राजनीति में कब किसका पत्ता कट जाए और कब किसका पासा पलट जाए, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. इसका सबसे ताजा और जीता जागता उदाहरण भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा बने हैं. कल तक जो नरोत्तम मिश्रा दतिया की सियासत के अघोषित किंग कहे जाते थे, आज वह अपनी ही पार्टी में हासिए पर आ गए हैं. बीजेपी ने दतिया से नरोत्तम मिश्रा का पत्ता साफ करते हुए इस बार आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है. इस बड़े राजनीतिक उलटफेर के बाद कांग्रेस भी जमकर मजे ले रही है और बीजेपी पर निशाना साध रही है.
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अर्श से फर्श पर आए राजनीति के 'गब्बर'
कहते हैं कि राजनीति में वक्त बदलते देर नहीं लगती. जो नेता कभी अपने तीखे बयानों से विपक्ष को थर-थर कंपाता था और जिसके तेवर भोपाल से लेकर दिल्ली तक सुर्खियां बटोरते थे, आज वही नरोत्तम मिश्रा जनता के बीच हाथ जोड़कर अपनी गलतियों की माफी मांग रहे थे. हालांकि, बीजेपी आलाकमान ने उनकी इस तौबा को कबूल नहीं किया. पार्टी ने इस बार नरोत्तम मिश्रा को किनारे लगाते हुए आशुतोष तिवारी को चुनावी मैदान में उतार दिया है, जिससे नरोत्तम मिश्रा के समर्थक भी सन्न रह गए हैं.
साल 2018 में ही लिखी जा चुकी थी पतन की पटकथा
सियासी जानकारों की मानें तो नरोत्तम मिश्रा के इस सियासी पतन की पटकथा साल 2018 के विधानसभा चुनाव में ही लिखी जा चुकी थी. 2018 के चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें बेहद कड़ी टक्कर दी थी, जिसके चलते नरोत्तम मिश्रा जैसे-तैसे महज 2656 वोटों के बेहद मामूली अंतर से अपनी लाज बचा पाए थे.
उसी समय उनके लिए खतरे की घंटी बज चुकी थी, लेकिन उन पर आरोप लगे कि वे अति-आत्मविश्वास के रथ पर सवार रहे. इसका नतीजा ठीक 5 साल बाद यानी 2023 के चुनाव में देखने को मिला, जब राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को 7742 वोटों से पटकनी देकर दतिया का किला ढहा दिया. अब जब क्षेत्र में उपचुनाव की बारी आई, तो पार्टी ने उनका नाम ही काट दिया.
कांग्रेस ने साधा निशाना और लिए मजे
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद कांग्रेस को बीजेपी पर हमला बोलने का बड़ा मौका मिल गया है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह तो सरासर नाइंसाफी है. कांग्रेस का आरोप है कि मध्य प्रदेश में पिछले दो दशकों से भाजपा की सरकार है, लेकिन इनसे न तो सत्ता संभल रही है और न ही संगठन संभल रहा है.
पूर्व गृह मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा ने तो चुनाव के लिए फॉर्म तक खरीद लिया था, लेकिन आखिरी वक्त पर उनका टिकट काट दिया गया. कांग्रेस के मुताबिक, यह साफ दर्शाता है कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर भारी गुटबाजी चल रही है. कांग्रेस ने दावा किया है कि दतिया के चुनाव में जिस तरीके से छल-कपट हुआ है, उसका जवाब जनता भय, भूख, भ्रष्टाचार, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर भाजपा को सबक सिखाकर देगी.
डबरा से दतिया तक का सियासी सफर
राजनीति के जानकार बताते हैं कि नरोत्तम मिश्रा का मूल आधार कभी दतिया था ही नहीं, वे मूल रूप से डबरा के रहने वाले हैं. साल 1990, 1998 और 2003 में वे डबरा विधानसभा सीट से ही चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. हालांकि, साल 2008 में परिसीमन के बाद जब डबरा सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हो गई, तो नरोत्तम मिश्रा को दतिया शिफ्ट होना पड़ा. दतिया की जनता ने उन्हें साल 2008, 2013 और 2018 में लगातार तीन बार सिर आंखों पर बिठाया और भारी समर्थन दिया. लेकिन सत्ता का रसूख और जमीनी कार्यकर्ताओं से बढ़ती दूरी आखिरकार उन्हें भारी पड़ गई.
एंटी इनकंबेंसी काटने के लिए बीजेपी की नई रणनीति
इस बार के चुनाव में नरोत्तम मिश्रा कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे, जिसके लिए वे रूठे हुए कार्यकर्ताओं और आम जनता को मनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे. लेकिन बीजेपी की नई रणनीति के आगे उनकी एक न चली. क्षेत्र में पैदा हुई एंटी इनकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर को काटने के लिए बीजेपी ने सीधे उनका टिकट ही काट दिया और आशुतोष तिवारी के रूप में एक नए चेहरे को मैदान में उतार दिया.
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना सिर्फ एक नेता का टिकट कटना नहीं है, बल्कि यह बीजेपी आलाकमान का एक बड़ा संदेश है कि पार्टी में कोई भी नेता कद्दावर या अपरिहार्य नहीं होता. बीजेपी के लिए चुनाव में सिर्फ और सिर्फ जीत मायने रखती है, चेहरा नहीं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी बीजेपी की साख बचा पाते हैं या फिर कांग्रेस अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखती है. इसके साथ ही हर किसी की नजर इस बात पर भी टिकी है कि नरोत्तम मिश्रा का अगला कदम क्या होगा.
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