यूरोप में इन दिनों आर्थिक नीतियों और महंगाई को लेकर माहौल काफी गरमाया हुआ है. फ्रांस में छात्रों और युवाओं के प्रदर्शनों के बाद अब यह आग पड़ोसी देश बेल्जियम तक पहुंच गई है. राजधानी ब्रसेल्स में 9 अक्टूबर को हालात उस वक्त बिगड़ गए जब सरकार की बजट कटौती और बढ़ती महंगाई के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए. देखते ही देखते शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हंगामा, तोड़फोड़ और आगजनी शुरू हो गई, जिसे काबू करने के लिए पुलिस को वॉटर कैनन और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा.
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ब्रसेल्स की सड़कों पर भारी बवाल
ट्रेड यूनियनों की अगुवाई में शुक्रवार, 9 अक्टूबर को एक बड़ा विरोध मार्च निकाला गया. इस प्रदर्शन में कर्मचारियों से लेकर बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए. पुलिस के मुताबिक रैली में करीब 30 हजार लोग थे, जबकि आयोजकों का दावा है कि यह संख्या 50 हजार के पार थी. शुरुआत में प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ रहा था, लेकिन सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पास कुछ उपद्रवियों और पुलिस के बीच तीखी झड़प हो गई. काले कपड़े पहने और चेहरे ढके कुछ लोगों ने पुलिस पर पत्थर, कांच की बोतलें और पटाखे फेंकने शुरू कर दिए. इसके बाद सड़कों पर खड़ी गाड़ियों, बसों और सार्वजनिक साइकिलों को आग के हवाले कर दिया गया. हालात इतने बिगड़ गए कि मौके पर तुरंत दमकल की गाड़ियों को बुलाना पड़ा.
पुलिस का एक्शन: वॉटर कैनन और आंसू गैस
हिंसा भड़कते ही दंगा नियंत्रण पुलिस ने मोर्चा संभाला. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया गया और वॉटर कैनन के साथ आंसू गैस के गोले दागे गए. पुलिस का कहना है कि मुख्य मार्च में शामिल ज्यादातर लोग शांति से अपनी बात रख रहे थे, लेकिन कुछ अलग उपद्रवी गुटों ने माहौल बिगाड़ा. हिंसा और तोड़फोड़ के आरोप में पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया है, जिनमें कई नाबालिग भी शामिल हैं.
लोग सड़कों पर क्यों उतरे? क्या हैं प्रमुख मांगें?
इस पूरे बवाल की जड़ है सरकार की प्रस्तावित बजट कटौती. ट्रेड यूनियनों और आम जनता को डर है कि सरकार के इन फैसलों से:
- आम कर्मचारियों और कम आय वाले परिवारों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा.
- पेंशन और सैलरी सिस्टम में होने वाले बदलावों से महंगाई की मार और बढ़ जाएगी.
- जरूरी जनसुविधाओं और सामाजिक योजनाओं के बजट में कटौती होगी.
- प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि सरकार खर्च घटाने का बहाना बनाकर आम जनता पर बोझ डाल रही है.
छात्रों का गुस्सा और फ्रांस का असर
इस आंदोलन में सबसे ज्यादा ऊर्जा छात्रों की तरफ से देखने को मिली. छात्र लगातार बढ़ती फीस, क्लासरूम्स में भीड़ और पढ़ाई से जुड़े खर्चों को लेकर नाराज हैं. कहा जा रहा है कि फ्रांस में चल रहे बड़े छात्र आंदोलनों का असर बेल्जियम के युवाओं पर भी पड़ा है. इससे पहले बेल्जियम के लीज शहर में भी छात्रों के प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ और गिरफ्तारियां हुई थीं. अब ब्रसेल्स की सड़कों पर छात्रों की भारी मौजूदगी ने सरकार पर दबाव और बढ़ा दिया है.
जनजीवन ठप: न बसें चलीं, न उड़ानें समय पर
इस देशव्यापी विरोध और हड़ताल का असर आम जिंदगी पर बुरी तरह पड़ा:
- सार्वजनिक बस और मेट्रो सेवाएं लगभग ठप रहीं.
- उड़ानों में देरी हुई और कई सेवाएं प्रभावित हुईं.
- स्कूल और डे-केयर सेंटर बंद रहने से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा.
आगे क्या?
एक तरफ जहां ट्रेड यूनियन और आम लोग सरकार से इन सख्त आर्थिक फैसलों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार का तर्क है कि देश के बढ़ते कर्ज और ब्याज को संभालने के लिए कड़े कदम उठाना जरूरी है. फ्रांस के बाद बेल्जियम में हुए इस हंगामे ने साफ कर दिया है कि यूरोप में महंगाई और आर्थिक संकट को लेकर आम जनता का सब्र अब जवाब दे रहा है. अब देखना यह होगा कि सरकार बातचीत का रास्ता निकालती है या आने वाले दिनों में यह आंदोलन और जोर पकड़ेगा.
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