विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की मंगोलिया यात्रा ने भारत और मंगोलिया के बीच 'रणनीतिक साझेदारी' को एक नई गति दी है। ये यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करने का प्रयास है, बल्कि बदलती भू-राजनीति में भारत की सक्रिय कूटनीति का भी प्रमाण है।
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प्रमुख आकर्षण और सहयोग के नए आयाम:
ऊर्जा और बुनियादी ढांचा: इस दौरे का मुख्य केंद्र भारत के सहयोग से बन रही 1.2 अरब डॉलर की 'मंगोल रिफाइनरी' (Mongol Refinery) रही। यह परियोजना मंगोलिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए मील का पत्थर है और भारत की 'सॉफ्ट पावर' व तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करती है।
आर्थिक और खनिज सहयोग: दोनों देशों ने व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया है। भारत मंगोलिया के प्रचुर खनिज संसाधनों, विशेष रूप से कोकिंग कोल, में रुचि ले रहा है, जो भारत के इस्पात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
विविध क्षेत्रों में भागीदारी: केवल कूटनीति तक सीमित न रहकर, अब यह साझेदारी आईटी (ICT), रक्षा, शिक्षा, संस्कृति और स्मार्ट कृषि जैसे क्षेत्रों में विस्तृत हो रही है।
भू-राजनीतिक महत्व और 'चीन फैक्टर':
मंगोलिया भौगोलिक रूप से रूस और चीन के बीच स्थित है। ऐसे में मंगोलिया के लिए भारत एक महत्वपूर्ण 'तीसरा पड़ोसी' (Third Neighbor) है।
संतुलन की रणनीति: चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए मंगोलिया भारत को एक रणनीतिक भागीदार के रूप में देखता है। भारत की उपस्थिति इस क्षेत्र में क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित होती है।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध: भारत और मंगोलिया साझा बौद्ध धर्म के माध्यम से जुड़े हुए हैं, जो दोनों देशों के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु का काम करता है।
चुनौतियां और भविष्य की राह:
यद्यपि संबंध प्रगाढ़ हो रहे हैं, लेकिन भौगोलिक दूरी और कनेक्टिविटी मुख्य बाधाएं हैं। व्यापार के लिए चीन या रूस के माध्यम से ट्रांजिट पर निर्भरता लागत को बढ़ाती है। बावजूद इसके,भारत और मंगोलिया का बढ़ता सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए लाभकारी है, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करता है।
ये यात्रा स्पष्ट करती है कि भारत अब अपने हितों को केवल पड़ोसी देशों तक ही नहीं, बल्कि मध्य एशिया और उससे आगे तक विस्तार देने के लिए एक स्पष्ट 'रोडमैप' के साथ आगे बढ़ रहा है।
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