मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद के दौरान सामने आई वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सरकार ने सख्त रुख अपना लिया है. सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के जरिए हुई खरीद में कीमतों के भारी अंतर और नियमों की अनदेखी के मामलों पर कार्रवाई की खबर सामने आ रही है. ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 392 अधिकारी-कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आए हैं. इनमें लगभग 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी (CMO) भी शामिल हैं. गंभीर मामलों में 7 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है. इसके अलावा करीब 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली और 80 से अधिक ठेकेदारों एवं सप्लायर्स के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई है. इस कार्रवाई की जानकारी नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारी ACS संजय दुबे ने दी .यह मामला उस समय चर्चा में आया, जब अपर मुख्य सचिव संजय दुबे का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. वीडियो में वह नगरीय निकायों के अधिकारियों को सरकारी खरीद में कथित गड़बड़ियों को लेकर चेतावनी देते दिखाई दे रहे हैं. विभागीय बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने GeM पोर्टल के माध्यम से करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीदारी की. खरीद के विश्लेषण में अनुमान लगाया गया कि यदि सामान औसत दरों पर खरीदा जाता, तो करीब 250 करोड़ रुपये की बचत संभव थी.
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392 अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई, 7 की सेवा समाप्त
सरकारी खरीद और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सामने आई कार्रवाई ने नगरीय निकायों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्टों के अनुसार, कार्रवाई के दायरे में आए अधिकारियों और कर्मचारियों में लगभग 135 मुख्य नगरपालिका अधिकारी भी शामिल हैं। सात अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया है, जबकि करीब 3 से 4 करोड़ रुपये की वसूली की जानकारी दी गई है। इसके अलावा 80 से अधिक ठेकेदारों और सप्लायर्स के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है.नगरीय प्रशासन विभाग का जोर सरकारी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर है.
₹5 का फिनाइल ₹33,500 में खरीदने का मामला
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा फिनॉलिक डिसइन्फेक्टेंट यानी फिनाइल की खरीद को लेकर हुई. विभागीय प्रस्तुति में बताया गया कि एक नगरीय निकाय में एक लीटर उत्पाद की कीमत 5 रुपये दर्ज की गई, जबकि दूसरी जगह इसी तरह के उत्पाद के लिए 33,500 रुपये की कीमत सामने आई. एक ही श्रेणी के उत्पाद की कीमत में इतना बड़ा अंतर सामने आने के बाद खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठे. हालांकि, यह स्पष्ट करने के लिए कि दोनों जगह वास्तव में समान उत्पाद खरीदे गए थे या नहीं, उनकी गुणवत्ता, मात्रा, तकनीकी विशिष्टताओं और खरीद के दस्तावेजों की जांच जरूरी है.
₹306 की LED लाइट भोपाल में ₹11,800 में खरीदी गई
LED लाइट की खरीद में भी कीमतों का बड़ा अंतर सामने आया. प्रस्तुति के मुताबिक, 60 वॉट की एक LED लाइट एक जगह 306 रुपये में खरीदी गई, जबकि भोपाल में इसी क्षमता की लाइट की कीमत 11,800 रुपये दर्ज हुई. भोपाल में इस खरीद का कुल मूल्य 3.78 लाख रुपये बताया गया. इस अंतर ने सरकारी खरीद में बाजार दरों की तुलना और भुगतान की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं. हालांकि, वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए लाइट की गुणवत्ता, तकनीकी मानकों, अतिरिक्त उपकरणों और इंस्टॉलेशन जैसी शर्तों की जांच आवश्यक होगी.
2 लाख की कचरा गाड़ी 6 लाख में खरीदने पर सवाल
नगरीय निकायों में कचरा गाड़ियों की खरीद भी सवालों के घेरे में है. संजय दुबे ने बैठक में उदाहरण देते हुए बताया कि एक निकाय ने कचरा गाड़ी दो लाख रुपये में खरीदी, जबकि दूसरे निकाय ने चार डस्टबिन के साथ इसी तरह की गाड़ी के लिए छह लाख रुपये खर्च किए. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कुछ छोटे नगरीय निकायों ने डेढ़ करोड़ रुपये तक के कचरा वाहन क्यों खरीदे, जबकि उनके पास इतने महंगे वाहनों के उपयोग की पर्याप्त जरूरत है या नहीं, इस पर सवाल उठते हैं. विभागीय बैठक में खरीद के दौरान अतिरिक्त सामान जोड़कर कीमत बढ़ाने और पसंदीदा लोगों के माध्यम से खरीद कराए जाने की आशंकाएं भी सामने आईं. इन मामलों में वास्तविक अनियमितता की पुष्टि संबंधित खरीद आदेशों, तकनीकी विवरणों, बिलों और भुगतान रिकॉर्ड की जांच के बाद ही हो सकेगी.
सरकारी खजाने से बड़ी रकम खर्च
पिछले तीन वर्षों में मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों ने जरूरी सामान की खरीद पर करोड़ों रुपये खर्च किए. विभागीय प्रस्तुति के मुताबिक, गारबेज टिपर और डंपर की खरीद पर करीब 65 करोड़ रुपये, स्ट्रीट लाइट पर 49 करोड़ रुपये, ऑक्टागोनल पोल पर 27 करोड़ रुपये और डिसइन्फेक्टेंट की खरीद पर लगभग 18 करोड़ रुपये खर्च किए गए. ये सभी सामान नगरीय निकायों की बुनियादी सेवाओं से जुड़े हैं. कचरा परिवहन, सफाई व्यवस्था और सड़कों पर रोशनी बनाए रखने के लिए इनकी खरीद जरूरी है. हालांकि, अलग-अलग निकायों में एक जैसे सामान की कीमतों में सामने आए बड़े अंतर ने खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं.
AI से होगी निगरानी, गड़बड़ी मिलने होगा एक्शन
नगरीय प्रशासन विभाग सरकारी खरीद में अनियमितताओं की पहचान के लिए डिजिटल निगरानी और AI आधारित विश्लेषण का सहारा ले रहा है. इसका उद्देश्य अलग-अलग नगरीय निकायों में खरीदे गए सामान की कीमतों की तुलना करना और असामान्य दरों वाले मामलों की पहचान करना है. सरकारी खरीद में कीमतों का अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है. लेकिन यदि समान गुणवत्ता और विशिष्टताओं वाले सामान के लिए बिना उचित कारण अधिक भुगतान किया गया है, तो यह जांच का गंभीर विषय है. ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय करने के लिए खरीद प्रक्रिया, बाजार दरों, आपूर्ति, गुणवत्ता और भुगतान के रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी. कुल मिलाकल मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में सरकारी खरीद के आंकड़ों ने वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सरकार की ओर से कार्रवाई के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे इस बात का संकेत देते हैं कि विभागीय स्तर पर अनियमितताओं को लेकर सख्ती की जा रही है. अब निगाहें इस पर रहेंगी कि जांच में किन मामलों में गड़बड़ी प्रमाणित होती है और सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपाई के साथ जिम्मेदार लोगों पर आगे क्या कार्रवाई होती है.
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