'कोई शर्म होती है, कोई हया होती है', फजलुर रहमान के तंज पर संसद में गूंजे ठहाके

आयुष मिश्रा

• 05:22 PM • 29 Oct 2026

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में मौलाना फजलुर रहमान ने ख्वाजा आसिफ को उन्हीं का चर्चित जुमला सुनाया. जानिए ईरान वार्ता, असीम मुनीर की भूमिका और पूरे विवाद की वजह.

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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पाकिस्तान संसद में ख्वाजा आसिफ की खिंचाई

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मौलाना फजलुर रहमान ने उन्हीं के अंदाज में घेरा

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ईरान वार्ता में असीम मुनीर की मौजूदगी पर बवाल

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पाकिस्तान में सेना बनाम सरकार की बहस तेज


पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सेना और निर्वाचित सरकार की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है. पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पर तंज कसते हुए उन्हीं का चर्चित जुमला दोहरा दिया कि कोई शर्म होती है, कोई हया होती है. उनके इस बयान के बाद सदन में हंसी सुनाई दी और यह घटनाक्रम पाकिस्तानी राजनीति में चर्चा का विषय बन गया. फजलुर रहमान की नाराजगी की वजह ईरान में हुई उच्चस्तरीय क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता थी. इस बैठक में पाकिस्तान की ओर से रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बजाय फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख असीम मुनीर शामिल हुए थे. सऊदी अरब की ओर से रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और तुर्किये की ओर से खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन ने भी बैठक में हिस्सा लिया था. इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान में नागरिक सरकार और सैन्य नेतृत्व की भूमिकाओं को लेकर पुरानी बहस को फिर से सुर्खियों में ला दिया है. हालांकि, किसी एक बैठक में सेना प्रमुख की भागीदारी अपने आप यह साबित नहीं करती कि रक्षा मंत्री के पास कोई अधिकार नहीं है. इस विवाद को समझने के लिए ईरान वार्ता की पृष्ठभूमि और पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था, दोनों पर नजर डालना जरूरी है.

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संसद में क्या बोले मौलाना फजलुर रहमान?

28 अक्टूबर 2026 को नेशनल असेंबली में बोलते हुए मौलाना फजलुर रहमान ने ख्वाजा आसिफ की ओर इशारा किया और सवाल उठाया कि जब ईरान में महत्वपूर्ण रक्षा और सुरक्षा संबंधी बातचीत चल रही है, तब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री संसद में क्यों बैठे हैं. उन्होंने इसी दौरान ख्वाजा आसिफ का चर्चित जुमला दोहराया कि कोई शर्म होती है, कोई हया होती है.  यह टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में आ गई, क्योंकि ख्वाजा आसिफ पहले भी इसी वाक्यांश का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करते समय कर चुके हैं. इस बार फजलुर रहमान ने उसी भाषा को उनके खिलाफ इस्तेमाल किया. सदन में मौजूद सांसदों की प्रतिक्रिया और इस बयान के वीडियो के प्रसार के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा में आ गया.फजलुर रहमान का मुख्य सवाल यह था कि देश की रक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संवाद में रक्षा मंत्री की भूमिका क्या है और पाकिस्तान की ओर से प्रतिनिधित्व का फैसला किस आधार पर किया गया.

असली विवाद क्या है? ईरान में असीम मुनीर की मौजूदगी

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि 26 अक्टूबर 2026 को तेहरान में हुई क्षेत्रीय सुरक्षा वार्ता है. इस बैठक में पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल असीम मुनीर, सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और तुर्किये की राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन ने भाग लिया.तीनों देशों के प्रतिनिधियों ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा की. वार्ता में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की संभावनाओं, पश्चिम एशिया की स्थिति, यमन, लेबनान, फिलिस्तीन और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ.यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने अगस्त 2026 में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. ईरान के साथ हुई बातचीत को क्षेत्रीय तनाव कम करने और सुरक्षा सहयोग के रास्ते तलाशने की कोशिश के रूप में देखा गया. ऐसे संवेदनशील राजनयिक और सुरक्षा मामलों में पाकिस्तान की ओर से सेना प्रमुख का प्रतिनिधित्व करना इस सवाल को जन्म देता है कि देश की विदेश और रक्षा नीति में नागरिक सरकार तथा सैन्य नेतृत्व की भूमिकाएं किस तरह बंटी हुई हैं.

क्या पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं?

पाकिस्तान में सेना का राजनीतिक और सुरक्षा मामलों में प्रभाव लंबे समय से बहस का विषय रहा है. देश के इतिहास में कई बार सैन्य शासन रहा है और निर्वाचित सरकारों के साथ सेना के संबंध भी अलग-अलग दौर में बदलते रहे हैं. इसी पृष्ठभूमि में फजलुर रहमान की टिप्पणी को देखा जा रहा है. उन्होंने यह सवाल उठाया कि जब देश के रक्षा मंत्री सरकार का हिस्सा हैं, तो महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सुरक्षा बैठकों में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व सेना प्रमुख क्यों कर रहे हैं. हालांकि, रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख की भूमिकाएं पूरी तरह एक जैसी नहीं होतीं. रक्षा मंत्री राजनीतिक नेतृत्व और रक्षा मंत्रालय से जुड़े प्रशासनिक तथा नीतिगत मामलों को संभालते हैं, जबकि सेना प्रमुख सैन्य कमान और संचालन से संबंधित जिम्मेदारियां निभाते हैं. किसी विशेष बैठक में किस अधिकारी को भेजा जाता है, यह उस बैठक के एजेंडे, संबंधित समझौते और सरकार की रणनीति पर निर्भर कर सकता है. इसलिए असीम मुनीर की तेहरान यात्रा को केवल रक्षा मंत्री की अनुपस्थिति के आधार पर समझना अधूरा होगा. फिर भी, फजलुर रहमान की टिप्पणी ने पाकिस्तान की नागरिक-सैन्य व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल जरूर उठाया है.

ख्वाजा आसिफ ने क्या जवाब दिया?

फजलुर रहमान की आलोचना के बाद ख्वाजा आसिफ ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि पाकिस्तान पहले ही दो रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है. इनमें एक पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये से जुड़ा समझौता है, जबकि दूसरा पाकिस्तान, कतर, तुर्किये और इंडोनेशिया के बीच हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि इन समझौतों पर हस्ताक्षर के दौरान वह रक्षा मंत्री के रूप में मौजूद थे. उनके अनुसार, तेहरान में हुई बातचीत ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ने से रोकने में मदद की और आगे शांति प्रयासों के लिए अवसर पैदा कर सकती है.इस जवाब से स्पष्ट है कि ख्वाजा आसिफ ने अपनी भूमिका को लेकर उठाए गए सवालों का प्रतिवाद किया. इसलिए पूरे विवाद को केवल एकतरफा आरोप के रूप में देखने के बजाय, फजलुर रहमान की आलोचना और रक्षा मंत्री के जवाब, दोनों को ध्यान में रखना जरूरी है.

'कोई शर्म होती है, कोई हया होती है' वाला जुमला क्यों हुआ वायरल?

पाकिस्तान की राजनीति में कुछ वाक्यांश नेताओं की सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बन जाते हैं. ख्वाजा आसिफ का यह जुमला भी लंबे समय से राजनीतिक बहस और सोशल मीडिया चर्चाओं में इस्तेमाल होता रहा है. फजलुर रहमान ने जब इसे उन्हीं के खिलाफ दोहराया, तो इस बयान को एक राजनीतिक पलटवार के रूप में देखा गया. इस तरह के प्रसंग इसलिए भी तेजी से फैलते हैं, क्योंकि इनमें पुराना राजनीतिक संदर्भ, संसद के भीतर की प्रतिक्रिया और नेताओं के बीच प्रत्यक्ष टकराव एक साथ दिखाई देते हैं. हालांकि, वायरल वीडियो में किसी नेता की प्रतिक्रिया को देखकर उसके मन की स्थिति या पूरे राजनीतिक विवाद का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. बयान के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए पूरा भाषण और संबंधित घटनाक्रम देखना जरूरी है.

पाकिस्तान में सेना और सरकार के संबंधों पर फिर बहस

पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में सेना की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है. राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत के साथ संबंध, अफगानिस्तान, आतंकवाद और क्षेत्रीय कूटनीति जैसे विषयों पर सैन्य नेतृत्व का प्रभाव अक्सर चर्चा में रहता है. दूसरी ओर, देश में निर्वाचित सरकार, संसद और राजनीतिक दलों की भी संवैधानिक भूमिकाएं हैं. इसी कारण नागरिक नेतृत्व और सेना के बीच अधिकारों, जवाबदेही तथा नीतिगत निर्णयों को लेकर बहस समय-समय पर सामने आती रहती है. तेहरान में हुई बैठक और उसके बाद संसद में फजलुर रहमान की टिप्पणी ने इसी बहस को नया संदर्भ दिया है. विपक्षी नेताओं के लिए यह सरकार से सवाल पूछने का अवसर है, जबकि सरकार के सामने यह स्पष्ट करने की चुनौती है कि पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति में अलग-अलग संस्थाओं की भूमिकाएं कैसे निर्धारित की जाती हैं.

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में मौलाना फजलुर रहमान का ख्वाजा आसिफ को उन्हीं का चर्चित जुमला सुनाना राजनीतिक रूप से चर्चा में आ गया है. इस टिप्पणी के पीछे ईरान में हुई वह उच्चस्तरीय बैठक थी, जिसमें पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व सेना प्रमुख असीम मुनीर ने किया. इस घटनाक्रम ने नागरिक सरकार और सैन्य नेतृत्व की भूमिकाओं पर सवाल उठाए हैं. हालांकि, ख्वाजा आसिफ ने अपने जवाब में रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर और क्षेत्रीय तनाव कम करने के प्रयासों का हवाला दिया है. अब इस मामले का महत्व केवल संसद में हुए तंज तक सीमित नहीं है. यह पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था, रक्षा नीति और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच संबंधों को समझने का अवसर भी है. 

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