BJP के 'अदृश्य चाणक्य': नितिन नवीन की नई टीम में भी क्यों बरकरार है बी. एल. संतोष का दबदबा?

रूपक प्रियदर्शी

18 Aug 2026 (अपडेटेड: Aug 18 2026 9:26 AM)

बीजेपी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बदलने के बावजूद बी. एल. संतोष को राष्ट्रीय संगठन महामंत्री पद पर बरकरार रखा है. आरएसएस पृष्ठभूमि के संतोष को पार्टी का 'अदृश्य चाणक्य' और संगठन का पावरफुल इंजन माना जाता है, जिनकी सहमति नितिन नवीन की नई टीम में भी उतनी ही अहम रहेगी.

 बीएल संतोष
बीएल संतोष
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बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष भले ही पार्टी का 'चेहरा' और 'कप्तान' होता है, लेकिन संगठन महामंत्री वो 'इंजन' है जो बिना थके, बिना खुद को हाइलाइट किए पूरी ट्रेन को खींचता है. यही कारण है कि नितिन नवीन की नई टीम में चेहरों के बदलने के बावजूद बी. एल. संतोष का पद बरकरार रहा.

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बीजेपी के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम बन गई. भारी फेरबदल में पार्टी के कई बड़े-बड़े धुरंधर और पुराने चेहरे बाहर कर दिए गए हैं, तो कई नए चेहरों की एंट्री हुई है. लेकिन सबसे बड़ी चर्चा उस एक चेहरे की है, जिसे टच नहीं किया गया है. बीएल संतोष बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री थे और और वही बने रहेंगे. कहा जाता है कि बीएल संतोष जितना पावरफुल संगठन महामंत्री बने उतना पहले कोई नहीं हुआ. प्रभावशाली भी हैं और मॉडर्न भी. संगठन महामंत्री हमेशा लो-प्रोफाइल होते थे, लेकिन बी. एल. संतोष ने इस पद की परिभाषा को बदलकर इसे 'टेक-सैवी, आक्रामक और रॉकस्टार' इमेज में तब्दील कर दिया है.

जब नितिन नवीन की टीम में लगभग सब कुछ बदल गया, तब भी संगठन की यह सबसे शक्तिशाली 'चाबी' बी. एल. संतोष के पास ही सुरक्षित रही. आखिर कौन हैं बी. एल. संतोष? क्यों बीजेपी में अध्यक्ष से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता है इस पद को? और क्यों इस पद पर रहने वाला व्यक्ति कभी चुनाव नहीं लड़ता? आइए जानते हैं बीजेपी के इस 'अदृश्य चाणक्य' की पूरी इनसाइड स्टोरी. 

बीएल संतोष की कहानी है उडुपी के उस इंजीनियर की जिसने जिसने संघ के लिए त्याग दिया अपना संसार.  1967 में कर्नाटक के उडुपी (हिरियड़का) के मिडिल क्लास ब्राह्मण परिवार में जन्मे बोमराबेट्टू लक्ष्मीजनार्दन संतोष पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहे. उन्होंने दावणगेरे से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और एक टेलीकॉम कंपनी में डिजाइन इंजीनियर काम करने लगे.  करियर शानदार था, लेकिन उन्हें जो करना था वो टेलीकॉम कंपनी का इंजीनियर नहीं कर पा रहा था. 1993 में उन्होंने एक झटके में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी, आजीवन अविवाहित रहने का प्रण लिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए. परिवार और सांसारिक सुखों को हमेशा के लिए पीछे छोड़ संतोष अब पूरी तरह संगठन के हो चुके थे.

 बीजेपी के अदृश्य चाणक्य

अक्सर राजनीति में नेताओं के गॉडफादर या गुरु होते हैं, जो उन्हें आगे बढ़ाते हैं. लेकिन बी. एल. संतोष की कहानी अलग है. एक प्रचारक के रूप में उनका कोई एक इंसान गाइड या फिलॉसफर नहीं रहा, बल्कि आरएसएस की विचारधारा ही उनकी सबसे बड़ी मार्गदर्शक रही है. संघ में व्यक्ति पूजा की जगह 'विचारधारा' की पूजा होती है, और संतोष इसी फिलॉसफी के सबसे बड़े प्रतीक हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने प्रचारकों को बीजेपी में भेजता रहा है. चूंकि ये प्रचारक सांसारिक मोह-माया और चुनावी महत्वाकांक्षा से दूर होते हैं, इसलिए संघ इन्हें बीजेपी में एक 'न्यूट्रल अंपायर' और वैचारिक प्रहरी के रूप में भेजता है, ताकि सरकार और पार्टी दोनों ही संघ की मूल विचारधारा के रास्ते पर अडिग रहें संगठन कला में माहिर प्रचारकों को 'डेपुटेशन' पर बीजेपी में भेजने की पॉलिसी के तहत बीएल संतोष भी पार्टी में भेजे गए. चूंकि कर्नाटक के रहने वाले थे इसलिए पहली पोस्टिंग 2006 में कर्नाटक बीजेपी में हुई जहां उन्हें प्रदेश संगठन महामंत्री बनाया गया. 

हालांकि कर्नाटक की राजनीति में उनका बी. एस. येदियुरप्पा से वैचारिक मतभेद जगजाहिर था, क्योंकि संतोष क्षेत्रीय क्षत्रपों के एकाधिकार और वंशवाद की राजनीति के सख्त खिलाफ रहे हैं. उनकी येदियुरप्पा से नहीं बनती थी. कर्नाटक में येदियुरप्पा की पॉलिटिक्स को पार्टी की इमेज खराब करने वाला बताते रहे. यहां तक कि वो बीएस येदियुरप्पा के बेटे को भी टिकट देने के खिलाफ थे. कहा तो यहां तक जाता है कि साल 2011 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा तो इसके पीछे बीएल संतोष का ही हाथ था. एक थ्योरी ये भी है कि येदियुरप्पा से बहुत ज्यादा विवाद के कारण भी उन्हें दिल्ली बुलाया गया. उनके झगड़े अमित शाह को सुलझाने पड़ते थे. येदियुरप्पा कैंप ने ऐसा कैंपेन भी चलाया कि संतोष दिल्ली में रहकर भी कर्नाटक पर नजर रखते हैं और एक दिन सीएम बनना चाहते हैं.

डेटा कलेक्शन में भी माहिर हैं

संतोष इंजीनियर भी थे और डेटा कलेक्शन के माहिर भी. संघ के हार्डलाइनर प्रचारक के तौर पर जाने जाने वाले संतोष चुनावों के दौरान वार रूम ऑपरेशन के लिए जाने जाते हैं लेकिन एकदम लोप्रोफाइल रहकर लेकिन परदे के पीछे रणनीति बनाने में माहिर माने जाते हैं. 

उन्होंने राजनीति में सोशल मीडिया को भी शामिल किया. 2008 में जब कर्नाटक में पहली बार बीजेपी की सरकार बनी, तो उसके पीछे संतोष का बूथ-मैनेजमेंट ही था. 2008 की जीत बीजेपी के लिए इसलिए बड़ी थी क्योंकि दक्षिण में बीजेपी की पहली सरकार बनी थी. मीडिया में जितना क्रेडिट येदियुरप्पा को गया उतना पार्टी के अंदर बीएल संतोष को मिला.  आगे उन पर नजर पड़ी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की जिन्होंने 2014 में पार्टी की कमान संभाली.  

2014 में मोदी-शाह गुजरात से दिल्ली आए तो बीएल संतोष भी दिल्ली बुलाए गए. उन्हें राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री बनाकर पूरे दक्षिण भारत की जिम्मेदारी दी गई. बड़ा प्रमोशन तब मिला जब 2019 की जीत के बाद 13 सालों तक संगठन महामंत्री रामलाल गए तो बीएल संतोष को बीजेपी का राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बनाया गया. तब से आज तक उन्होंने ये पद रिजर्व किया हुआ है. अमित शाह, जेपी नड्डा के बाद बीएल संतोष अब तीसरे बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ काम करेंगे. 46 साल के युवा बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ 58 साल के बीएल संतोष पार्टी चलाएंगे. 

अमित शाह ने बुलाया था दिल्ली

चुनावी राजनीति में भाजपा का 'पन्ना प्रमुख' (Page In-charge) मॉडल (वोटर लिस्ट के एक पन्ने के मतदाताओं को संभालने की रणनीति) बेहद मशहूर है. बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मॉडल को वैज्ञानिक तरीके से बूथ स्तर पर डिजाइन और सबसे पहले कर्नाटक के चुनावों में सफलतापूर्वक लागू करने का श्रेय बी. एल. संतोष को ही जाता है. अमित शाह ने उनके इसी 'डेटा-ड्रिवेन इलेक्शन मैनेजमेंट' को देखकर उन्हें दिल्ली बुलाया था.

पार्टी में उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो पारंपरिक 'नेपोटिज्म को दरकिनार कर युवा और पढ़े-लिखे चेहरों को मौका देते हैं. कहा जाता है कि पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई को तमिलनाडु बीजेपी का अध्यक्ष बनाकर आक्रामक राजनीति की कमान सौंपना संतोष का ही मास्टरस्ट्रोक था. तेजस्वी सूर्या को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट करने और उन्हें युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाने के पीछे संतोष का हाथ था.

बीजेपी के संविधान में ये व्यवस्था बेहद सोच-समझकर बनाई गई है कि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री का पद हमेशा आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक को ही दिया जाएगा. इस पद पर बैठने वाला व्यक्ति कभी चुनाव नहीं लड़ता, कभी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं बनता. सोच शायद ये कि जो व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ेगा, उसमें कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा या कुर्सी का लालच नहीं होगा. जब कोई लोभ नहीं होगा, तो वह बिना किसी दबाव या पक्षपात के पार्टी हित में कड़े से कड़े फैसले ले सकेगा. वह नेताओं के बीच की गुटबाजी को खत्म करता है और सरकार (मंत्रियों) पर नजर रखता है कि वे पार्टी की मूल विचारधारा से न भटकें. संघ और बीजेपी के बीच तालमेल) का मुख्य रिमोट कंट्रोल होता है.

1998 में बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री-संगठन रहे

जनसंघ के जमाने से लेकर आज की आधुनिक बीजेपी तक, इस पद का इतिहास बहुत कड़े अनुशासन और त्याग का रहा है. सुंदर सिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे, के. एन. गोविंदाचार्य, संजय जोशी, रामलाल के बाद अब बीएल संतोष 2019 से संगठन महामंत्री बने हुए हैं. पीएम मोदी भी गुजरात सीएम  बनने से पहले, 1998 में बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री-संगठन रहे. उनका केस अलग है कि वो आगे सीएम भी बने, चुनाव भी लड़े और आज तीसरी बार पीएम भी हैं.

आज जब नितिन नवीन ने अपनी युवा और नए चेहरों वाली टीम घोषित की, तो बी. एल. संतोष को उसी पद पर बरकरार रखा गया. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि पार्टी अपने सबसे युवा अध्यक्ष के साथ पूरे संगठन का शीर्ष ढांचा नहीं बदलना चाहती थी. नितिन नवीन को संगठन चलाने के लिए बी. एल. संतोष के अनुभव और उनकी कड़क प्रशासनिक शैली की जरूरत है. संतोष को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का अटूट विश्वास हासिल है. चूंकि आगामी समय में कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में चुनावी चक्रव्यूह तैयार करने, टिकटों के बंटवारे में अंतिम मुहर लगाने और आरएसएस की विचारधारा को अक्षुण्ण रखने के लिए बीजेपी हाईकमान को बी. एल. संतोष से बेहतर और कोई विकल्प नहीं सूझा.

साफ है कि भाजपा में चेहरे बदलते रहते हैं, अध्यक्ष बदलते रहते हैं, लेकिन संगठन की जो वैचारिक और सांगठनिक ताकत है, उसकी कमान आज भी उसी इंजीनियर के पास है जिसे दुनिया बी. एल. संतोष के नाम से जानती है. 

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