दतिया. मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चा के केंद्र में आ गई है. हाल ही में हुए उपचुनाव में जीत हासिल कर विधायक बने कांग्रेस नेता घनश्याम सिंह के निर्वाचन को अब जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. बीजेपी नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने वकील शिवम गौतम के जरिए 17 सितंबर को यह याचिका दायर की है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि घनश्याम सिंह ने अपने चुनावी हलफनामे में 33 साल पुराने एक आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई है.
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1991 के किस मामले में घिरे विधायक?
मामला मई 1991 का है, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निधन के बाद दतिया में उग्र प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ था. उस दौरान पुलिस ने 22 लोगों पर नामजद एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था. याचिकाकर्ता का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि प्रत्याशी को अपने सभी छोटे-बड़े आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे में देना अनिवार्य है. इस जानकारी को छिपाना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) के तहत चुनाव रद्द करने का ठोस आधार बनता है.
घनश्याम सिंह का दावा: 'अपनों और विरोधियों की मिलीजुली साजिश'
कानूनी शिकंजे के बीच विधायक घनश्याम सिंह ने इसे पूरी तरह अपने खिलाफ रचा गया सियासी षड्यंत्र बताया है. घनश्याम सिंह के अनुसार, इस याचिका के पीछे पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती के नजदीकी सहयोगी और बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के रिश्तेदार की मिलीभगत है. उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मिलकर उन्हें कानूनी उलझनों में फंसाने का प्रयास कर रहे हैं.
दतिया सीट का सियासी इतिहास और उपचुनाव के समीकरण
दतिया सीट पर यह विवाद नया नहीं है. यह सीट तब खाली हुई थी जब कांग्रेस के तत्कालीन विधायक राजेंद्र भारती को बैंक धोखाधड़ी मामले में 2 साल की सजा सुनाई गई और उनकी सदस्यता रद्द हो गई. इसके बाद 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में बीजेपी ने पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह युवा चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, जबकि कांग्रेस ने घनश्याम सिंह पर दांव खेला. घनश्याम सिंह ने आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से हराया था. हालांकि उपचुनाव के बाद कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी से निष्कासित कर दिया था.
क्या रद्द हो सकती है विधायकी?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि शपथ पत्र में आपराधिक मुकदमों की जानकारी छिपाना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125A के तहत गंभीर अपराध है. फिलहाल मामला उच्च न्यायालय के विचाराधीन है. अदालत की सुनवाई के बाद ही तय होगा कि 33 साल पुराने इस मामले में कानूनी आधार कितना मजबूत है और क्या दतिया में फिर से उपचुनाव के हालात बनेंगे.
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