Abhijit Dipke Mother Father Interview: दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले 36 दिनों तक चले आंदोलन और आमरण अनशन ने देश की राजनीति में वो हलचल पैदा कर दी जो पिछले 12 सालों में कोई विरोधी दल नहीं कर सका. एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के साथ खत्म हुए इस ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन के नायक अभिजीत दीपके आज भले ही पूरे देश के लिए मिसाल बन चुके हैं, लेकिन इस जीत के पीछे उनके परिवार ने खौफ और दहशत के जो 36 दिन गुजारे हैं, उसका दर्द पहली बार सामने आया है.
ADVERTISEMENT
इसी पर उनके माता पिता ने इंडिया टुडे तक से एक्सक्लूसिव बातचीत की है. इस दौरान अभिजीत के माता-पिता भावुक हाे गए. विदेश की सुख-सुविधाएं छोड़कर भारत आए इकलौते बेटे को जान से मारने की धमकियां,16 दिनों तक खुद भूमिगत रहने की मजबूरी और टीवी स्क्रीन पर लाठीचार्ज के खौफनाक मंजर... अभिजीत के माता-पिता इस इन सब पर खुलकर बात की है.
बोस्टन छोड़कर भारत लौटने पर परिवार को लगा था 'टाइम पास'
अभिजीत की मां ने बताया कि जब अभिजीत विदेश (बोस्टन) में पढ़ाई पूरी करने के बाद फॉरेन में अच्छी जॉब की बजाय भारत लौटकर राजनीति और कॉकरोच जनता पार्टी की बातें करने लगा तो उन्हें लगा कि वह टाइम पास कर रहा है. माता-पिता ने उसे बहुत समझाया कि भारत में राजनीति अच्छी है, जहां सच और झूठ का फर्क करना मुश्किल होता है. पिता ने उसे विदेश में ही सेटल होने की सलाह दी थी. लेकिन 3 तारीख को जब अभिजीत ने वापस लौटने और आंदोलन करने का फैसला अटल रखा तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया.
धमकियों के चलते 16 दिनों तक भूमिगत रहा परिवार
अभिजीत के जंतर-मंतर जाने से पहले जब वह संभाजीनगर, नागपुर और जयपुर जैसे शहरों का दौरा कर रहा था तब जयपुर में उस पर चप्पल-लाठियों से हमला भी हुआ था. मां ने रोते हुए बताया कि जयपुर घटना के बाद उन्होंने बेटे से आंदोलन छोड़ने की मिन्नतें की थीं, लेकिन अभिजीत ने कहा कि "बड़े-बड़े लोग मार खाते हैं, मैं तो बहुत छोटा हूं." इसके बाद जब यूट्यूब और रील्स पर धमकियां मिलने लगीं, तो अभिजीत के कहने पर उसके माता-पिता को अपना घर छोड़कर 21 मई से 7 जून तक (16 दिनों के लिए) बाहर किसी अज्ञात स्थान पर रहना पड़ा. इस दौरान परिवार ने अपने मोबाइल पूरी तरह ऑफ रखे ताकि कोई लोकेशन ट्रेस न कर सके और किसी अनहोनी का शिकार न हो.
'लाठियों में लगे थे कीलें, लाइव टीवी पर सनी देओल की बॉर्डर फिल्म जैसा लगा नजारा'
आंदोलन के दौरान हुए लाठीचार्ज को याद करते हुए अभिजीत के पिता भावुक हो गए. उन्होंने अपने जीवन (1984 में एसएससी पास करने के बाद से) का सबसे क्रूर लाठीचार्ज बताते हुए कहा कि लाठियों में कीलें ठोंकी गई थीं. छात्रों और लड़कियों के साथ बर्बरता की गई और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए. पिता ने बताया कि जब टीवी पर डीसीपी संदीप द्वारा ऊपर चढ़े अभिजीत का माइक छीनते देखा गया तो उन्हें फिल्म 'बॉर्डर' का वो सीन याद आ गया जहां पाकिस्तानी सैनिक खंदक में फंसे भारतीय जवानों पर हमला बोलते हैं. पिता ने कहा, "अगर उस दिन नीचे खड़े छात्र अभिजीत को रोकते नहीं और वह नीचे उतर जाता, तो पुलिस वाले उसे जान से मार डालते."
अनशन की खबर से भड़का गुस्सा, 'एक ही इकलौता बेटा है, उसे कुछ हो जाता तो?'
जब अभिजीत ने जंतर-मंतर पर बिना खाए-पिए आमरण अनशन शुरू किया तो इसकी खबर परिवार को टीवी मीडिया से ही मिली. अभिजीत के पिता इतने गुस्से और दर्द में थे कि वे तुरंत दिल्ली जाकर धरना स्थल पर बैठने के लिए तैयार हो गए थे. हालांकि, अभिजीत के दोस्तों ने कसम देकर माता-पिता को दिल्ली आने से रोक दिया ताकि अभिजीत भावुक न हो जाए. मां ने बताया कि घर में रात को डेढ़ बजे भी उठकर चावल बनाकर खाने वाला उनका शांत और सीधा बेटा 36 दिनों तक भूखा-प्यासा बैठा रहा. पिता का बीपी हाई रहता है और मां को बीपी-शुगर की बीमारी है, जिसके चलते 36 दिनों तक न तो दोनों को नींद आई और न ही गले से खाना नीचे उतरा.
'12 साल में जो राजनीतिक दल न कर सके, बेटे ने कर दिखाया'
2:30 बजे जब दोस्त का फोन आया और टीवी पर केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की खबर आई, तब जाकर 36 दिनों से दहशत में जी रहे परिवार ने राहत की सांस ली. मां ने गर्व से कहा कि अभिजीत का कोई अपना भाई-बहन या रिश्तेदार इस परीक्षा में शामिल नहीं था, उसने यह सब देश के मासूम बच्चों के भविष्य के लिए किया. जब अभिजीत घर वापस आया तो मां ने उसे सबसे पहले उसकी पसंदीदा 'दाल खिचड़ी' बनाकर खिलाई. पूर्व सांसद प्रकाश आंबेडकर (बालासाहेब आंबेडकर) के अलावा किसी भी बड़े नेता ने परिवार की सुध नहीं ली थी.
यह भी पढ़ें: जंतर-मंतर पर अनशन करने वाले रंगलाल गुर्जर को पुलिस ने उठाया, थाने से वीडियो बनाकर किया बड़ा खुलासा
ADVERTISEMENT


