मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव का बिगुल फूंक चुका है. नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है और मुख्य मुकाबला पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है. हालांकि, इस बार आजाद समाज पार्टी से दामोदर यादव ने भी मैदान में ताल ठोक दी है, जिससे यहां मुकाबला त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है. फिलहाल दोनों ही प्रमुख दलों, बीजेपी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नामों की आधिकारिक घोषणा नहीं की है. बीजेपी की तरफ से पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही है, लेकिन पार्टी के भीतर दबी जुबान में इस बात की भी चर्चा तेज है कि अगर नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिला तो बीजेपी का 'प्लान बी' क्या होगा.
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नरोत्तम मिश्रा को टिकट न मिलने की स्थिति में बीजेपी के पास क्या हैं विकल्प
यदि बीजेपी आलाकमान किसी कारणवश नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार नहीं बनाता है या उनकी सहमति से किसी अन्य चेहरे को उतारता है, तो ग्राउंड स्तर पर दो से तीन बड़े नाम चर्चा में हैं. पहला नाम रामनरेश यादव का है, जो आईएएस अधिकारी भरत यादव के भाई हैं और जिगना से जिला पंचायत सदस्य हैं. रामनरेश यादव का अपने क्षेत्र के करीब 35 गांवों में अच्छा-खासा वर्चस्व और ग्रामीण वोटर्स पर मजबूत पकड़ मानी जाती है.
हालांकि, उन्हें नरोत्तम मिश्रा खेमे का विरोधी माना जाता है, इसलिए उनकी दावेदारी तभी मजबूत होगी जब दिल्ली और भोपाल का आलाकमान पूरी तरह उनके साथ खड़ा हो. इसके अलावा, दूसरा नाम बीजेपी के जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा का है, जिनकी संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अच्छी पैठ है. दतिया में कुशवाहा समाज का बड़ा वोट बैंक है, जो ब्राह्मण मतदाताओं के लगभग बराबर या उनसे थोड़ा अधिक ही माना जाता है. वहीं तीसरे विकल्प के रूप में जिला पंचायत अध्यक्ष धीरू दांगी का नाम भी सामने आ रहा है, जिन्हें नरोत्तम मिश्रा के करीबी कोटे से जोड़ा जाता है.
कैलाश विजयवर्गीय के बयान से गरमाया अफवाहों का बाजार
दतिया के सियासी गलियारों में अफवाहों का बाजार उस समय और गर्म हो गया जब बीजेपी के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक सवाल के जवाब में घुमा-फिराकर बात की. उन्होंने कहा कि अभी उम्मीदवार तय नहीं है, बल्कि 'भाजपा' तय है और भाजपा का जो भी उम्मीदवार होगा, जनता को उसे जिताना है.
विजयवर्गीय के इस बयान के बाद लोग अपने-अपने अंदाज में कयास लगा रहे हैं कि क्या नरोत्तम मिश्रा का टिकट कट सकता है या फिर उनसे पूछकर किसी दूसरे जमीनी नेता को मैदान में उतारा जा सकता है. चूंकि दतिया नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक जमीन और आधार रहा है, इसलिए माना जा रहा है कि यदि किसी दूसरे को टिकट मिलता भी है, तो उसमें उनकी सहमति और सिफारिश बेहद महत्वपूर्ण होगी.
कांग्रेस खेमे की रणनीति और 8 तारीख के फैसले पर टिकी निगाहें
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी में दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन पार्टी अभी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. कांग्रेस के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि 8 तारीख को यदि हाई कोर्ट से उन्हें स्टे मिल जाता है, तो शायद यह चुनाव ही टल जाए. हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर पर स्टे मिलने की संभावना बेहद कम है. कांग्रेस पार्टी 8 तारीख के बाद ही अपने पत्ते खोलेगी. कांग्रेस की तरफ से फिलहाल पूर्व विधायक राजेंद्र भारती, अवधेश नायक (जो पहले टिकट पाकर छोड़ चुके हैं), और सेवड़ा के पूर्व विधायक घनश्याम सिंह के परिवार से दावेदारी की जा रही है. इसके साथ ही, जिला कांग्रेस अध्यक्ष अशोक दांगी बगदा ने भी अपनी गोपनीय दावेदारी पेश की है.
दतिया का जातीय समीकरण और अन्य दलों की भूमिका
दतिया का यह उपचुनाव जातीय समीकरणों के लिहाज से भी बेहद दिलचस्प और पेचीदा हो चुका है. दतिया की राजनीति में यादव और कुशवाहा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाते हैं, यही वजह है कि दोनों ही पार्टियों के लिए इन वर्गों को साधना बड़ी चुनौती है.
इस बीच, समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने साफ किया है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ उनका कोई आधिकारिक गठबंधन नहीं है, इसलिए वे अखिलेश यादव से अनुमति लेकर पूरी ताकत से प्रत्याशी उतार सकते हैं. वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी अपना उम्मीदवार खड़ा करेगी. आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव भी मैदान में हैं, जिन्हें राजनीतिक जानकार मुख्य रूप से 'वोट कटवा' के रूप में देख रहे हैं, जो कांग्रेस और बीजेपी दोनों के पारंपरिक समीकरणों को बिगाड़ सकते हैं.
दतिया का राजनीतिक इतिहास और साख का सवाल
आपको बता दें कि यह उपचुनाव कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को एक मामले में सजा होने और उन्हें अयोग्य ठहराए जाने के कारण हो रहा है. दतिया सीट का इतिहास देखें तो साल 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनावों में नरोत्तम मिश्रा ने लगातार यहां से जीत हासिल की थी.
हालांकि, साल 2023 के पिछले मुख्य चुनाव में नरोत्तम मिश्रा को राजेंद्र भारती के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. यही वजह है कि यह उपचुनाव कई बड़े क्षत्रपों के लिए साख का सवाल बन गया है. अब देखना यह होगा कि दतिया के इस सियासी शतरंज पर आलाकमान क्या चाल चलता है. इस सीट पर आगामी 30 जुलाई को मतदान होना है, जबकि जनता के फैसले का परिणाम 3 अगस्त को सामने आएगा.
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