कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान देश की आजादी के 80 साल बाद भी आदिवासी समाज और उनके बच्चों की शिक्षा-व्यवस्था की बेहाल स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. इस दौरान उन्होंने घोषणा की कि कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से एक नए कैंपेन 'आदिवासी स्कूल ठीक करो' की शुरुआत की जा रही है. इस कैंपेन के तहत आदिवासी इलाकों में जाकर वहां के स्कूलों के हालात और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की सुविधाओं की जमीनी हकीकत की जांच की जाएगी.
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आदिवासी बच्चों की बदहाली और मौतों पर गंभीर आंकड़े
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दीपके ने बताया कि देशभर के आदिवासी क्षेत्रों से बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर डरावने आंकड़े सामने आए हैं. महाराष्ट्र में पिछले दो सालों के भीतर 590 से अधिक आदिवासी बच्चों की मौत हुई है. इसी तरह मध्य प्रदेश के बालाघाट और अन्य ग्रामीण इलाकों में पिछले कुछ महीनों में दर्जनों बच्चों की जान चली गई है, हालांकि कई मामले ऐसे हैं जो रिपोर्ट्स में सामने ही नहीं आ पाते. छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी हालात कमोबेश ऐसे ही बने हुए हैं. बच्चों की मौत के बाद मिलने वाले मुआवजे को लेकर भी सरकारों पर निशाना साधा गया है, जहां पीड़ितों को महज 2 से 4 लाख रुपये या बकरियां देकर खानापूर्ति कर दी जाती है.
एकलव्य स्कूलों की खस्ता हालत और बुनियादी ढांचे की कमी
CJP संस्थापक ने आदिवासियों के लिए बनाए गए 'एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल्स' (EMRS) की स्थिति को बेहद दयनीय बताया. कुल 720 स्वीकृत स्कूलों में से केवल 477 ही फंक्शनल हैं, यानी लगभग 40 फीसदी स्कूल सुचारू रूप से काम नहीं कर रहे हैं. इसके अलावा, 700 से अधिक स्कूलों में से मात्र 340 के पास ही अपनी परमानेंट बिल्डिंग्स हैं, बाकी स्कूल किराए की जगहों पर चल रहे हैं. जर्जर भवनों और खराब व्यवस्था के कारण कई बार बच्चों को सांप के काटने (Snake Bite) जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी जान चली जाती है. इसके साथ ही, हजारों पद खाली पड़े हैं और शिक्षा के लिए मिलने वाला बजट भी पूरी तरह खर्च नहीं हो रहा है.
उच्च शिक्षा और बड़े संस्थानों में प्रतिनिधित्व की खाई
अभिजीत दीपके ने आगे कहा कि स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी आदिवासी छात्रों की स्थिति काफी पीछे है. जहां देश का नेशनल एनरोलमेंट एवरेज 58 प्रतिशत है, वहीं आदिवासी बच्चों का एनरोलमेंट रेट सिर्फ 51 प्रतिशत है. हायर एजुकेशन में भी यह अंतर लगभग 8 प्रतिशत कम है. देश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे आईआईटी (IITs) और आईआईएम (IIMs) में आदिवासी समुदाय के छात्रों और फैकल्टी सदस्यों की संख्या या तो नगण्य है या कई जगहों पर एक भी फैकल्टी मेंबर इस समाज से नहीं है. खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करने वाले एथलीट इन्हीं समाजों से आते हैं, लेकिन उनके अपने गृह क्षेत्रों में विकास आज भी कोसों दूर है.
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