अमेरिका में मिडटर्म चुनाव क्या है, हर दो साल में क्यों होता है और ट्रंप पर इसका क्या असर पड़ेगा?

ऋषि राज

• 07:36 PM • 02 Nov 2026

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है, लेकिन संसद के चुनाव हर दो साल में होते हैं. राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक बीच में होने वाले चुनावों को मिडटर्म इलेक्शन यानी मध्यावधि चुनाव कहा जाता है.

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अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को मिडटर्म चुनाव होने जा रहे हैं. इन चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में बहुमत हासिल करने की लड़ाई होगी. इन चुनावों का फैसला केवल सांसदों की संख्या तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे अगले दो साल तक ट्रंप की सरकार की नीतियों और फैसलों पर भी असर पड़ सकता है.

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क्या होता है मिडटर्म चुनाव?

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है, लेकिन संसद के चुनाव हर दो साल में होते हैं. राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक बीच में होने वाले चुनावों को मिडटर्म इलेक्शन यानी मध्यावधि चुनाव कहा जाता है.

उदाहरण के तौर पर, डोनाल्ड ट्रंप ने जनवरी 2025 में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी. उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक है. ऐसे में नवंबर 2026 में होने वाले चुनाव उनके कार्यकाल के बीच में हो रहे हैं, इसलिए इन्हें मिडटर्म चुनाव कहा जा रहा है.

इन चुनावों में क्या-क्या दांव पर है?

अमेरिकी संसद के दो सदन हैं- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स को प्रतिनिधि सभा और सीनेट को उच्च सदन कहा जा सकता है.

मिडटर्म चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों पर मतदान होता है. वहीं सीनेट की कुल 100 सीटों में से इस बार 35 सीटों पर चुनाव हो रहा है. इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नर के चुनाव भी होंगे.

प्रतिनिधि सभा के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए इसकी सभी सीटों पर हर दो साल में चुनाव होता है. दूसरी तरफ सीनेटर का कार्यकाल छह साल का होता है. सीनेट की सभी सीटों पर एक साथ चुनाव नहीं होता, बल्कि हर दो साल में करीब एक-तिहाई सीटों पर मतदान कराया जाता है.

क्या ट्रंप विदेश नीति और सेना से जुड़े फैसले ले पाएंगे?


हां. अमेरिकी राष्ट्रपति सेना के सर्वोच्च कमांडर (Commander-in-Chief) होते हैं. मिडटर्म चुनाव में हार के बाद भी ट्रंप के पास सेना का नेतृत्व करने, विदेशों के साथ बातचीत करने और कई विदेश नीति संबंधी फैसले लेने का अधिकार रहेगा.

हालांकि, युद्ध की घोषणा, सैन्य खर्च और रक्षा बजट जैसे मामलों में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसलिए बड़े सैन्य अभियानों और लंबे समय तक चलने वाली नीतियों में संसद का विरोध उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. 


हर दो साल में चुनाव क्यों होते हैं?

अमेरिका की चुनाव व्यवस्था इस तरह बनाई गई है कि जनता को हर दो साल में अपने प्रतिनिधियों के कामकाज पर राय देने का मौका मिले. प्रतिनिधि सभा के सदस्य केवल दो साल के लिए चुने जाते हैं, ताकि वे लगातार अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह रहें.

सीनेट में स्थिरता बनाए रखने के लिए सदस्यों का कार्यकाल छह साल रखा गया है और चुनाव अलग-अलग चरणों में होते हैं. इससे संसद में एक साथ बड़े बदलाव की संभावना कम रहती है.

ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं ये चुनाव?

इन चुनावों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस के दोनों सदनों में अपना बहुमत बचा पाएगी? अगर रिपब्लिकन पार्टी बहुमत बरकरार रखती है, तो ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान होगा.

लेकिन अगर डेमोक्रेटिक पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप के कई फैसलों और विधायी प्रस्तावों को रोकने या उनमें बदलाव कराने की उसकी ताकत बढ़ जाएगी. संसद की समितियां सरकारी कामकाज की जांच कर सकती हैं और प्रशासन से जवाब मांग सकती हैं.

हालांकि, मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार का मतलब यह नहीं होगा कि ट्रंप को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा. अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव अलग से होता है और राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है. संसद में बहुमत गंवाने से राष्ट्रपति अपने पद से नहीं हटता.

भारत और अमेरिका की चुनाव व्यवस्था में क्या अंतर है?

भारत और अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में एक बड़ा अंतर है. भारत में लोकसभा चुनाव आमतौर पर हर पांच साल में होते हैं. प्रधानमंत्री और उनकी सरकार लोकसभा में बहुमत पर निर्भर करती है. अगर सरकार लोकसभा में बहुमत खो देती है, तो उसे सत्ता छोड़नी पड़ सकती है.

अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के चुनाव अलग-अलग होते हैं. राष्ट्रपति का चुनाव चार साल में होता है, जबकि कांग्रेस के चुनाव हर दो साल में होते हैं. इसलिए अगर राष्ट्रपति की पार्टी संसद में बहुमत खो देती है, तब भी राष्ट्रपति अपना कार्यकाल पूरा कर सकता है.

भारत की राज्यसभा की तरह अमेरिकी सीनेट भी एक स्थायी सदन है. इसके सभी सदस्यों का कार्यकाल एक साथ खत्म नहीं होता. भारत में राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल छह साल और अमेरिका में सीनेटर का कार्यकाल भी छह साल होता है. दोनों जगह हर दो साल में करीब एक-तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होता है.

क्या मिडटर्म चुनाव ट्रंप की लोकप्रियता का टेस्ट भी हैं?

मिडटर्म चुनाव को राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की राय के तौर पर भी देखा जाता है. महंगाई, रोजगार, अर्थव्यवस्था, आव्रजन नीति और विदेश नीति जैसे मुद्दे मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.

अगर रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान होता है, तो इसे ट्रंप की नीतियों के खिलाफ जनता की नाराजगी के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है. वहीं, अगर पार्टी बहुमत बचाने में सफल रहती है, तो ट्रंप इसे अपने एजेंडे के समर्थन के रूप में पेश कर सकते हैं.

इसलिए 3 नवंबर के मिडटर्म चुनाव सिर्फ अमेरिकी संसद की सीटो का मुकाबला नहीं हैं. ये चुनाव तय करेंगे कि ट्रंप अपने कार्यकाल के अगले दो साल कितनी आसानी से फैसले ले पाएंगे और अमेरिकी राजनीति में डेमोक्रेटिक पार्टी की भूमिका कितनी मजबूत होगी.