ज दहेज हत्या का आपराधिक मुकदमा खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा?
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पंचायत की 4 शर्तें जिन्हें शीलू के परिवार ने माना
फरमाना गांव की पंचायत ने शीलू और उनके परिवार के सामने 4 मुख्य शर्तें रखीं, जिन्हें बहू अकबरपुर गांव और शीलू के परिवार ने स्वीकार कर लिया:
1. गांव में बना नया 450 गज का मकान शीलू के 9 महीने के बेटे हार्दिक के नाम किया जाएगा.
2. कबड्डी अकादमी के लिए ली गई 4 बीघा जमीन भी बेटे हार्दिक के नाम ट्रांसफर होगी.
3. शीलू को अपने बेटे हार्दिक के नाम ₹50 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करवानी होगी.
4. गांव में शीलू के हिस्से का प्लॉट भी हार्दिक के नाम दर्ज होगा.
क्या केवल पंचायत के समझौते से FIR रद्द हो सकती है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, नहीं. पंचायत में राजीनामा होने या शिकायतकर्ता के एफआईआर वापस लेने से मामला खुद-ब-खुद बंद नहीं होता. चूंकि यह मामला गैर-जमानती और गंभीर धाराओं (दहेज उत्पीड़न व हत्या) के तहत दर्ज है, इसलिए इसकी एक पूरी कानूनी प्रक्रिया है:
पुलिस जांच: डीएसपी (DSP) स्तर के अधिकारी मामले की निष्पक्ष जांच करते हैं और अपनी विस्तृत रिपोर्ट एसपी (SP) को सौंपते हैं.
मजिस्ट्रेट के सामने पेशी: यह पूरी जांच रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश की जाएगी.
शिकायतकर्ता के बयान: मजिस्ट्रेट व्यक्तिगत रूप से शिकायतकर्ता (मुस्कान के पिता सुखबीर) को बुलाकर पूछेंगे कि क्या वे बिना किसी दबाव या डर के शिकायत वापस ले रहे हैं.
पुनः जांच का अधिकार: यदि मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी या शिकायतकर्ता के बयानों में संदिग्ध मोड़ दिखता है, तो मजिस्ट्रेट केस को दोबारा चालू करने और निष्पक्ष जांच के आदेश दे सकते हैं.
क्या खाप पंचायतें कानून से ऊपर हैं? उठे बड़े सवाल
इस समझौते के बाद समाज दो हिस्सों में बंट गया है. एक पक्ष का मानना है कि पंचायत ने सालों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई, कोर्ट-कचहरी के चक्कर और दोनों परिवारों की आर्थिक-मानसिक बर्बादी को रोककर सही फैसला लिया है. वहीं, दूसरा बड़ा वर्ग सवाल उठा रहा है कि क्या खाप पंचायतें देश के कानून और न्याय व्यवस्था से बड़ी हो गई हैं? जिस मामले में दहेज उत्पीड़न और मौत का आरोप हो, उसमें पंचायत स्तर पर माफी देने का अधिकार कहां तक न्यायसंगत है?
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