आजादी के बाद देश से भले ही राजशाही खत्म हो गई हो और राजा-रजवाड़ों का सिस्टम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका हो, लेकिन इन शाही परिवारों का रसूख और उनकी अरबों-खरबों की संपत्तियां आज भी उनके पास बनी हुई हैं. कुछ राजघरानों ने अपनी संपत्तियां शांति और समझदारी से आपस में बांट लीं, तो कुछ इसके लिए दशकों से कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं. देश के सबसे अमीर और रसूखदार राजघरानों में से एक ग्वालियर के सिंधिया परिवार की करीब 40 साल पुरानी कानूनी जंग अब अपने अंजाम पर पहुंच चुकी है.
ADVERTISEMENT
ग्वालियर के जय विलास पैलेस की चौखट से शुरू हुई शह-मात की यह कानूनी जंग आखिरकार एक ऐतिहासिक समझौते पर आकर टिक गई है. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी बुआओं वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे, उषा राजे राणा और दिवंगत पद्मावती राजे के परिवारों ने कोर्ट से बाहर (आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट) जाकर आपसी समझदारी से इस अरबों रुपए की संपत्ति का बंटवारा कर लिया है. चूंकि यह मामला अदालत में चल रहा था, इसलिए ग्वालियर जिला कोर्ट से इसे अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सभी पक्षों को अपना-अपना तय हिस्सा सौंप दिया जाएगा.
कैसे शुरू हुआ था महलों के भीतर 'गेम ऑफ थ्रोन्स' का यह विवाद?
ग्वालियर के आखिरी महाराज जीवाजी राव सिंधिया की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी विजय राजे सिंधिया ने 'राजमाता' बनकर परिवार और संपत्ति की कमान संभाली थी. संपत्ति को लेकर यह विवाद मुख्य रूप से 1970 और 1980 के दशक में शुरू हुआ, जब पारिवारिक कलह में राजनीतिक विचारधाराएं भी आड़े आ गईं. उस दौर में राजमाता विजय राजे सिंधिया जनसंघ और भाजपा की वरिष्ठ नेता थीं, जबकि उनके इकलौते बेटे माधवराव सिंधिया (ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता) ने कांग्रेस का दामन थाम लिया था. राजनीतिक मतभेद इस कदर बढ़े कि मां-बेटे के रिश्ते पूरी तरह टूट गए और राजमाता ने अपनी वसीयत में बेटे माधवराव को अपने अंतिम संस्कार तक के हक से बेदखल कर दिया था.
हालांकि, जनवरी 2001 में जब राजमाता का निधन हुआ, तब पारिवारिक मर्यादा और एक बेटे का धर्म निभाते हुए माधवराव सिंधिया ने ही उनकी चिता को मुखाग्नि दी थी. इसके कुछ महीनों बाद ही वर्ष 2001 में एक विमान हादसे में माधवराव सिंधिया का भी दुखद निधन हो गया. इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 20 साल की उम्र पूरी होने से पहले ही अदालत में खुद को सिंधिया परिवार की संपत्ति का एकमात्र वारिस बताते हुए मुकदमा दायर कर दिया था, जिससे बुआओं के साथ उनकी कानूनी लड़ाई और तेज हो गई थी.
इमरजेंसी की कड़वाहट और चाबियों का वो ऐतिहासिक किस्सा
मां राजमाता और बेटे माधवराव के बीच की कड़वाहट के पीछे कई ऐतिहासिक और व्यक्तिगत कारण थे. साल 1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो राजमाता को जेल भेज दिया गया था. उस कठिन समय में माधवराव सिंधिया नेपाल चले गए और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए, जिससे राजमाता को लगा कि संकट के समय उनके बेटे ने उनका साथ नहीं दिया.
वहीं दूसरी ओर, माधवराव सिंधिया को इस बात पर सख्त ऐतराज था कि राजमाता अपने करीबी सलाहकार सरदार एस. सी. आंग्रे के कहने पर पारिवारिक संपत्तियां और कीमती गहने बेचकर जनसंघ की फंडिंग में लगा रही थीं. यह आपसी अविश्वास इस हद तक बढ़ चुका था कि ग्वालियर के जय विलास पैलेस के मुख्य लॉकर को खोलने के लिए मां और बेटे के पास अलग-अलग चाबियां रखनी पड़ती थीं, ताकि कोई भी अकेले उस शाही खजाने को हाथ न लगा सके.
पारिवारिक ट्रस्टों पर नियंत्रण को लेकर फंसा था बड़ा पेंच
सिंधिया घराने की इस कानूनी जंग में संपत्तियों से भी बड़ा विवाद उन 15 पारिवारिक और चैरिटेबल ट्रस्टों पर नियंत्रण को लेकर था, जिन्हें राजमाता विजय राजे सिंधिया ने खड़ा किया था. इनमें जय विलास ट्रस्ट, कमला राजे ट्रस्ट और श्री कृष्ण माधव ट्रस्ट जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं. राजमाता ने ये ट्रस्ट जानबूझकर अपने बेटे माधवराव से विवाद के बाद बनाए थे ताकि शाही संपत्तियों का मालिकाना हक किसी एक व्यक्ति के पास न रहकर इन ट्रस्टों के पास रहे, जहां उनकी बेटियों (वसुंधरा, यशोधरा और उषा राजे) का दबदबा हो.
माधवराव सिंधिया और बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इन ट्रस्टों के गठन और शेयर ट्रांसफर को अदालत में यह कहकर चुनौती दी थी कि ये सभी डीड्स अवैध हैं और उन्हें पैतृक संपत्ति से बेदखल करने के लिए बनाई गई हैं. कई दशकों तक इन ट्रस्टों के बैंक खातों, शेयरहोल्डिंग और अरबों की जमीनों के मालिकाना हक पर कोर्ट का स्टे लगा रहा, जिसे अब साल 2026 के इस महा समझौते के तहत पूरी तरह सुलझा लिया गया है.
ज्योतिरादित्य सिंधिया की 'घर वापसी' से पिघली रिश्तों की बर्फ
इस चार दशक पुराने विवाद में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मार्च 2020 और जनवरी 2021 के बीच आया. मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया, जिससे बुआ और भतीजे के बीच की राजनीतिक दुश्मनी की दीवारें ढह गईं. सालों से चली आ रही सियासी कड़वाहट उस वक्त पिघल गई जब खुद बड़ी बुआ वसुंधरा राजे ने ट्वीट कर भतीजे का स्वागत किया और कहा कि 'यह देखकर अच्छा लगा कि हम अब एक ही टीम में हैं, अगर आज राजमाता होतीं तो बहुत खुश होतीं.'
वहीं छोटी बुआ यशोधरा राजे ने इसे सिंधिया परिवार की 'घर वापसी' करार दिया. राजनीति की पिच पर शुरू हुए इस ऐतिहासिक मिलन का सीधा असर अदालत में चल रहे देश के सबसे बड़े सिविल इनहेरिटेंस केस पर पड़ा और जनवरी 2021 में पहली बार बॉम्बे हाईकोर्ट को आधिकारिक तौर पर सूचित किया गया कि परिवार अब आपस में बैठकर इस विवाद को सुलझा रहा है.
जानिए समझौते के तहत किसे क्या मिली संपत्ति?
साल 2026 में हुए इस महा समझौते के तहत यह मूल सिद्धांत तय किया गया है कि जो पक्ष जिस संपत्ति पर लंबे समय से काबिज है, वह संपत्ति अब वैधानिक रूप से उसी की रहेगी. इस ऐतिहासिक डील के तहत ग्वालियर का विश्वप्रसिद्ध 400 कमरों वाला 'जय विलास पैलेस', रानी महल और उज्जैन का ऐतिहासिक 'कालियादेह पैलेस' ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके परिवार के पास रहेगा. वहीं दूसरी तरफ, मुंबई का आलीशान 'समुद्र महल फ्लैट', दिल्ली का 'ग्वालियर हाउस', पुणे का 'पद्मा विलास पैलेस' और पारिवारिक ट्रस्टों के मुख्य शेयर बुआओं और उनके परिवारों के खाते में जा रहे हैं.
इस समझौते का सबसे भावुक और आध्यात्मिक पहलू राजमाता विजय राजे सिंधिया का वो पन्ने (Emerald) का दिव्य शिवलिंग है, जिसकी वे रोज श्रद्धा से पूजा करती थीं. यह शिवलिंग अब तक वसुंधरा राजे के पास सुरक्षित था, लेकिन इस समझौते के तहत अब इसे ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दिया जाएगा. इस समझौते के औपचारिक रूप से लागू होते ही परिवार के बीच चल रहे एक दर्जन से ज्यादा मुकदमे हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे, जो बदलते वक्त के साथ एक बड़े शाही घराने के व्यवहारिक और परिपक्व होने की अनूठी कहानी बयां करता है.
ADVERTISEMENT


