भारत के मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में अब एक ऐसा बदलाव दिखाई दे रहा है, जो सिर्फ मोबाइल फोन बनाने तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक भारत को दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए manufacturing और assembly base के तौर पर देखा जाता रहा, लेकिन अब लक्ष्य इससे आगे बढ़कर ऐसे भारतीय ब्रांड तैयार करना है, जो भारत में डिजाइन और इंजीनियरिंग करके पूरी दुनिया में अपने उत्पाद बेचें।
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इसी बदलाव के बीच Nothing के CEO और को-फाउंडर कार्ल पेई ने CMF को लेकर एक बड़ा ऐलान किया है। Nothing अपने CMF सब-ब्रांड को अलग करके एक स्वतंत्र भारतीय कंपनी बनाने जा रही है। नई कंपनी का मुख्यालय भारत में होगा, उसकी बहुसंख्यक हिस्सेदारी भारतीय शेयरधारकों के पास होगी और उसके पास अपनी टीम तथा भारत में अपना Research & Development यानी R&D ऑपरेशन होगा। Nothing कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखेगी और CMF के साथ शेयरधारक तथा पार्टनर के रूप में काम करती रहेगी।
कार्ल पेई ने अपने खुले पत्र में कहा कि भारत के पास ग्लोबल कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड बनाने के लिए पहले से ही तीन बड़ी ताकतें मौजूद हैं—एक बड़ा manufacturing base, दुनिया के सबसे बड़े smartphone markets में से एक और बड़ा software तथा engineering talent pool। उनके मुताबिक अब अगला कदम देश के भीतर मजबूत engineering और R&D capabilities बनाना है।
यही बात इस पूरे बदलाव को खास बनाती है।
क्योंकि भारत की कहानी अब "Made in India" से आगे बढ़कर "Designed and Engineered in India" की तरफ जाती दिखाई दे रही है।
CMF सिर्फ भारत में बनेगी नहीं, भारत से दुनिया में जाएगी
CMF की शुरुआत Nothing के affordable consumer technology brand के तौर पर हुई थी। अब इसे स्वतंत्र भारतीय कंपनी के रूप में विकसित करने की योजना है।
नई व्यवस्था में CMF को Nothing की engineering expertise, operating system, supplier relationships और global brand-building infrastructure का फायदा मिलता रहेगा। यानी कंपनी पूरी तरह से शून्य से शुरू नहीं करेगी। उसे Nothing की तकनीकी और वैश्विक क्षमताओं का सहारा मिलेगा, लेकिन कंपनी का अपना management, ownership structure, headquarters और R&D भारत में होगा।
कार्ल पेई ने इसे सिर्फ manufacturing project के तौर पर नहीं बल्कि भारत से एक global consumer electronics brand बनाने की कोशिश के रूप में पेश किया है।
उनका लक्ष्य CMF को बड़े पैमाने पर विकसित करना है। रिपोर्टों के मुताबिक कंपनी आगे चलकर सालाना 100 million यानी करीब 10 करोड़ फोन बनाने और बेचने का लक्ष्य रख रही है। अगर यह लक्ष्य हासिल होता है तो CMF का प्रभाव सिर्फ smartphone market तक सीमित नहीं रहेगा। बड़े production volumes का मतलब suppliers के लिए भी बड़ा बाजार होगा और इससे भारत में components और sub-components बनाने वाली कंपनियों के लिए demand पैदा हो सकती है।
यह कहानी आज से शुरू नहीं हुई
CMF को भारत में स्वतंत्र रूप से विकसित करने की योजना Nothing ने पहली बार सितंबर 2025 में सामने रखी थी।
उस समय Nothing और भारतीय electronics manufacturer Optiemus Infracom ने एक strategic joint venture की घोषणा की थी। दोनों कंपनियों ने अगले तीन वर्षों में 100 million डॉलर से ज्यादा निवेश करने और 1,800 से अधिक रोजगार पैदा करने की योजना बताई थी। भारत को CMF के operations, R&D और manufacturing का आधार बनाने की बात भी कही गई थी।
यानी 2025 में जो योजना एक India-based subsidiary और manufacturing ecosystem से शुरू हुई थी, वह 2026 में majority Indian ownership और स्वतंत्र भारतीय कंपनी के मॉडल की तरफ बढ़ रही है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सिर्फ assembly capacity नहीं, बल्कि ownership और product development को भी भारत से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
पिछले एक दशक में भारत ने मोबाइल manufacturing में जबरदस्त विस्तार किया है। सरकार के मुताबिक आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा mobile phone manufacturer है और भारत में इस्तेमाल होने वाले 99.2 फीसदी मोबाइल फोन देश में ही बनाए जाते हैं। 2014 में भारत के पास सिर्फ दो mobile manufacturing units थीं, जबकि अब 300 से ज्यादा units operational हैं।
भारत 2014 में mobile phones का net importer था। अब वह net exporter बन चुका है।
स्मार्टफोन 2025 में भारत का सबसे बड़ा individual exported commodity भी बन चुका है।
लेकिन इसके बावजूद एक बड़ी चुनौती बाकी है।
मोबाइल को भारत में assemble करना और मोबाइल की पूरी technology तथा value chain को भारत में विकसित करना दो अलग बातें हैं।
यही कारण है कि अब सरकार का फोकस manufacturing की अगली सीढ़ी पर है।
62,500 करोड़ की Mobile Phone Manufacturing Scheme क्यों महत्वपूर्ण है?
इसी दिशा में केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में 62,500 करोड़ रुपये की Mobile Phone Manufacturing Scheme यानी MPMS को मंजूरी दी। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल चलेगी।
सरकार का उद्देश्य सिर्फ mobile production बढ़ाना नहीं है। योजना में domestic value addition बढ़ाने, supply chain मजबूत करने, global competitiveness बढ़ाने और Indian mobile brands को विकसित करने पर जोर दिया गया है।
इस योजना में mobile manufacturing के लिए eligible sales पर 2.25 फीसदी से 5 फीसदी तक incentive है।
लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय कंपनियों को design और R&D के लिए अतिरिक्त 3 फीसदी incentive दिया जाएगा।
साथ ही प्रमुख components और sub-assemblies की domestic sourcing पर 1.5 फीसदी तक अतिरिक्त incentive का प्रावधान है।
यानी सरकार का संदेश सिर्फ यह नहीं है कि—
"भारत में मोबाइल बनाइए।"
बल्कि दिशा यह है कि—
"भारत में मोबाइल बनाइए, ज्यादा से ज्यादा components भारत से लीजिए, भारत में उसका design और R&D कीजिए और भारतीय brand को दुनिया तक ले जाइए।"
यहीं CMF जैसी पहल और MPMS की दिशा एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है।
भारत की सबसे बड़ी कमी थी Indian Global Consumer Electronics Brand
भारत के पास बहुत बड़ा consumer market है।
भारत के पास software engineers हैं।
भारत के पास smartphone users की विशाल संख्या है।
भारत के पास अब दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए manufacturing capacity भी है।
लेकिन वैश्विक consumer electronics में भारत से निकलकर दुनिया में बड़ा brand बनाने वाली कंपनियों की संख्या अभी सीमित है।
कार्ल पेई की दलील भी इसी gap पर है।
उनका कहना है कि भारत ने manufacturing ecosystem तैयार कर लिया है, लेकिन अगला चरण engineering और R&D capabilities को मजबूत करना है।
CMF का प्रयोग इस gap को भरने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
अगर CMF भारत में product specifications तय करती है, design करती है, engineering करती है, R&D करती है और फिर उन्हीं products को दुनिया में बेचती है, तो value chain का बड़ा हिस्सा भारत से जुड़ सकता है।
सिर्फ assembly से ज्यादा फायदा क्यों नहीं मिलता?
मान लीजिए किसी smartphone की final assembly भारत में होती है।
फोन भारत में तैयार होकर बाहर चला गया, लेकिन उसके display, camera module, PCB, battery cell, memory, processors या दूसरे महत्वपूर्ण components विदेश से आए।
ऐसे में manufacturing activity और रोजगार तो भारत में पैदा होंगे, लेकिन उस product की economic value का बड़ा हिस्सा उन कंपनियों और देशों के पास जाएगा जहां ये high-value components और intellectual property तैयार हुई है।
यही कारण है कि domestic value addition बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक mobile manufacturing में domestic value addition FY 2023-24 तक लगभग 23 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। नई MPMS का उद्देश्य इसे और गहरा करना है।
Electronics Components Manufacturing Scheme अगली कड़ी
भारत ने इसी समस्या को देखते हुए Electronics Components Manufacturing Scheme यानी ECMS को भी आगे बढ़ाया है।
अगस्त 2026 तक ECMS के तहत 15 राज्यों में 106 projects को मंजूरी दी जा चुकी थी। इन projects में कुल 69,548 करोड़ रुपये के investment का प्रस्ताव है और करीब 74,628 direct jobs की उम्मीद है। इन projects में PCBs, passive components, camera modules, optical transceivers, sub-assemblies और electronics manufacturing के लिए जरूरी capital goods जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
यानी भारत धीरे-धीरे उस ecosystem को बनाने की कोशिश कर रहा है जिसमें मोबाइल की सिर्फ final assembly नहीं, बल्कि उसके पीछे की पूरी supply chain भी देश में विकसित हो।
इससे भारत को क्या फायदा होगा?
पहला फायदा—ज्यादा economic value भारत में रहेगी
अगर components, sub-assemblies और manufacturing equipment भी भारत में बनते हैं तो imported parts पर निर्भरता कम हो सकती है और product की ज्यादा value domestic economy में रह सकती है।
दूसरा फायदा—Supply Chain मजबूत होगी
दुनिया ने पिछले कुछ वर्षों में देख लिया है कि electronics supply chains कितनी vulnerable हो सकती हैं।
किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता manufacturing को प्रभावित कर सकती है।
भारत में component ecosystem मजबूत होने से कंपनियों के लिए एक बड़ा alternative manufacturing base तैयार होगा।
तीसरा फायदा—नौकरियां
MPMS के तहत सरकार करीब 60,000 direct jobs पैदा होने की उम्मीद कर रही है। योजना की अवधि में cumulative mobile phone production करीब 39 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। ([Press Information Bureau][12])
इसके अलावा components, logistics, testing, packaging, warehousing, tooling और ancillary industries में indirect employment पैदा हो सकता है।
चौथा फायदा—Exports
भारत अब सिर्फ अपने बाजार के लिए मोबाइल नहीं बना रहा।
स्मार्टफोन 2025 में भारत का सबसे बड़ा individual export commodity बन चुका है। सरकार के अनुसार भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा mobile phone manufacturer है और देश में इस्तेमाल होने वाले 99.2 फीसदी मोबाइल domestically manufactured हैं। ([Press Information Bureau][6])
अगर CMF जैसे brands भारत से products develop करके दूसरे देशों में बेचते हैं, तो भारत की electronics export story और मजबूत हो सकती है।
पांचवां और सबसे बड़ा फायदा—Indian IP और brands
यही सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है।
एक देश तब ज्यादा economic value हासिल करता है जब उसके पास सिर्फ manufacturing plants नहीं, बल्कि technology, patents, design और global brands भी हों।
Apple का सबसे बड़ा मूल्य सिर्फ उसके factories में नहीं है। Samsung का महत्व सिर्फ उसके manufacturing plants में नहीं है।
इन कंपनियों की ताकत उनके design, technology, software, patents, supply chain और global brand में है।
भारत को भी इसी दिशा में आगे बढ़ना है।
CMF भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण प्रयोग है?
CMF का मॉडल दिलचस्प इसलिए है क्योंकि इसमें तीन चीजें एक साथ दिखाई देती हैं—
भारत में ownership
भारत में R&D
और भारत से global market
Nothing अपनी engineering capabilities, operating system, supplier relationships और global brand infrastructure का सहयोग जारी रखेगी, जबकि CMF को स्वतंत्र भारतीय कंपनी के रूप में विकसित किया जाएगा।
इससे CMF को एक तरफ Nothing की existing technology और experience मिलेगा और दूसरी तरफ भारत में स्वतंत्र product development तथा R&D capability विकसित करने का अवसर मिलेगा।
अगर यह मॉडल सफल रहता है तो दूसरे global technology companies के लिए भी भारत में सिर्फ factory लगाने के बजाय engineering और product development centers स्थापित करने का रास्ता खुल सकता है।
भारत दुनिया में कहां खड़ा है?
मोबाइल manufacturing के मामले में भारत अब दुनिया में दूसरे स्थान पर है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है।
Production volume में भारत ने बड़ी छलांग लगाई है।
लेकिन global consumer electronics में technology ownership, high-end components, intellectual property और globally dominant Indian brands के मामले में अभी लंबा रास्ता तय करना है।
यानी भारत ने पहली मंजिल पार कर ली है—
"हम मोबाइल बना सकते हैं।"
अब दूसरी मंजिल है—
"हम मोबाइल के ज्यादा से ज्यादा components भी बना सकते हैं।"
और तीसरी मंजिल होगी—
"हम मोबाइल की technology, design, software, IP और global brand भी भारत से बना सकते हैं।"
MPMS और ECMS इसी लंबी यात्रा की अलग-अलग कड़ियां हैं।
## PLI से शुरू हुई कहानी अब अगले चरण में
भारत की mobile manufacturing revolution अचानक नहीं हुई।
Production Linked Incentive यानी PLI-LSEM ने इस ecosystem को खड़ा करने में बड़ी भूमिका निभाई। सरकार के अनुसार PLI-LSEM के जरिए mobile manufacturing ecosystem में करीब 96,000 करोड़ रुपये का investment आकर्षित हुआ। इसकी अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई और अब MPMS को अगली कड़ी के तौर पर लागू किया गया है।
अब नीति का जोर सिर्फ production volume पर नहीं बल्कि value addition, domestic components और Indian brands पर ज्यादा है।
यही बदलाव महत्वपूर्ण है।
CMF की कहानी एक बड़े बदलाव का संकेत
CMF का भारत में स्वतंत्र कंपनी बनने का फैसला अपने आप में भारत को electronics superpower नहीं बना देता।
इसके लिए कई चुनौतियां अभी बाकी हैं—semiconductors, displays, advanced components, battery technology, intellectual property, product design और global distribution जैसे क्षेत्रों में भारत को अपनी क्षमता लगातार बढ़ानी होगी।
लेकिन CMF का फैसला यह दिखाता है कि भारत अब global electronics companies के लिए सिर्फ एक विशाल consumer market या low-cost manufacturing destination नहीं रहना चाहता।
भारत की महत्वाकांक्षा अब इससे आगे की है।
भारत चाहता है कि दुनिया के लिए product यहीं बने।
उसकी engineering यहीं हो।
उसका R&D यहीं हो।
उसकी technology और intellectual property यहीं विकसित हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उस product का global brand भी भारत से निकले।
कार्ल पेई ने इसी संभावना को रेखांकित करते हुए कहा है कि भारत ने manufacturing base, विशाल smartphone market और software talent के मामले में मजबूत आधार बना लिया है। अब जरूरत इन ताकतों को engineering और R&D के साथ जोड़ने की है।
अगर CMF इस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर पाती है, तो यह सिर्फ Nothing के लिए corporate restructuring नहीं होगी। यह भारत की electronics journey में एक नए चरण का उदाहरण बन सकती है—
Made in India से Designed in India और अब Built for the World from India
भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा mobile manufacturing देश है। अगली असली लड़ाई नंबर दो से नंबर एक बनने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि मोबाइल की सबसे ज्यादा value—technology, design, IP, components और brand—भारत में पैदा हो।
और CMF का नया भारतीय मॉडल इसी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है।
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