संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में क्यूबा पर दशकों से लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने के प्रस्ताव पर मतदान हुआ. इस प्रस्ताव के समर्थन में भारत समेत दुनिया के 130 देशों ने वोट दिया. वहीं, अमेरिका और इज़राइल सहित 17 देशों ने इसका विरोध किया, जबकि 25 देश वोटिंग की प्रक्रिया से दूर रहे. वोटिंग के दौरान भारत ने अपना रुख पूरी तरह साफ रखा. संयुक्त राष्ट्र में भारत की काउंसलर सौम्या नायर ने कहा कि किसी भी देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास में बाधा डालने वाले प्रतिबंधों को समाप्त किया जाना चाहिए. भारत का मानना है कि विवादों का स्थायी समाधान प्रतिबंधों से नहीं, बल्कि कूटनीति और बातचीत के जरिए ही मुमकिन है. भारत ने यह भी उम्मीद जताई कि अमेरिका इन पाबंदियों को खत्म करेगा ताकि क्यूबा की जनता को विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर मिल सकें. इसके साथ ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का हवाला देते हुए क्यूबा में गहराते मानवीय संकट का भी जिक्र किया. रिपोर्ट के अनुसार, क्यूबा में जरूरी दवाओं की भारी किल्लत हो गई है और पिछले पांच सालों में खाद्य उत्पादन आधा रह गया है. वहीं ईंधन प्रतिबंधों के कारण ऊर्जा संकट गहराने से वहां अस्पताल, स्कूल, जलापूर्ति और परिवहन जैसी रोजमर्रा की बुनियादी सेवाएं बुरी तरह चरमरा गई हैं.
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वोटिंग से पहले UN में दोनों देशों के बीच बढ़ा तनाव
इस प्रस्ताव पर मतदान से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्र में दोनों देशों के बीच भारी तनाव भी देखने को मिला. अमेरिकी राजदूत की आलोचना पर क्यूबा के विदेश मंत्री ने कड़ा एतराज जताया, जिसके चलते कुछ देर के लिए सभा की कार्यवाही रोकनी पड़ी. यह विवाद तब और बढ़ गया जब अमेरिका ने क्यूबा के राजनयिक पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए उन्हें देश छोड़ने का आदेश जारी कर दिया.
क्या प्रस्ताव पास होने से हट जाएंगी पाबंदियां?
दरअसल अमेरिका और क्यूबा के बीच यह टकराव 1960 के दशक से चला आ रहा है, जब शीत युद्ध के समय क्यूबा में कम्युनिस्ट सरकार बनने के बाद अमेरिका ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे. हालांकि महासभा में प्रस्ताव पारित होने के बावजूद ये प्रतिबंध तुरंत नहीं हटेंगे, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता है. इन्हें समाप्त करने का अंतिम निर्णय अमेरिका को अपनी राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही लेना होगा, लेकिन 130 देशों का समर्थन यह साफ दर्शाता है कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबंधों की जगह बातचीत और राहत का पक्षधर है.
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