मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव की तारीखों का एलान होते ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है. आगामी 30 जुलाई को होने वाली वोटिंग से पहले दतिया का रण पूरी तरह सज चुका है. हालांकि, इस बार का मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच पारंपरिक नहीं रह गया है. आजाद समाज पार्टी (ASP) की तरफ से दामोदर यादव की एंट्री ने इस मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की सोशल इंजीनियरिंग काम आएगी? क्या कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह से उबर पाएगी? या फिर दामोदर यादव दोनों ही बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ेंगे?
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क्यों हो रहा है दतिया में उपचुनाव?
साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने यहां से जीत दर्ज की थी. लेकिन कोऑपरेटिव बैंक धोखाधड़ी से जुड़े एक मामले में दिल्ली की कोर्ट ने उन्हें 3 साल की सजा सुना दी. नियम के मुताबिक, सजा के तुरंत बाद विधानसभा सचिवालय ने राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द कर दी जिसके चलते यह सीट खाली हो गई और अब यहां उपचुनाव होने जा रहा है. दतिया के इतिहास का यह पहला उपचुनाव है.
नरोत्तम मिश्रा की सोशल इंजीनियरिंग बनाम कांग्रेस की कलह
बीजेपी की तरफ से पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पिछले दो महीनों से लगातार मैदान संभाले हुए हैं. पाल, यादव, लोधी और क्षत्रिय समाजों को साधने के लिए बीजेपी का सदस्यता अभियान जोरों पर है. राजनीतिक पंडित इसे नरोत्तम मिश्रा की सोशल इंजीनियरिंग मान रहे हैं. हाल ही में एक व्यापारी कार्यक्रम में नरोत्तम मिश्रा ने जनता से माफी मांगने को अपना हथियार बनाया है.
दूसरी तरफ, कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में जुटी है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट का चयन है. पूर्व विधायक राजेंद्र भारती अपने बेटे के लिए पैरवी कर रहे हैं, तो वहीं अवधेश नायक और घनश्याम सिंह भी दावेदारी ठोक रहे हैं. अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की राह मुश्किल कर सकती है. कांग्रेस की तरफ से जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह ने रैली कर राजेंद्र भारती के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाने की कोशिश की है.
दामोदर यादव की एंट्री से बदला खेल
कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आजाद समाज पार्टी से दामोदर यादव के मैदान में उतरने से आया है. 11 जुलाई को सांसद चंद्रशेखर आजाद खुद दतिया के किला चौक पर जनसभा करने आ रहे हैं. दामोदर यादव का दावा है कि कांग्रेस और बसपा से असंतुष्ट कार्यकर्ता उनके साथ आ रहे हैं. दतिया में पहले जो बीएसपी का कोर वोट बैंक (एससी समुदाय) था, वह अब आजाद समाज पार्टी की तरफ शिफ्ट होता दिख रहा है.
दतिया विधानसभा का जातीय गणित
दतिया की जीत और हार का फैसला यहां के जातीय समीकरण तय करते हैं:
- ओबीसी (OBC) मतदाता: दतिया में करीब 95,000 ओबीसी मतदाता हैं, जो कुल वोटर्स का 53% हैं. इनमें यादव और कुशवाहा-काछी समाज के 17,000, लोधी समाज के 15,000 और बघेल-पाल समाज के 10,000 वोटर्स शामिल हैं.
- सामान्य वर्ग (General Category): यहां सामान्य वर्ग के करीब 60,000 मतदाता हैं, जिनमें सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की (33,000) है. इसके अलावा बनिया, राजपूत, कायस्थ और सिंधी समाज भी प्रभावशाली हैं.
- दलित (SC) मतदाता: अनुसूचित जाति के करीब 58,000 मतदाता हैं, जिनमें अकेले अहिरवार समाज के 33,000 वोटर्स हैं.
- मुस्लिम मतदाता: मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 8,000 है, जो कांटे की टक्कर में निर्णायक साबित हो सकते हैं.
यादव और अहिरवार वोटों में बिखराव का डर
पारंपरिक रूप से दतिया में बीजेपी को ब्राह्मणों और कांग्रेस को अहिरवार समाज का साथ मिलता रहा है. लेकिन इस बार यादव वोटों को लेकर दिलचस्प गणित बन रहा है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव (बीजेपी) का चेहरा होने के कारण यादव वोट बैंक का एक हिस्सा बीजेपी की तरफ आकर्षित हो सकता है. वहीं, दामोदर यादव खुद इसी समाज से आते हैं, जिससे यह पारंपरिक कांग्रेस समर्थक वोट बैंक अब तीन हिस्सों (बीजेपी, कांग्रेस और एएसपी) में बंटता नजर आ रहा है.
दिग्गजों की साख का सवाल
दतिया विधानसभा सीट पर पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय से नरोत्तम मिश्रा का दबदबा रहा है. उन्होंने 2008, 2013 और 2018 में यहां से जीत हासिल की थी, लेकिन 2023 में राजेंद्र भारती ने उन्हें करीब 7,000 वोटों से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था. ऐसे में यह उपचुनाव जहां बीजेपी के लिए अपने पुराने गढ़ को वापस छीनने की लड़ाई है, वहीं कांग्रेस के लिए अपनी साख बरकरार रखने की चुनौती है.
दतिया उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को वोटिंग होगी और 3 अगस्त को नतीजे सामने आएंगे, तभी साफ होगा कि इस त्रिकोणीय दंगल का असली सिकंदर कौन बनता है.
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