भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की दिशा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि हासिल की है. इसरो ने तमिलनाडु के महेंद्रगिरि स्थित इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में अपने 1,100 किलो न्यूटन क्षमता वाले LME-1100 रॉकेट इंजन के फुल-स्केल गैस जनरेटर का पहला सफल इग्निशन परीक्षण किया. लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड मीथेन पर आधारित यह इंजन भारत के भविष्य के भारी प्रक्षेपण यान यानी नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल के विकास से जुड़ा है.
ADVERTISEMENT
LME-1100 इंजन क्यों है खास?
LME-1100 एक उन्नत रॉकेट इंजन है, जिसे लिक्विड ऑक्सीजन-मीथेन प्रणोदक प्रणाली और गैस जनरेटर साइकल के आधार पर विकसित किया जा रहा है. इसकी 1,100 kN की क्षमता इसे भविष्य के भारी प्रक्षेपण यान कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण बनाती है. इस इंजन का विकास भारत की स्वदेशी प्रणोदन तकनीक को मजबूत करने और बड़े अंतरिक्ष अभियानों के लिए आवश्यक क्षमताएं तैयार करने की दिशा में एक अहम कदम है.
गैस जनरेटर क्या है और रॉकेट में इसका क्या काम है?
रॉकेट इंजन के भीतर गैस जनरेटर एक महत्वपूर्ण उप-प्रणाली होती है. इसका मुख्य काम टर्बोपंप को चलाने के लिए गर्म और उच्च ऊर्जा वाली गैसें तैयार करना है. इसके लिए ईंधन और ऑक्सीडाइजर की नियंत्रित मात्रा को जलाया जाता है, जिससे उत्पन्न गैसें टर्बाइन को घुमाती हैं. टर्बाइन से जुड़ा टर्बोपंप ईंधन और ऑक्सीडाइजर को उच्च दबाव पर मुख्य कम्बशन चैंबर तक पहुंचाता है.बड़े रॉकेट इंजनों में प्रणोदक के प्रवाह, दबाव और तापमान को सटीक रूप से नियंत्रित करना बेहद जरूरी होता है. ऐसे में गैस जनरेटर का सफल परीक्षण इंजन की इस महत्वपूर्ण प्रणाली के विकास में अहम उपलब्धि है.
पूरे इंजन को तैयार करने का लक्ष्य मध्य-2027
गैस जनरेटर का सफल इग्निशन परीक्षण LME-1100 के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन इससे पूरे इंजन की उड़ान योग्यता प्रमाणित नहीं होती. अभी इंजन के सभी हिस्सों को एकीकृत करने, उनकी कार्यक्षमता जांचने और निर्धारित मानकों के अनुसार प्रदर्शन सत्यापित करने की जरूरत होगी. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पूरे LME-1100 इंजन को मध्य-2027 तक तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके बाद इंजन को हॉट-फायर क्वालिफिकेशन परीक्षणों की श्रृंखला से गुजरना होगा. इन परीक्षणों के जरिए इंजन की विश्वसनीयता, प्रदर्शन और अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में उसकी क्षमता का आकलन किया जाएगा.
मीथेन ईंधन क्यों बदल सकता है रॉकेट तकनीक का भविष्य?
LME-1100 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका लिक्विड मीथेन और लिक्विड ऑक्सीजन पर आधारित प्रणोदन तंत्र है. इस संयोजन को मेथालॉक्स कहा जाता है. भविष्य के रॉकेट इंजनों में मीथेन को उपयोगी विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि यह दहन संबंधी विशेषताओं, ईंधन घनत्व और संभावित पुन: प्रयोज्यता के बीच एक व्यावहारिक संतुलन प्रदान करती है. मीथेन आधारित प्रणोदन तकनीक पर भारत के साथ-साथ अन्य अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी काम किया जा रहा है. हालांकि, इसके वास्तविक लाभ इंजन के डिजाइन, परिचालन परिस्थितियों और परीक्षण के परिणामों पर निर्भर करते हैं.
री-यूजेबल रॉकेट के लिए मीथेन कितनी उपयोगी?
पारंपरिक केरोसिन आधारित रॉकेट ईंधन के दहन से इंजन के कुछ हिस्सों में कार्बन और कालिख जमा हो सकती है. इसके कारण रखरखाव और सफाई की जरूरत बढ़ सकती है. इसके मुकाबले मीथेन अपेक्षाकृत स्वच्छ दहन प्रदान करती है, जिससे कार्बन जमाव की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है. यह विशेषता उन रॉकेट इंजनों के लिए उपयोगी हो सकती है, जिन्हें भविष्य में बार-बार इस्तेमाल करने की योजना हो. हालांकि, किसी रॉकेट को दोबारा इस्तेमाल करने की क्षमता केवल ईंधन पर निर्भर नहीं करती. इसके लिए इंजन की संरचना, ताप प्रबंधन, सामग्री की मजबूती और प्रत्येक उड़ान के बाद निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं.
3D प्रिंटिंग से बन रहे हैं इंजन के 70 प्रतिशत से अधिक घटक
LME-1100 के विकास में एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग यानी 3D प्रिंटिंग की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इंजन के 70 प्रतिशत से अधिक घटकों का निर्माण इस आधुनिक तकनीक के जरिए भारतीय उद्योग भागीदारों की मदद से किया गया है. 3D प्रिंटिंग में डिजिटल डिजाइन के आधार पर धातु की परतें जोड़कर जटिल पुर्जे तैयार किए जाते हैं. इससे कुछ घटकों में अलग-अलग हिस्सों और जोड़ की संख्या कम की जा सकती है. रॉकेट इंजन में यह तकनीक जटिल आंतरिक चैनल बनाने, डिजाइन में बदलाव करने और निर्माण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करती है.
2,400 kN का मीथेन इंजन: अगली तकनीकी छलांग
LME-1100 के साथ-साथ 2,400 किलो न्यूटन क्षमता वाले लिक्विड ऑक्सीजन-मीथेन इंजन का विकास भी भविष्य के भारी प्रक्षेपण यानों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस इंजन का डिजाइन फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन साइकल पर आधारित है. इस तकनीक में दो प्री-बर्नर इस्तेमाल किए जाते हैं. एक में ईंधन की अधिकता वाली गैस और दूसरे में ऑक्सीजन की अधिकता वाली गैस तैयार की जाती है. ये गैसें टर्बाइन चलाने के बाद मुख्य कम्बशन चैंबर में भेजी जाती हैं. इस तरह टर्बाइन से गुजरने वाला प्रणोदक भी मुख्य दहन प्रक्रिया में शामिल हो सकता है. फुल-फ्लो स्टेज्ड कम्बशन साइकल को अत्यधिक जटिल रॉकेट इंजन तकनीकों में गिना जाता है. यह उच्च दक्षता की संभावना प्रदान करती है, लेकिन इसके विकास के लिए उन्नत सामग्री, सटीक इंजीनियरिंग और व्यापक परीक्षण की जरूरत होती है.
NGLV क्या है और भारत को इसकी जरूरत क्यों है?
नेक्स्ट जनरेशन लॉन्च व्हीकल भारत के भविष्य के भारी प्रक्षेपण यान कार्यक्रम से जुड़ा है. इसका उद्देश्य मौजूदा प्रक्षेपण यानों की तुलना में अधिक पेलोड क्षमता विकसित करना और बड़े अंतरिक्ष अभियानों की जरूरतों को पूरा करना है. NGLV को आंशिक रूप से पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान के रूप में विकसित करने की परिकल्पना भी महत्वपूर्ण है. भविष्य में भारी वैज्ञानिक उपकरणों, बड़े अंतरिक्ष ढांचों और चंद्र अभियानों के लिए अधिक पेलोड क्षमता की जरूरत हो सकती है. LME-1100 और अधिक शक्तिशाली मीथेन इंजन इस तरह के प्रक्षेपण यानों के लिए संभावित प्रणोदन विकल्पों में शामिल हैं. हालांकि, किसी इंजन का वास्तविक उपयोग उसके विकास, परीक्षण और प्रक्षेपण यान के साथ सफल एकीकरण पर निर्भर करेगा.
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए क्यों अहम है यह परीक्षण?
LME-1100 के गैस जनरेटर का सफल इग्निशन परीक्षण स्वदेशी रॉकेट इंजन तकनीक के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. मीथेन आधारित प्रणोदन, 3D प्रिंटिंग और भविष्य के भारी प्रक्षेपण यानों की क्षमताएं भारत को बड़े वैज्ञानिक और मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए तैयार करने में मदद कर सकती हैं. अब इस परियोजना की अगली प्रगति पूरे इंजन के एकीकरण, हॉट-फायर क्वालिफिकेशन और भविष्य के प्रक्षेपण यान के साथ इसकी अनुकूलता पर निर्भर करेगी. इन चरणों के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद ही इंजन के परिचालन इस्तेमाल की दिशा स्पष्ट हो सकेगी.
भारत का चंद्र मिशन लक्ष्य एक लंबी और चुनौतीपूर्ण तकनीकी यात्रा है. LME-1100 के गैस जनरेटर का परीक्षण, मीथेन आधारित इंजन तकनीक और आधुनिक विनिर्माण प्रक्रियाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. आने वाले वर्षों में इंजन के आगे के परीक्षण और NGLV के विकास की प्रगति पर नजर रहेगी.
यह भी पढ़े : ट्रंप ने रूसी तेल पर 100% टैरिफ टाला, भारत को राहत, रुबियो ने बताई वजह
ADVERTISEMENT


