मध्य प्रदेश की सियासत से उपजा साल 2018 का एक पुराना विवाद अब कानूनी गलियारों में एक बड़ी नजीर बनने जा रहा है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान के बीच की यह कानूनी जंग अब जबलपुर हाईकोर्ट की दहलीज पर है. पनामा पेपर्स से जुड़े एक बयान को लेकर शुरू हुआ यह मानहानि का मामला अब प्राकृतिक न्याय और चुनावी अभिव्यक्ति की कानूनी परीक्षा बन चुका है.
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क्या है पूरा मामला?
विवाद की जड़ें 29 अक्टूबर 2018 को झाबुआ में हुई एक चुनावी सभा में हैं. राहुल गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम पनामा पेपर्स लीक मामले से जोड़ते हुए गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि, बाद में राहुल गांधी ने इसे 'कन्फ्यूजन' बताया था, लेकिन कार्तिकेय चौहान ने इसे अपनी और अपने परिवार की छवि खराब करने की जानबूझकर की गई साजिश बताते हुए भोपाल की स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट में आपराधिक मानहानि का केस (धारा 499 और 500 के तहत) दर्ज कराया था.
राहुल गांधी की हाईकोर्ट में दलीलें
निचली अदालत द्वारा समन जारी किए जाने के खिलाफ राहुल गांधी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. उनकी मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
- पक्ष नहीं सुना गया: राहुल गांधी की दलील है कि निचली अदालत ने उनका पक्ष सुने बिना ही सीधे समन जारी कर दिया.
- प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: उन्होंने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है.
- चुनावी भाषण का संदर्भ: उनकी आपत्ति है कि चुनावी भाषणों को संदर्भ से काटकर आपराधिक मामला बनाना लोकतंत्र के लिए खतरा है.
नए कानून (BNSS) का पेच
वरिष्ठ वकीलों के अनुसार, इस केस में एक तकनीकी पेच नए कानून (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता - BNSS) का भी है. नए कानून में प्रावधान है कि किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए. चूंकि मामला 2018 का है लेकिन कोर्ट ने संज्ञान (Cognizance) 2024 में लिया है, इसलिए हाईकोर्ट को यह तय करना होगा कि क्या इस पर नए नियम लागू होंगे.
आगे क्या हो सकता है?
कानूनी जानकारों के मुताबिक इस मामले में तीन संभावनाएं बनती हैं:
- समन पर स्टे: यदि हाईकोर्ट को लगता है कि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो वह समन पर रोक लगा सकता है.
- ट्रायल का सामना: यदि हाईकोर्ट निचली अदालत की प्रक्रिया को सही मानता है, तो राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से भोपाल कोर्ट में पेश होना होगा.
- मामला वापस भेजना: हाईकोर्ट प्रक्रिया में सुधार के लिए मामले को वापस निचली अदालत भेज सकता है.
हाईकोर्ट का आने वाला फैसला यह तय करेगा कि चुनावी मंचों से दी गई राजनीतिक टिप्पणियों और व्यक्तिगत मानहानि के बीच की 'लक्ष्मण रेखा' क्या है.
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