मध्य प्रदेश की राजनीति और कांग्रेस की दिग्गज नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन खारिज होने के मामले में एक बड़ा कानूनी और सियासी मोड़ आ गया है. जिस शिकायत और याचिका को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के उम्मीदवार महेश केवट की शिकायत पर रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज किया था, अब उस मूल याचिका पर ही हैदराबाद की स्थानीय अदालत ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है और उसे याचिकाकर्ता महिला को वापस लौटा दिया है.
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हैदराबाद की स्थानीय अदालत ने इस याचिका को वापस लौटाते हुए तकनीकी आधार का हवाला दिया है. अदालत का कहना है कि इस मामले में विधायक और विधान परिषद सदस्य (MLC) जैसे जन प्रतिनिधियों को भी प्रतिवादी बनाया गया है. नियम के मुताबिक, ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए नामित विशेष अदालत होती है, इसलिए याचिकाकर्ता को संबंधित विशेष अदालत का रुख करना चाहिए.
क्या है पूरा विवाद और फार्म 26 का कनेक्शन?
दरअसल, तेलंगाना में एक महिला ने कांग्रेस नेता कुंभम शिवा कुमार रेड्डी पर शारीरिक उत्पीड़न और जान से मारने की धमकी देने के गंभीर आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी. इसी मामले से जुड़ी एक याचिका में मीनाक्षी नटराजन और तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष बी. महेश कुमार गौड़ को भी प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) बनाया गया था.
बीजेपी ने इसी को मुद्दा बनाते हुए आरोप लगाया कि नटराजन ने अपने चुनावी हलफनामे यानी फॉर्म 26 में इस लंबित शिकायत का जिक्र नहीं किया, जो कि तथ्यों को छुपाने के दायरे में आता है. इसी शिकायत के बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया, जिसके चलते बीजेपी उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीत गए.
फॉर्म 26 पर मीनाक्षी नटराजन की सफाई
इस पूरे विवाद और पर्चा खारिज होने पर कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने अपनी चुप्पी तोड़ी है. उन्होंने फॉर्म 26 का ब्यौरा सामने रखते हुए कहा कि उन्होंने कोई भी जानकारी नहीं छुपाई है. नटराजन ने अपनी बात रखते हुए कहा:
फॉर्म 26 में राजनीतिक दल, मतदाता सूची क्रमांक, फोन नंबर, ईमेल, पैन कार्ड, आयकर रिटर्न और संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य होता है.
आपराधिक मामलों के कॉलम में केवल 'लंबित आपराधिक मामलों' या 'दंडनीय अपराध में दोषी ठहराए जाने' की जानकारी देनी होती है. उनके खिलाफ केवल एक लीगल नोटिस था, जिसका किसी भी अदालत ने अब तक संज्ञान (Cognizance) तक नहीं लिया था. फॉर्म 26 में ऐसा कोई कॉलम नहीं है जहां किसी रैंडम प्राइवेट कंप्लेंट या सिर्फ एक लीगल नोटिस की सूचना दर्ज की जा सके. यदि ऐसा कोई कॉलम होता, तो वे इसकी जानकारी अवश्य देतीं.
मीनाक्षी नटराजन ने कहा-
"मुझ पर सिर्फ एक लीगल नोटिस है, जिसका अब तक अदालत ने संज्ञान भी नहीं लिया है. फॉर्म 26 में ऐसा कोई कॉलम नहीं है जिसमें किसी भी रैंडम प्राइवेट कंप्लेंट के बारे में जानकारी दी जाए. मैंने चुनाव आयोग (ECI) को दिए अपने मेमोरेंडम में पूरी कानूनी जानकारी दे दी थी और कुछ भी छुपाया नहीं गया है."
सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की राह
नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ मीनाक्षी नटराजन ने देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट से उन्हें तुरंत राहत नहीं मिली और शीर्ष अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया. लेकिन इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नटराजन को एक बड़ी स्वतंत्रता दी है कि वे 'चुनाव याचिका' (Election Petition) के माध्यम से इस पूरे फैसले को कानूनी चुनौती दे सकती हैं.
अब जबकि तेलंगाना की अदालत ने मूल याचिका को ही तकनीकी आधार पर वापस कर दिया है, कांग्रेस इसे अपने पक्ष में एक बड़ी नैतिक जीत मान रही है. हालांकि, बीजेपी उम्मीदवार के निर्विरोध निर्वाचन और सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव याचिका दायर करने के निर्देश के बाद अब यह सियासी लड़ाई एक लंबी कानूनी प्रक्रिया में तब्दील हो चुकी है.
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