नफरत और बंटवारे की खबरों के बीच मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले से इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो हर किसी का दिल जीत रही है. यहां एक मुस्लिम परिवार अपनी हिंदू बेटी की शादी पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों के साथ संपन्न करा रहा है. सबसे खास बात यह है कि इस शादी में दुल्हन का कन्यादान उसके मुस्लिम पिता अब्दुल्ला हक खान करेंगे.
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14 साल पहले छूटा था माता-पिता का साथ
इस अनोखी कहानी की शुरुआत साल 2010 में हुई थी. दुल्हन नंदिनी परमार ने महज 14 साल की उम्र में एक सड़क हादसे और बीमारी के कारण अपने माता-पिता को खो दिया था. उस कठिन समय में उनकी बड़ी बहन प्रीति (जो अब्दुल्ला खान की पत्नी हैं) और जीजा अब्दुल्ला खान ने नंदिनी को सहारा दिया. अब्दुल्ला खान ने नंदिनी को न केवल अपने घर में जगह दी, बल्कि उसे अपनी सगी बेटी की तरह पाला-पोसा और उच्च शिक्षा दिलाई.
धर्म की दीवार गिराकर दी परवरिश
अब्दुल्ला खान और उनके परिवार ने नंदिनी पर कभी भी धर्म परिवर्तन का दबाव नहीं डाला. नंदिनी बताती हैं कि वह शुरू से ही हिंदू धर्म का पालन करती आई हैं और उनके मुस्लिम परिवार ने हमेशा उनकी आस्था का सम्मान किया है. अब्दुल्ला खान ने नंदिनी को एमकॉम (M.Com) तक पढ़ाया और उनकी आंखों के इलाज के लिए चेन्नई तक लेकर गए. आज जब नंदिनी की शादी की घड़ी आई है, तो पूरा मुस्लिम परिवार हिंदू रस्मों-रिवाजों को पूरे उत्साह के साथ निभा रहा है.
हिंदू रीति-रिवाज से गूंजेंगे मंत्र
4 अप्रैल (आज) राजगढ़ में होने वाली यह शादी पूरी तरह वैदिक मंत्रोच्चार और हिंदू परंपराओं के अनुसार होगी. शादी के कार्ड पर निवेदक के रूप में अब्दुल्ला हक खान का नाम छपा है, जो चर्चा का विषय बना हुआ है. हल्दी, मेहंदी और माता पूजन जैसी रस्में धूमधाम से पूरी की गई हैं. अब्दुल्ला खान का कहना है, "मैंने बचपन में ही तय कर लिया था कि नंदिनी की शादी उसकी मर्जी से और उसके धर्म के हिसाब से ही करूंगा. आज वह दिन आ गया है और मेरा पूरा समाज इसमें मेरा साथ दे रहा है."
समाज को बड़ा संदेश
नंदिनी और उनके पति अंश परमार (ग्वालियर) की यह शादी समाज को एक मजबूत संदेश देती है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है. नंदिनी कहती हैं, "हिंदू-मुस्लिम सब भाई-भाई हैं, हमें मिल-जुलकर रहना चाहिए. मेरे जीजाजी और दीदी ने मेरे लिए जो किया, वह कोई सगा भी नहीं कर पाता."
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