अयोध्या राम मंदिर कथित चंदा चोरी मामले में शंकराचार्य सदानन्द सरस्वती का बड़ा बयान, कर दी ये बड़ी मांग

न्यूज तक डेस्क

• 08:49 AM • 05 Jul 2026

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के आरोपों पर द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने तीखा आक्रोश जताते हुए सरकारी नियंत्रण की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त करने और इसके संचालन के लिए शीर्ष संतों के नेतृत्व में एक स्वायत्त 'सनातन बोर्ड' बनाने की मांग की है.

शंकराचार्य सदानन्द
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अयोध्या राम मंदिर में सामने आए चढ़ावा चोरी और वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों पर सनातन जगत में भारी आक्रोश है. इस गंभीर मुद्दे पर अब द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का बड़ा बयान सामने आया है. उन्होंने सरकार और अयोग्य अधिकारियों पर तीखा हमला बोलते हुए एक विशेष 'सनातन बोर्ड' बनाने की मांग कर दी है.

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अयोग्य लोगों को काम दोगे तो यही परिणाम मिलेगा

शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने कहा कि अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर में चढ़ावे की जो चोरी और अपराध का मामला सामने आ रहा है, उससे देश के सभी आस्थावान लोग बेहद दुखी हैं. उन्होंने सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, "जब आप अयोग्य लोगों को जिम्मेदारी सौंपेंगे, तो ऐसा ही परिणाम प्राप्त होगा जैसा अयोध्या में देखने को मिला है." 

नेताओं के लिए पर्यटन स्थल, हमारे लिए तपोभूमि

शंकराचार्य ने सरकार और राजनेताओं की सोच पर गहरी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि धार्मिक जनसमुदाय अयोध्या, द्वारका, बद्रीनाथ और तिरुपति जैसे पवित्र धामों को ईश्वर और ऋषि-महर्षियों की तपोभूमि मानता है, जबकि सरकार और नेता लोग इन्हें केवल एक 'पर्यटन स्थल' (Tourism Spot) के रूप में देखते हैं. यही कारण है कि सरकारी अधिकारियों के मन में इनके प्रति कोई धार्मिक या आध्यात्मिक भावना जाग्रत नहीं होती है. उन्होंने आगे जोड़ा कि शासन के अधिकारियों को न तो शास्त्रों का ज्ञान होता है, न ही वे धार्मिक परंपराओं और विधि-निषेधों का अनुभव रखते हैं [01:08].

'सनातन बोर्ड' बनाने की मांग

इस पूरी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का विकल्प बताते हुए शंकराचार्य ने देश में एक 'सनातन धर्म संरक्षण समिति' यानी 'सनातन बोर्ड' का गठन करने की पुरजोर वकालत की है. उनकी मांग है कि इस बोर्ड को विधिवत और कानूनी रूप से मान्यता दी जानी चाहिए. इसमें देश के सर्वमान्य और निर्विवाद आचार्य शामिल होने चाहिए, जिनमें चारों शंकराचार्य और पांचों वैष्णवाचार्य मुख्य रूप से हों. देश के सभी प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों की कमान पूरी तरह से इस बोर्ड के अधीन होनी चाहिए, ताकि सरकार का हस्तक्षेप खत्म हो.

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करो

शंकराचार्य ने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए सरकार को घेरा. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकारों के पास मंदिर संचालन का न तो कोई नैतिक अधिकार है और न ही कोई आध्यात्मिक शक्ति, क्योंकि सरकारें खुद को 'धर्मनिरपेक्ष' कहती हैं.उन्होंने सवाल उठाया कि देश में किसी मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारे पर शासन का कोई नियंत्रण या अनुशासन नहीं है, तो फिर केवल हिंदुओं के धार्मिक स्थलों पर ही सरकार का हक क्यों है? उन्होंने मांग की कि देश के सभी मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से तुरंत मुक्त किया जाना चाहिए और योग्य धार्मिक संतों को इसकी बागडोर सौंपी जानी चाहिए.