Mahakaleshwar Shahi Sawari: भगवान महाकाल को उज्जैन नगरी के राजा के रूप में पूजा जाता है, इसलिए यहां के राजा अपने प्रजा रूपी भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर बाहर आते हैं. इस प्रक्रिया को महाकाल की सवारी नाम दिया गया है. सावन के बाद भादौं की सवारी का खास महत्व है, इस दिन भगवान भक्तों को सात रूपों में दर्शन देते हैं. इस सवारी में सिंधिया राजघराने के लोग शामिल होते हैं. ऐसा ही हुआ, जब सोमवार को शाम पूरे राजसी ठाठ-बाट से सवारी निकली.
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महाकाल भगवान की राजसी सवारी को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कड़े सुरक्षा प्रबंध किए गए थे. जिले कलेक्टर और एसपी खुद सुरक्षा कमान पर निगरानी रखे थे. श्रद्धालुजनों की सुरक्षा के लिए 1500 से अधिक का बल तैनात किया गया, जिसमें पुलिस आरक्षकों के अलावा प्रशासन के अधिकारी भी शामिल हुए सवारी के दौरान आसमान से हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा की गई.
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके बेटे महाआर्यमन सिंधिया ने भगवान महाकाल का शाही अंदाज में पूजन किया और फिर सवारी के साथ चले. सिंधिया ने झांझ बजाई तो महाआर्यमन ने डमरू.
भगवान महाकाल को दिया गया गार्ड ऑफ ऑनर
महाकाल मंदिर के सभामंडप में हुए पूजन के बाद जैसे ही पालकी बाहर आई, तो पुलिस बलों द्वारा पूरे राजकीय सम्मान के साथ भगवान महाकाल को नमन किया गया, गॉड ऑफ ऑनर दिया गया. यहां से देवाधि देव महादेव रजत पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले. भादौं मास की अंतिम सवारी का अंदाज भी राजसी होता है और यात्रा मार्ग भी लम्बा. शंख ध्वनि, डमरू की डमडम, डोल-मंजीरे और जय महाकाल का उद्घोष पूरे माहौल को शिवमय हो गया. 70 भजन मंडलियां, जनजातीय कलाकारों का दल, आधादर्जन बैंड दल, पुलिस बैंड, पुलिस का सशस्त्र बल के अतिरिक्त बहरूपियों की टोली शामिल हुईं.
सिंंधिया राजवंश में शुरू हुई भादौं सवारी की परंपरा
ऐसा जाता है कि सवारी की परम्परा सिंधिया राजवंश द्वारा प्रारम्भ की गई थी. इसी कारण भादौं पक्ष में भी सवारी की परम्परा शुरू की गई. तभी से राजसी परम्परा अनुसार अंतिम सवारी पर राजघराने का कोई न कोई सदस्य उज्जैन आकर भगवान महाकाल का पूजन करता है. ये परम्परा भी वर्षों से चली आ रही है. इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दानी गेट क्षेत्र से भगवान महाकाल का पूजन किया.
भादौं में क्यों निकलती है ये सवारी?
प्रचलित कथाओं के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि श्रावण मास भगवान शिव को प्रिय है और सोमवार का दिन भी. इसलिए विशेषतौर पर सोमवार को भगवान शिव का पूजन करने की परम्परा चली आ रही है. इस साल श्रावण मास की शुरूआत सोमवार से हुई और समापन भी सोमवार को हुआ, इसके बाद भादौं की अमावस्या तिथि तक दो सोमवार होने का संयोग बना. डेढ़ माह की अवधि में सात सोमवार पड़े, जिनमें पांच श्रावण के रहे और दो भादौं के. मराठा दक्षिणी ब्राह्मणों के मतानुसार अमावस्यान्त मास की मान्यता होने से श्रावण मास में शुक्लपक्ष की प्रथमा तिथि से भाद्र मास की अंतिम तिथि अमावस्या तक श्रावण माह माना जाता है. इसीलिए भाद्रपद में भी बाबा महाकाल की दो सवारियां निकालने का विधान वर्षों से चला आ रहा है.
इनपुट- उज्जैन से संदीप कुलश्रेष्ठ की रिपोर्ट..
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