चुनावों में हार के बाद तिनका-तिनका बिखर रही है ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस. रोज खबरें आ रही है कि ये गया वो गया. इस आने-जाने के बीच सांसद यूसूफ पठान भी काफी चर्चा में बने हुए है. लोगों को ये जानना है कि युसूफ पठान ममता बनर्जी के एहसान से दबकर पार्टी में बने रहेंगे या गोल्डन फ्यूचर देखकर बीजेपी में चले जाएंगे. एक चर्चा पहले से तेज है कि ममता बनर्जी ने सौरव गांगुली को मध्यस्थ बनाकर युसूफ पठान से बहरामपुर की लोकसभा सीट से इस्तीफा देने के लिए कहा ताकि उस सीट पर वो खुद चुनाव लड़ सकें. चर्चा ये भी कि युसूफ ने ममता के लिए सीट खाली करने से मना कर दिया. कितना सच, कितनी अफवाह, कोई नहीं जानता. अब ये नया है कि आज कल में पक्के वाले मुसलमान युसूफ पठान बीजेपी में देखे जा सकते हैं.
ADVERTISEMENT
कभी क्रिकेट के पावर-हिटर रहे यूसुफ पठान आज राजनीति की पिच पर एक नए 'स्पिन' का सामना कर रहे हैं. क्रिकेट के मैदान से शुरू हुआ वडोदरा के एक मस्जिद के खादिम के बेटे का सफर आज देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद तक पहुंच चुका है. लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि बंगाल से लेकर गुजरात और दिल्ली तक यूसुफ पठान अचानक हेडलाइंस में छा गए हैं? क्या ममता बनर्जी के इस 'जायंट किलर' का अपनी ही पार्टी से मोहभंग हो रहा है या फिर ये सिर्फ विरोधियों की उड़ाई एक अफवाह है? चर्चित चेहरा में आज जानिए सभी सवालों के जवाब.
पिछले साल भी हुई थी पठान की चर्चा
पिछले साल जनवरी में युसूफ पठान उमराह के लिए सऊदी अरब गए थे. वहां उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसकी दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय में खूब चर्चा हुई. यूसुफ पठान ने मक्का से मदीना तक की 400 किलोमीटर की पवित्र यात्रा पैदल पूरी की. इसका ऐतिहासिक महत्व ये कि उन्होंने उसी रास्ते को चुना जिसे इस्लाम के इतिहास में 'हिजरत का रास्ता' कहा जाता है. यानी ये वही रास्ता है जिससे पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना के लिए प्रवास किया था.
पिता चाहते थे मौलवी बनाना लेकिन बन गए क्रिकेटर
पठानों का खानदान गुजरात के वडोदरा का है. उनके पिता महमूद खान जामा मस्जिद में मुअज्जिन और खादिम यानी हेल्पर थे. काम अजान देना, नमाज की व्यवस्था करना और मस्जिद की देखरेख करना था. परिवार की सीमित आय थी. परिवार मस्जिद परिसर में ही बने छोटे से कमरे में रहता था. यूसुफ और इरफान ने अपने जीवन के शुरुआती 15-18 साल इसी मस्जिद परिसर में बिताए. मस्जिद की छत, आंगन में ही प्लास्टिक और रबर की बॉल से खेलकर युसूफ और इरफान पठान इतने बड़े क्रिकेटर बने. पिता चाहते थे कि दोनों भाई पढ़-लिखकर इस्लामिक स्कॉलर (मौलवी) बनें, लेकिन जब उन्होंने बच्चों का क्रिकेट के प्रति जुनून देखा, तो उन्होंने अपनी सीमित शक्ति के बावजूद बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन की एकेडमी में भेज दिया.
दोनों भाइयों पर इस्लाम का गहरा प्रभाव!
मस्जिद के माहौल में बड़े होने के कारण दोनों भाइयों पर इस्लाम का गहरा असर पड़ा. उन्होंने बचपन में कुरान पढ़ना सीखा और वे नियमित रूप से पांचों वक्त की नमाज अदा करते हैं. शायद यही वजह है कि तरक्की और शोहरत के मामले में बहुत आगे निकलने के बाद भी युसूफ और इरफान पठान ने पत्नियों की मुंह दिखाई या पर्देदारी के मामले में उसी लाइन पर चले जो पुराने ख्याल के मुसलमान शौहरों के रहे हैं. हालांकि उनकी शादी और मोहब्बत की कहानी किसी मॉडर्न मुसलमान लड़के जैसी है.
यूसुफ पठान और आफरीन की कहानी
यूसुफ पठान की शादी की कहानी 'लव कम अरेंज्ड मैरिज की है. 2011 में टीम इंडिया के लिए खेलते हुए चोटिल युसूफ पठान रिकवरी के लिए अपने घर वडोदरा में थे. अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट की तलाश ने उन्हें मुंबई की आफरीन खान से मिलवाया. आफरीन वडोदरा में फिजियोथेरेपिस्ट की प्रैक्टिस कर रही थीं. मुलाकातों में पता चला दोनों का परिवार वडोदरा में कभी पड़ोसी हुआ करता था. दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया. दोनों के परिवारों ने रिश्ते को पसंद किया और युसूफ पठान और आफरीन खान का निकाह हो गया. शादी मुंबई में हुई. दावत-ए-वलीमा वडोदरा में हुआ जिसमें तब गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी को भी पठान परिवार ने इनवाइट किया था लेकिन वो पहुंचे नहीं.
युसूफ पठान को पत्नी आफरीन खान के साथ सोशल मीडिया पर फोटोज शेयर करने का चस्का तो है लेकिन हर पोस्ट के बाद ट्रोल उनकी नियति है. ट्रोल इसलिए होते हैं कि उनकी पत्नी हमेशा बुर्के में दिखती है. यहां तक कि अर्जुन तेंदुलकर की शादी में भी पत्नी के साथ पहुंचे लेकिन पत्नी हिजाब में ढंकी रही. सोशल मीडिया की लंबे समय से ये शिकायत रही है कि यूसुफ पठान अपनी पत्नी को चेहरा नहीं दिखाने देते?
पठान ब्रदर्स पर लगे आरोप!
अब पता नहीं ये युसूफ के हुक्म से होता है या आफरीन की मर्जी से या उन्होंने परिवार की परम्परा आगे बढ़ाई. 2016 में उनके भाई इरफान पठान की शादी हुई. 8 साल तक दुनिया ने सेलिब्रिटी क्रिकेटर की पत्नी का चेहरा नहीं देखा. फरवरी 2024 में शादी की 8वीं सालगिरह पर इरफान पठान ने पहली बार सफा बेग का बिना नकाब वाला चेहरा सोशल मीडिया पर दिखाया था. पठान ब्रदर्स पर अक्सर दकियानूसी होने, कट्टरपंथी होने जैसे आरोप लगते रहे लेकिन युसूफ और आफरीन वही करते हैं जो उनके लिए सही है. दो बेटों अयान और रैयान के साथ खुश रहते हैं.
युसूफ पठान की राजनीतिक एंट्री
युसूफ पठान के युसूफ पठान होने से उनके लिए लाइफ में दूसरा रास्ता खुला. टीम इंडिया और आईपीएल में दहाड़ते बैटर की पारी खेलने के बाद युसूफ पठान ने सारे फॉर्मेंट से संन्यास ले लिया. आगे क्या करेंगे, कुछ पता नहीं था. यूसुफ पठान ने मार्च 2024 में राजनीति के मैदान में तब धमाकेदार एंट्री की, जब ममता बनर्जी ने उन्हें तृणमूल कांग्रेस में शामिल कर लिया. सीधे कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ बहरामपुर से चुनावी मैदान में उतारा. यूसुफ ने कांग्रेस के दिग्गज और 5 बार के सांसद अधीर रंजन चौधरी को धूल चटा दी.
बहरामपुर से ही क्यों लड़े यूसुफ?
सवाल हमेशा रहा कि ममता बनर्जी ने गुजरात के यूसुफ पठान को बंगाल की बहरामपुर सीट से क्यों चुना? इसके पीछे दीदी की एक सोची-समझी और अचूक बिसात थी. बहरामपुर में 50 परसेंट से ज्यादा मुस्लिम आबादी है. ममता बनर्जी को अधीर का वर्चस्व तोड़ने के लिए ऐसा चेहरा चाहिए था, जो मुसलमान भी हो, नेशनल लेवल पर क्लीन इमेज वाला हो. युसूफ पठान मुसलमान, सेलिब्रिटी वाले कैटेगरी में फिट बैठे.
बंगाली दिखाने के लिए काम आया युसूफ का केकेआर वाला पास्ट. यूसुफ पठान केकेआर के लिए कई साल खेले. बंगाल के लोगों के लिए युसूफ अपना लड़का था. लोकसभा चुनाव में सारे ग्रह नक्षत्र ममता के पक्ष में थे. ममता की लहर पर युसूफ संसद पहुंच गए.
क्या पलट जाएंगे युसूफ?
अब सवाल ये है कि उनका युसूफ का लायलिटी कार्ड टिकेगा या बीजेपी के लिए बिकेगा? अब तृणमूल टूट रही है तो यूसुफ पठान को लेकर भयंकर अफवाहें चल रही हैं. अफवाह उड़ी कि संसद से लेकर विधानसभा तक आउट ममता बनर्जी खुद लोकसभा जाने के लिए बहरामपुर से लड़ना चाहती हैं. उन्होंने सौरव गांगुली के जरिए यूसुफ से इस्तीफा मंगवाया. अफवाहें इतनी तेज कि यूसुफ पठान को वीडियो जारी करके दावों को खारिज करना पड़ा कि ममता दीदी या पार्टी ने उनसे कभी इस्तीफा नहीं मांगा. वो टीएमसी के साथ मजबूती से खड़े हैं. राजनीति में लंबी पारी खेलने आए हैं. मगर विवाद नहीं थमा. महुआ मोइत्रा ने उनके दिल्ली दौरे पर ताना कसा कि अमित शाह के बुलाने पर दिल्ली आए हैं. महुआ चाहती हैं युसूफ थोड़ी शर्म और थोड़ी हिम्मत दिखाएं.
युसूफ पठान की चुप्पी से माहौल गर्म!
यूसुफ पठान के दिल में बीजेपी के लिए कुछ तो चल रहा है जिसे वो पूरी तरह न बाहर कर पाए, दबा पाए. तृणमूल में रहते हुए युसूफ पठान अजीब किस्म के साइलेंस मोड में रहे. अप्रैल 2025 में जब बहरामपुर के पास स्थित मुर्शिदाबाद में नए वक्फ कानून के खिलाफ हिंसा भड़की और लोगों की जानें गईं, युसूफ ने रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी. इलाके में गए तक नहीं जबकि पूरी पार्टी गला फाड़कर बीजेपी के खिलाफ बोलती रही. युसूफ पठान मशहूर रहे कि टीएमसी में रहते हुए उन्होंने कभी बीजेपी या पीएम मोदी के खिलाफ बोलना तो दूर, हमेशा संतुलित स्टैंड रखा.
बंगाल में चुनाव से ठीक पहले अप्रैल 2026 में हुए गुजरात के निकाय चुनावों के दौरान यूसुफ पठान ने ये कहकर चौंका दिया कि अगले 40-50 साल तक गुजरात में भी बीजेपी को कोई सत्ता से हटा नहीं सकता है. बयान का संतुलन बनाने के लिए उन्होंने कहा कि जैसे गुजरात में बीजेपी बेहद मजबूत है और उसे कोई हिला नहीं सकता, ठीक वैसे ही बंगाल में जनता तृणमूल कांग्रेस को पसंद करती है, इसलिए वहां टीएमसी कई दशकों तक सत्ता में बनी रहेगी. पठान के ऐसा कहने के महीने भर के भीतर ममता के पास न सत्ता रही, न पार्टी. पठान ने जब ये सब बोला तब उन पर गुजरात हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने अवैध कब्जाधारी का टैग लगा दिया था. वडोदरा म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की सरकारी जमीन हड़पने के आरोपों से बुरी तरह घिरे हैं युसूफ पठान.
युसूफ पठान का करियर
सियासत में आने से पहले यूसुफ पठान भारतीय क्रिकेट का वो नाम थे, जिससे दुनिया के बड़े से बड़े गेंदबाज खौफ खाते थे. 6 फीट 2 इंच लंबे इस ऑलराउंडर ने 2007 के टी-20 विश्व कप फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ अपना इंटरनेशनल डेब्यू किया और पहली ही बार में विश्व विजेता बने. 2011 के वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम इंडिया में शामिल रहे. भारत के लिए 57 वनडे और 22 टी-20 मैच खेले. आईपीएल में भी उनका जलवा रहा.
आईपीएल करियर में 158 छक्के उड़ाने वाले यूसुफ पठान ने 2010 में मुंबई इंडियंस के खिलाफ राजस्थान रॉयल्स की ओर से खेलते हुए सिर्फ 37 गेंदों में शतक जड़ दिया था. यह लंबे समय तक आईपीएल का सबसे तेज शतक रहा था, जिसे बाद में 30 बॉल में शतक लगाकर क्रिस गेल ने तोड़ा. पहले सीजन में राजस्थान रॉयल्स को चैंपियन बनाने के बाद वे कोलकाता नाइट राइडर्स का हिस्सा बने, जहां उन्होंने दो बार (2012 और 2014) आईपीएल का खिताब जीता और ईडन गार्डन्स और ममता के चहेते बन गए.
ADVERTISEMENT


