चंबल का नाम कभी डकैतों के खौफ से गूंजता था, लेकिन आज यहाँ एक नया और उससे भी खतरनाक 'खूनी तंत्र' पनप चुका है- रेत माफिया. बुधवार की सुबह मुरैना के नेशनल हाईवे-552 पर कानून को ट्रैक्टर के पहियों के नीचे बेरहमी से कुचल दिया गया. अपनी ड्यूटी कर रहे वन रक्षक हरिकेश को माफिया ने न सिर्फ टक्कर मारी, बल्कि उनके सिर के ऊपर से ट्रैक्टर गुजार दिया.
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वारदात और राजनीतिक रसूख के आरोप
यह घटना मुरैना के अंबा गेम रेंज के रानपुर तिराहे पर हुई. हरिकेश रेत से भरे एक अवैध ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश कर रहे थे, तभी ड्राइवर विनोद कोरी ने उन पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया. इस मामले में राजनीतिक रसूख के छींटे भी पड़ रहे हैं. चर्चा है कि आरोपी पवन तोमर और सोनू चौहान सत्ताधारी दल से जुड़े हुए हैं.
'पेट माफिया' की थ्योरी और हकीकत
हैरानी की बात यह है कि जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इन्हें हल्का करने की कोशिश करते हैं. पिछले साल मुरैना के ही एक मंत्री एदल सिंह कंसाना ने विधानसभा में अवैध उत्खनन करने वालों को 'पेट माफिया' का नाम दिया था. उन्होंने दावा किया था कि लोग पेट भरने के लिए ऐसा करते हैं और जिले में कोई रेत माफिया नहीं है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या वन रक्षक हरिकेश को मारने वाला भी 'पेट माफिया' ही था?
खाकी की आहुति और बेबस सिस्टम
चंबल की रेत पहली बार लाल नहीं हुई है. इससे पहले साल 2012 में आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार को भी बामोर में अवैध पत्थर ले जा रहे ट्रैक्टर से कुचल दिया गया था. पिछले 5 सालों में ग्वालियर-चंबल संभाग में पुलिस और वन विभाग की टीम पर 50 से अधिक हमले हो चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए रेत माफियाओं को 'आधुनिक डकैत' करार दिया है.
बीहड़ से माइनिंग माफिया तक का सफर
80 और 90 के दशक में जब तक चंबल में डकैतों का बोलबाला था, तब तक नदी के किनारे सुरक्षित थे. डकैतों के सफाए के बाद अब माइनिंग माफिया ने पूरे क्षेत्र को अपने शिकंजे में ले लिया है. मुरैना, भिंड और ग्वालियर अब माफिया के सुरक्षित किले बन चुके हैं. नेताओं की सरपरस्ती और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण इन अपराधियों में कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है.
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