ऐसी मूर्ति जिसकी प्राण प्रतिष्ठा करते ही निकले मूर्तिकार के प्राण, जानें पूरा इतिहास

MP अजब है: प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों को अपने विस्तार में समेटे देवभूमि नरसिंहगढ़ यहां स्थापित भगवान नरसिंह की प्राचीनतम मूर्ति के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां के भगवान नरसिंह का मंदिर अपने आप में अलौकिक है. देश का यह इकलौता मंदिर है जहां भगवान नरसिंह की अष्टधातु की प्रतिमा सुशोभित है. राजगढ़ आजादी के बाद […]

Such a statue, whose life the sculptor died while consecrating it, know the complete history
Such a statue, whose life the sculptor died while consecrating it, know the complete history

पंकज शर्मा

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MP अजब है: प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों को अपने विस्तार में समेटे देवभूमि नरसिंहगढ़ यहां स्थापित भगवान नरसिंह की प्राचीनतम मूर्ति के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां के भगवान नरसिंह का मंदिर अपने आप में अलौकिक है. देश का यह इकलौता मंदिर है जहां भगवान नरसिंह की अष्टधातु की प्रतिमा सुशोभित है. राजगढ़ आजादी के बाद गठित मध्य भारत का सबसे पुराना जिला है. इसको 1948 में ही जिला के रुप में मान्यता दे दी गई थी. राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ का नाम भगवान नरसिंह के नाम से रखा गया था. यहां पर सन 1681 में भगवान नरसिंह की करीब पौने तीन क्विंटल वजनी 280 किलो की अष्टधातु की स्थापना राजा परशुराम ने जब नगर स्थापना की थी उसी समय करवाई थी.

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मंदिर में स्थापित नेपाली शैली की 280 किलो वजनी नृसिंह की प्रतिमा को जो शिल्प है वह पूरे देश में दुर्लभ है. बताया जाता है कि जिस भगवान नृसिंह के नाम पर ही 341 साल पहले नरसिंहगढ़ नगर की स्थापना की गई थी. उस प्रतिमा में भगवान नृसिंह की गोद में पड़े हुए राक्षस हिरण्यकश्यप का चेहरा राक्षस का न होकर हिरण का है, जो अपने आप में बेहद दुर्लभ उदाहरण है.

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वैदिक नियमों और विधि विधान से किया गया था निर्माण
प्राचीन चित्रों और प्रतिमाओं में ऐसा उल्लेख कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता है. जानकारों का मानना है कि संभवत: इसका कोई तंत्रात्मक महत्व हो सकता है, क्योंकि प्रतिमा को नेपाली मूर्तिकार ने बनाया था.

नेपाल की रहस्यमय तंत्र परंपरा पूरे विश्व में अनोखी मानी जाती रही है. दुर्लभ व तंत्र की बात सभी करते है और इस प्रतिमा के बारें में मंदिर की प्रबंधक वयोवृद्ध दुर्गा देवी बैरागी इससे जुड़ी एक रोचक बात बताती हैं. उनका कहना है कि उन्होंने अपने पति और ससुर से सुना था कि मंदिर की प्रतिमा बेहद जागृत है और इसका निर्माण करते समय सभी वैदिक नियमों का पालन किया गया था. एवं स्थापना भी विधि विधान के साथ की गई थी.

पहली आरती के तुरंत बाद मूर्तिकार की मौत
यह इतना खास था कि जैसे ही इधर मंदिर में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के बाद पहली आरती की गई थी उधर नेपाल में मूर्तिकार का निधन हो गया था. नगर के नृसिंह मंदिर में स्थापित भगवान नृसिंह की प्रतिमा आस्था का विषय होने के साथ-साथ अपने शिल्प की विशिष्टताओं की वजह से स्थानीय लोगों के लिए गर्व का विषय भी है.

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कुलदेवता को समर्पित करते हुए किया था नगर का निर्माण
जानकारी के अनुसार सन 1681 में पाटन रियासत के विभाजन के बाद नरसिंहगढ़ और राजगढ़ दो रियासतें अस्तित्व में आईं थी, जो कि मूल रूप से 2 सगे भाइयों की ही थीं. बड़े भाई का राजगढ़ और छोटे भाई का नरसिंहगढ़ रियासते थी. इसलिए दोनों रियासतों की परंपराएं एक ही परिवार से ही संचालित होती थी. नरसिंहगढ़ के संस्थापक महाराज परशुराम ने अपनी रियासत को अपने कुलदेवता औरर आराध्य भगवान नृसिंह को समर्पित करते हुए नरसिंहगढ़ नगर बसाया था. उनके नाम पर पहले मंदिर बनाया, उसके सामने अपने नाम पर परशुराम सागर तालाब का निर्माण किया औरर पहाड़ी पर किला बनाकर रियासत का संचालन शुरू किया. अपनी रियासत को उन्होंने भगवान नृसिंह के सम्मान में नाम भी उन्हीं का दिया-नरसिंहगढ़.

प्रतिमा की शैली में नेपाली शिल्प की झलक
जो प्रतिमा भगवान नरसिंह मंंदिर में स्थापित है. उस प्रतिमा की शैली में नेपाली शिल्प की झलक दिखाई देती है. करीब ढाई फिट ऊंची प्रतिमा का वजन 280 किग्रा है. इसमें भगवान नृसिंह उग्र स्वरूप में हिरण्यकश्यप दैत्य का अपने तीव्र नाखूनों से वध कर रहे हैं और उनके दोनों ओर भक्त प्रह्लाद और उनकी मां कयादू हाथ जोड़े खड़ी हैं. पीछे 2 भागों में फटा हुआ खंभा दिखाई दे रहा है. विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के दशावतारों में भगवान नृसिंह चौथा अवतार बताया गया है. उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए अपने भक्त प्रह्लाद की पुकार पर खंभा फाड़कर दर्शन देते हुए भक्त प्रह्लाद के अत्याचारी और अधर्मी पिता हिरण्यकश्यप का वध किया था.

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