हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के गांव छितरौली की रहने वाली शर्मिला धनखड़ ने विपरीत परिस्थितियों और कड़े संघर्ष के बाद इतिहास रच दिया है. शर्मिला ने कॉमनवेल्थ गेम्स की पैरा शॉटपुट (F57 स्पर्धा) में 9.81 मीटर का थ्रो कर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता है. उनका यह सफर साधारण नहीं रहा, बल्कि यह कहानी संघर्ष, साहस और अटूट आत्मविश्वास की है.
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शर्मिला जब महज 2 साल की थीं, तब इलाज के अभाव में पोलियो के कारण उनका बायां पैर खराब हो गया था. सूखा प्रभावित इलाके में पली-बढ़ीं शर्मिला की परवरिश उनकी नेत्रहीन मां और किसान पिता ने की. कम उम्र में शादी के बाद उन्हें लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी, जिससे परेशान होकर कई बार मन में जान देने का विचार भी आया. बेटियों के जन्म और तलाक के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और परिवार चलाने के लिए आया का काम तक किया.
28 साल की उम्र में शर्मिला ने दूसरी शादी की, जिसके बाद उनके पति अजीत सिंह ने उन्हें खेलों की तरफ प्रेरित किया. साल 2018 में शर्मिला हरियाणा रोडवेज की पहली महिला कंडक्टर बनीं, लेकिन हड़ताल के बाद उनकी नौकरी चली गई. इसके बावजूद उन्होंने खेल को अपना जरिया बनाया. खेलों की ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाने के लिए उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा, लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा.
कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग शुरू कर शर्मिला ने नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा और आखिरकार 2022 बर्मिंघम की नाकामी (चौथा स्थान) को पीछे छोड़ते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया. अब उनकी दोनों बेटियां भी खेलों में अपनी जगह बना रही हैं और शर्मिला का अगला लक्ष्य एशियन गेम्स और पैरालंपिक में देश का नाम रोशन करना है.
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