रूस से भारत और चीन की ओर होने वाले तेल निर्यात को लेकर वैश्विक राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने रूस की ऊर्जा आय को लेकर भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों पर निशाना साधा है. उनका तर्क है कि रूसी तेल की खरीद जारी रहने से मॉस्को को युद्ध के लिए आर्थिक संसाधन मिलते हैं. ज़ेलेंस्की के इस रुख के बीच अमेरिका में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चर्चा ने भी इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है. दूसरी ओर, रूस ने भारत के साथ अपने ऊर्जा संबंधों का बचाव करते हुए कहा है कि मुश्किल वैश्विक परिस्थितियों में भी उसने भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
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ज़ेलेंस्की ने रूस के तेल कारोबार को लेकर क्या कहा?
यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने एक इंटरव्यू में रूस की अर्थव्यवस्था और उसके ऊर्जा निर्यात को लेकर अपनी चिंता जाहिर की. उनका कहना है कि भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों की ओर रूसी ऊर्जा निर्यात जारी रहने से रूस को महत्वपूर्ण राजस्व मिलता है. ज़ेलेंस्की के मुताबिक, रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए उसके तेल और ऊर्जा उत्पादों की खरीद को सीमित करना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. इसी संदर्भ में उन्होंने रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालने के अमेरिकी प्रयासों का भी समर्थन किया. इस बहस का सीधा असर भारत पर पड़ता है, क्योंकि भारत पिछले कुछ वर्षों में रूसी कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार बन चुका है.
रूस ने भारत के साथ तेल सौदे का किया बचाव
ज़ेलेंस्की के बयान के बाद रूस की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई. रूसी उप विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको ने भारत और रूस के ऊर्जा संबंधों का बचाव करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग को केवल कारोबारी या मुनाफे के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. रूसी पक्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में पैदा होने वाले व्यवधानों और खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों का उल्लेख किया. रूस का तर्क है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद उसने भारत को ऊर्जा आपूर्ति जारी रखी और दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी को बनाए रखा. रूस भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है और ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों का प्रमुख हिस्सा बन चुका है.
भारत के लिए रूसी तेल इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है. देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा होता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत, समुद्री परिवहन की लागत और भू-राजनीतिक तनाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं. यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूसी तेल पर प्रतिबंध और मूल्य-सीमा जैसे कदमों के बीच रूसी कंपनियों ने एशियाई बाजारों, खासकर भारत और चीन की ओर अपना निर्यात बढ़ाया. भारत के लिए रूसी तेल की उपलब्धता ने आयात के स्रोतों को व्यापक बनाने का एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराया. हालांकि भारत केवल रूस पर निर्भर नहीं है और मध्य पूर्व, अमेरिका तथा अन्य देशों से भी कच्चे तेल का आयात करता है.
भारत का तेल आयात: रूस की स्थिति क्या है?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी हाल के वर्षों में काफी बढ़ी है. हालांकि मासिक आधार पर रूसी आयात में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता रहा है. रॉयटर्स की रिपोर्टों में भी भारत के रूसी तेल आयात में अलग-अलग महीनों में बदलाव दर्ज किया गया है. इसका मतलब यह है कि भारत की रणनीति किसी एक सप्लायर पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने की रही है. भारत की तेल खरीद का फैसला कीमत, उपलब्धता, भुगतान व्यवस्था, शिपिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है.
भारत ने क्या कहा?
रूसी तेल खरीद को लेकर पश्चिमी देशों और यूक्रेन की आलोचना के बीच भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि उसकी ऊर्जा खरीद का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी कई मौकों पर भारत के ऊर्जा आयात का बचाव करते हुए कहा है कि भारत को अपने नागरिकों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और वहनीयता सुनिश्चित करनी होती है. भारत का तर्क रहा है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उपलब्ध विकल्पों के आधार पर वह अपने राष्ट्रीय हित और उपभोक्ताओं के हित में फैसले लेता है. भारत-रूस तेल संबंधों की बहस को केवल रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. इसके पीछे भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है. भारत को हर साल बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत होती है. यदि किसी एक क्षेत्र या देश से आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों और भारतीय अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है. यही कारण है कि भारत एक तरफ रूस से तेल खरीद रहा है, वहीं दूसरी तरफ मध्य पूर्व, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य उत्पादक देशों से भी आयात जारी रखता है.
होर्मुज संकट और वैश्विक ऊर्जा बाजार
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और गैस व्यापार मार्गों में से एक है. खाड़ी क्षेत्र से होने वाले ऊर्जा निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है. इस मार्ग को लेकर किसी भी बड़े सुरक्षा संकट से वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. ऐसे माहौल में रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक से होने वाली आपूर्ति भारत के लिए एक अतिरिक्त स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण हो सकती है. हालांकि किसी भी एक देश को भारत की संपूर्ण ऊर्जा सुरक्षा का विकल्प मानना सही नहीं होगा. भारत की रणनीति कई देशों और स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने की रही है.
भारत-रूस तेल संबंध पर आगे क्या होगा?
रूसी तेल को लेकर भारत पर पश्चिमी दबाव और यूक्रेन की आपत्तियां आने वाले समय में भी जारी रह सकती हैं. दूसरी ओर, रूस के लिए भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई बाजार उसके ऊर्जा निर्यात के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं. इस पूरे विवाद में तीन हित एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं. यूक्रेन का रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने का प्रयास, पश्चिमी देशों की रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की नीति और भारत की अपनी ऊर्जा सुरक्षा तथा आर्थिक जरूरतें. इसलिए भारत-रूस तेल व्यापार की कहानी केवल दो देशों के बीच कारोबारी संबंधों की कहानी नहीं है. यह वैश्विक ऊर्जा बाजार, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिमी प्रतिबंधों और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़ा एक बड़ा भू-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है.
रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत और पश्चिमी देशों के बीच मतभेद आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे. भारत के सामने एक तरफ किफायती और सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच अपने विदेश नीति हितों को संतुलित रखने की जरूरत है. रूसी तेल की खरीद पर अंतिम तस्वीर इस बात से तय होगी कि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें, प्रतिबंधों की व्यवस्था, समुद्री परिवहन और भारत की ऊर्जा जरूरतें आने वाले समय में किस दिशा में जाती हैं.
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