35 हजार करोड़ का साम्राज्य, दुनिया के 'मेटल किंग' की विरासत और अचानक कंधों पर आया कांटों का ताज. वेदांता फाउंडर और देश के अमीर बिजनेसमैन अनिल अग्रवाल को लेकर विवाद और चर्चाएं खत्म नहीं हो रही हैं. हाल में जो हुआ उसने अनिल अग्रवाल के परिवार, बिजनेस ग्रुप और देश के कॉरपोरेट ग्रुप को हिला दिया है. अनिल अग्रवाल और वेदांता के पीछे ईडी लगी है, रेड चल रही है और निशाने पर कोई और नहीं खुद अनिल अग्रवाल हैं. सवाल उठ रहे हैं कि बीजेपी को करीब 97 करोड़ का चंदा देकर भी क्यों और कैसे ईडी के फंदे में फंस गए अनिल अग्रवाल.
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विदेशी करेंसी के लेन-देन विवाद तो उनके समय का है लेकिन अब निपटना प्रिया अग्रवाल हेब्बर को पड़ेगा जिन्होंने अभी-अभी वेदांता की विरासत को संभालना शुरू किया है. जैसे ही प्रिया ने वेदांता की कमान संभाली, वैसे ही ईडी एक्सीडेंट हो गया. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में आज जानेंगे कि राजनीति और कानूनी खेल के काले बादल में प्रिया अग्रवाल कैसे वेदांता का सबसे बड़ा और इकलौता संकटमोचक चेहरा बनकर उभरी हैं? और क्या है रेड का असली इनसाइड कनेक्शन?
अग्निवेश की मौत से टूट थे अनिल अग्रवाल
वेदांता में प्रिया का इलेवेशन भी किसी एक्सीडेंट से कम नहीं था. मेटल किंग अनिल अग्रवाल ने बड़ी मेहनत से वेदांता ग्रुप खड़ा किया. ये फैसला लिया गया था कि दो बच्चों के पिता 72 साल के अनिल अग्रवाल की बिजनेस विरासत बेटा अग्निवेश संभालेंगे. अग्निवेश ने 16 साल की उम्र में पिता के साथ काम करना शुरू कर दिया. अमेरिका से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UAE में 'फजेराह गोल्ड' नाम की प्रेशियस मेटल रिफाइनरी कंपनी शुरू की. अनिल अग्रवाल ने सरकार से खरीदी हुई कंपनी हिंदुस्तान जिंक, तलवंडी साबो पावर लिमिटेड जैसी कंपनियों का चेयरमैन बनाया. लाइमलाइट से दूर अग्रिवेश अनिल अग्रवाल की विरासत आगे ले जा रहे थे लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया.
49 साल के अग्निवेश अग्रवाल अमेरिका में अपने दोस्तों के साथ आइस स्कीइंग करते समय एक्सीडेंट के शिकार हुए और फिर मौत हो गई. बेटा जवान उम्र में चला गया तो अनिल अग्रवाल के दिल के एक हुक निकली-एक पिता के कंधे पर जवान बेटे की अर्थी जाए, इससे बुरा और क्या हो सकता है. तब पीएम मोदी भी अनिल अग्रवाल के दर्द बांटने वालों में थे.
अनिल अग्रवाल ने चुना अपना उत्तराधिकारी!
अग्निवेश की मौत ने वेदांता ग्रुप को हिला दिया. वेदांता लिमिटेड और हिंदुस्तान जिंक शेयर्स अचानक क्रैश होने लगे. सवाल उठने लगे कि अनिल अग्रवाल के बाद कौन? वेदांता साम्राज्य के उत्तराधिकार योजना(Succession Plan) की अनिश्चितता को खत्म करने के लिए अनिल अग्रवाल ने बेटी प्रिया अग्रवाल हेब्बर को चुना. हालांकि उनकी जगह अग्निवेश की पत्नी पूजा बांगुर अग्रवाल भी हो सकती थी.
कौन है प्रिया अग्रवाल?
प्रिया अग्रवाल अनिल अग्रवाल की बेटी है. लंदन की वारविक यूनिवर्सिटी से बिजनेस और साइकोलॉजी की डिग्री ले चुकीं प्रिया अग्रवाल अलग दुनिया में थी. उन्हें कॉरपोरेट लाइफ, लाइमलाइट से ज्यादा बेजुबान जानवरों की सेवा में सुकून मिलता था. 2010 में इसी मिशन के दौरान उनकी मुलाकात अकार्ष हेब्बर से हुई. अकार्ष मुंबई यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग करने वाले सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल थे. दोनों के दिल बेजुबानों के लिए धड़कते थे तो मिलकर एनिमल वेलफेयर संस्था YODA शुरू की. जानवरों को बचाते-बचाते दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए. ये अग्रवाल परिवार की पहली इंटर-कम्युनिटी मैरिज थी, जहां बिहार के मारवाड़ी परिवार की बेटी ने कर्नाटक के मैंगलोरियन लड़के अकार्ष से सितंबर 2013 में लंदन में एक भव्य समारोह में शादी की.
अकार्ष हेब्बर सिर्फ प्रिया की लाइफ में ही नहीं, वेदांता के भी पिलर हैं. वेदांता सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले बिजनेस के ग्लोबल मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. दोनों पति-पत्नी मिलकर अनिल अग्रवाल के मेटल और माइनिंग किंगडम को भविष्य की नई ऊंचाइयों पर ले जाने में जुटे हैं.
बहू पूजा की जगह बेटी प्रिया को क्यों चुना?
प्रिया के चुनने के बाद से सवाल खड़ा हुआ है कि प्रिया अग्रवाल ही क्यों और बहू पूजा बांगुर क्यों नहीं? अग्निवेश अग्रवाल की शादी कोलकाता के सीमेंट किंग बांगुर परिवार की बेटी पूजा बांगुर से हुई. पूजा बांगुर श्री सीमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर हरि मोहन बांगुर की बेटी हैं. 2001 में हुई शादी में भव्य कॉर्पोरेट शादियों में से एक रही है. संगीत में परफॉर्म करने वाले शाहरुख खान भी थे. अग्निवेश ने प्राइवेट फैमिली लाइफ को हमेशा कॉरपोरेट, बिजनेस और लाइमलाइट से दूर रखी. अपने पीछे अपनी पत्नी पूजा और दो बच्चों का परिवार छोड़ गए. उनके जाने के बाद भी पूजा बांगुर वेदांता के बिजनेस ऑपरेशन्स या मैनेजमेंट में एक्टिव नहीं रहीं. इसलिए अनिल अग्रवाल के लिए जरूरी हुआ कि वो बेटी को आगे बढ़ाएं.
प्रिया के कमान संभालते ही आया तूफान!
परिवार में हादसे और बिजनेस ग्रुप में बदलावों को हुए मुश्किल से 6 महीने हुए हैं. प्रिया अग्रवाल के कमान संभालते ही आ खड़ा है जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान. फेमा (FEMA) उल्लंघन के मामले में ED ने वेदांता के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की है. निशाने पर अनिल अग्रवाल हो सकते हैं लेकिन कंपनी संभालने के कारण इसे वारिस पर संकट, कांटों का ताज, अग्निपरीक्षा ऐसा कुछ भी कहा जा सकता है. वेदांता में प्रिया अनिल अग्रवाल की बेटी होने के साथ-साथ वेदांता की नॉन एक्जक्यूटिव डायरेक्टर और गैर-कार्यकारी निदेशक और हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन हैं. प्रिया की लीडरशिप में वेदांता ग्रुप में बड़ा डीमर्जर चल रहा है.
बीजेपी को चंदा, फिर रेड!
पटना का एक कबाड़ी वाला आज दुनिया के सबसे बड़े मेटल किंग में से एक है. लेकिन क्या इस किंग के साम्राज्य पर ग्रहण लगता जा रहा है? पहले एफआईआर की तलवार, फिर अदाणी ग्रुप से टकराव और अब ईडी की रेड. कहना मुश्किल ये है इसमें से क्या क्या कनेक्टेड है, इसके पीछे क्या पॉलिटिक्स है.
क्रोनोलॉजी में बहुत कन्फ्यूजन है. इसीलिए सबसे बड़ी कॉर्पोरेट और पॉलिटिकल मिस्ट्री देश के सामने है. एक तरफ माइनिंग किंग अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता, बीजेपी को 97 करोड़ का भारी-भरकम चंदा देती है. लेकिन इसके ठीक बाद, 2 जून को अचानक ईडी केवेदांता के दफ्तरों को घेर लेती है. आखिर करोड़ों के चंदे के बाद भी ईडी का ये फंदा क्यों कसा? क्या है इस पूरी टाइमिंग और क्रोनोलॉजी का असली खेल?
अनिल अग्रवाल ने कैसे खड़ा इतना बड़ा साम्राज्य?
प्रिया अग्रवाल को इतनी बड़ी विरासत नहीं मिलती अगर पटना के गली-मोहल्ले का एक लड़का अनिल कुछ गुजरने के लिए शहर छोड़कर मुंबई नहीं जाता. अनिल अग्रवाल ने पिता के स्मॉल स्केल एल्युमीनियम बिजनेस में हाथ बंटाने के लिए 15 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी लेकिन कुछ और करना था अपने दम पर. 19 साल की उम्र में एक टिफिन और बिस्तरे के साथ पटना से मुंबई आ गए. जेब खाली, लेकिन इरादे फौलादी. अनिल अग्रवाल के पिता का नाम लाला कन्हैया लाल अग्रवाल और माता का नाम वेदवती अग्रवाल था. अपनी माता के नाम पर ही उन्होंने अपनी कंपनी का नाम वेदांता रखा.
मुंबई में अनिल अग्रवाल ने पुरानी मशीनों और स्क्रैप का बिजनेस शुरू किया. अनिल अग्रवाल ने कबाड़ से सोना निकालना सीखा. उन्होंने छोटी कंपनियों को खरीदकर बिजनेस बढ़ाना शुरू किया जो आगे उनका हुनर बन गया. अरबों का साम्राज्य खड़ा करने वाले अनिल अग्रवाल 9 बार बिजनेस में फेल हुए. अग्रवाल का पहला बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्होंने 1976 में कर्ज में डूबी कंपनी शमशेर स्टर्लिंग कॉर्पोरेशन को 16 लाख कर्ज लेकर खरीदा. उस कर्ज को उन्होंने लाइफ का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना. उसी उस साम्राज्य की नींव पड़ी वेदांता की. अंग्रेजी नहीं आती थी लेकिन लंदन में बैंकर्स से फंड जुटाने का हुनर था. दिसंबर 2003 में उनका सपना पूरा हुआ जब उन्होंने वेदांता को लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट कराया.
पुरानी डूबी हुई कंपनियों को खरीदकर मुनाफे कमाने का हुनर बहुत काम आया. भारत के टेकओवर किंग बन गए. अनिल अग्रवाल की कहानी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 2001 में आया. वाजपेयी ने घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों के डिसइन्वेमेंट यानी बेचने का फैसला किया. अनिल अग्रवाल ने इस मौके को लपक लिया. उन्होंने सरकारी एल्युमिनियम कंपनी बाल्को की 51% हिस्सेदारी सिर्फ 551.5 करोड़ रुपये में खरीद ली. सौदे पर देश में भारी बवाल हुआ कि कौड़ियों के दाम में सरकारी संपत्ति अनिल अग्रवाल को बेच दी. अगले साल उन्होंने एक और सौदा भारत सरकार से किया. एक और सरकारी दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान जिंक भी खरीद ली. लगातार कंपनियां खरीद-खरीदकर उन्होंने वेदांता को विशाल बना दिया. सोसा गोवा, केयर्न इंडिया, इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स जैसी प्राइवेट कंपनियां खरीदकर वेदांता का बिजनेस स्टील, आयरन ओर, तेल और गैस सेक्टर तक फैल गया.
राहुल गांधी के क्रोनी कैपिटलिज्म के शिकार बने अनिल
बिजनेसमैन को इससे फर्क नहीं पड़ता कि सरकार किस पार्टी की है. बुद्धिमान बिजनेसमैन का बिजनेस हर सरकार में चलता है. यूपीए सरकार में भी अनिल अग्रवाल फल-फूल रहे थे. फिर 2008 से 2010 के बीच का दौर आया जब अनिल अग्रवाल का पाला राहुल गांधी से पड़ गया जो सरकार तो नहीं थे लेकिन सरकार से कम भी नहीं थे. राहुल के क्रोनी कैपिटलिज्म पॉलिटिक्स के पहले शिकार बनने वाले अनिल अग्रवाल ही थे. 2010 में 'सूट-बूट की सरकार' और 'क्रोनी कैपिटलिज्म' वाले नैरेटिव की पहली प्रयोगशाला वेदांता का नियमगिरी प्रोजेक्ट ही था. अंबानी, अदाणी तो बहुत बाद में आए.
ओडिशा के कालाहांडी में नियमगिरि की पहाड़ियां हैं. इन पहाड़ियों के नीचे बॉक्साइट का भारी खजाना छुपा है. अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता वहां माइनिंग करना चाहती थी. उन पहाड़ियों में 'डोंगरिया कोंध' नाम के आदिवासी रहते थे, जो नियमगिरि पहाड़ी को अपना भगवान मानते थे. आदिवासियों ने जमीन देने से साफ इनकार कर दिया और आंदोलन शुरू हो गया. सरकार की पॉलिसी से उलट आदिवासियों के हितों की रक्षा करने राहुल गांधी ने एंट्री मार ली. खुद नियमगिरि पहुंचे और आदिवासियों के बीच जाकर गरजते हुए कहा- मैं दिल्ली में आपका सिपाही हूं. कोई आपकी जमीन नहीं छीन सकता.
असर ये हुआ कि तत्कालीन यूपीए सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने अनिल अग्रवाल के मेगा प्रोजेक्ट को मंजूरी रोक दी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई स्थानीय ग्राम सभाओं में आदिवासियों ने वेदांता के खिलाफ वोट दिया. अनिल अग्रवाल को घुटने टेकने पड़े और अरबों रुपये का प्रोजेक्ट हमेशा के लिए पूरी तरह रद्द हो गया. इसे राहुल गांधी की बड़ी राजनीतिक जीत माना गया. हालांकि पिछले महीने वेदांता के एल्युमिनियम बिजनेस के लिए विवादों के बाद भी ओडिशा में सिजीमाली बॉक्साइट माइन प्रोजेक्ट को सरकार ने तकनीकी मंजूरी दी है.
क्या है नया विवाद?
ईडी रेड के पीछे है पुराने सौदों की कतरन जो अनिल अग्रवाल के समय हुए, उनके साइन से हुए. वेदांता की मूल पैरेंट कंपनी 'वेदांता रिसोर्सेज' लंदन बेस्ड है. विदेश पैसे भेजने, ब्रांड फीस रिमिटेंस और ग्लोबल शेल कंपनियों के जरिए फंड ट्रांसफर करने के जितने भी बड़े फैसले हुए, वे अनिल अग्रवाल के दौर के हैं, इसलिए सवालों के घेरे में सीधे वही आएंगे. ये सब प्रिया अग्रवाल हेब्बर के लिए झटका इसलिए है कि आगे उन्हें ही सबसे निपटना होगा. कानूनी फंदे और जांच की जद में जहां पिता अनिल अग्रवाल के पुराने फैसले और दस्तखत हैं, वहीं इस झटके का सीधा दर्द और बिजनेस को बचाने की जद्दोजहद बेटी प्रिया अग्रवाल के हिस्से आई है। पिता की विरासत को इस बड़े कानूनी तूफान से बाहर निकालना ही अब प्रिया का सबसे पहला टास्क बन रहा है.
अगर आरोप सही साबित हुए तो क्या होगा?
फेमा केस पीएमएलए की तरह क्रिमिनल नहीं है. तुरंत गिरफ्तारी या जेल जाने का खतरा नहीं है. अगर विदेशी मुद्रा उल्लंघन के आरोप साबित होते हैं, तो ईडी दोषी पाई जाने वाली एंटिटी पर 300% तक जुर्माना ठोक सकती है. अगर इससे भी बुरा कुछ हुआ तो वेदांता के अकाउंट्स, असेट्स फ्रीज या अटैच कर सकता है. अगर ऐसा सब हुआ तो 1500 करोड़ का ये केस ग्रुप की बैलेंस शीट और ब्रैंड इमेज दोनों के लिए तबाही साबित होगा.
2026 की शुरूआत से ही अनिल अग्रवाल के लिए चीजें नेगेटिव होने लगी. पहले बेटे की मौत, फिर जेपी ग्रुप का बिजनेस खरीदने में गौतम अदाणी से लीगल फाइट में हार, फिर अप्रैल में छत्तीसगढ़ के सक्ती प्लांट हादसे को लेकर एफआईआर और अब ईडी ने फेमा के तहत अनिल अग्रवाल, वेदांता के ठिकानों पर छापा मार दिया.
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