CBSE Class 12th Controversy: सोशल मीडिया पर इन दिनों सीबीएसई 12वीं बोर्ड की परीक्षा देने वाले एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव की कहानी तेजी से वायरल हो रही है. इस मामले ने न सिर्फ देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्ड की मूल्यांकन सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि लाखों छात्रों और उनके माता पिता की चिंता भी बढ़ा दी है. सवाल ये है कि क्या साल भर दिन-रात जागकर पढ़ाई करने वाले छात्र के साथ ऐसा ब्लंडर हो सकता है कि उसकी पूरी आंसर शीट ही बदल जाए? वेदांत की कहानी कुछ ऐसी ही हकीकत बयां कर रही है.
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क्या है पूरा मामला?
दिल्ली के रहने वाले वेदांत श्रीवास्तव ने CBSE 12वीं की परीक्षा में पूरे साल कड़ी मेहनत की थी. जब बोर्ड का रिजल्ट आया तो वह ये देखकर दंग रह गया कि उसे फिजिक्स के पेपर में बेहद कम नंबर मिले हैं. वेदांत को फिजिक्स में केवल 65 अंक आए थे, जबकि उसके बाकी सभी सब्जेक्ट्स में बेहतरीन नंबर थे. केमिस्ट्री में 91, कंप्यूटर साइंस में 91, फिजिकल एजुकेशन में 91 और इंग्लिश में 86 अंक मिले थे.
फिजिक्स में 65 नंबर आने की वजह से वेदांत का ओवरऑल पर्सेंटेज काफी गिर गया. परिवार का कहना है कि बेहतर स्कोर होने पर वेदांत देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग परीक्षा JEE और भारतीय सेना की 'आर्मी टेक्निकल एंट्री स्कीम' (TES) जैसी बड़ी प्रक्रियाओं में मजबूत दावेदारी पेश कर सकता था, लेकिन इस कम स्कोर ने उसके सपनों और भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया.
आंसर शीट में खेल
हालांकि क्योंकि वेदांत ने उस पेपर को दिया था तो उसे खुद पर पूरा भरोसा था कि उसका फिजिक्स का पेपर बहुत शानदार गया था. किसी टोटलिंग एरर या गड़बड़ी की आशंका को देखते हुए उसने सीबीएसई के नियमों के तहत अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी के लिए अप्लाई किया. 23 मई को जब उसके हाथ में फिजिक्स की आंसर शीट आई, तो उसके और उसके परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई.
वेदांत ने पाया कि आंसर शीट के पहले पन्ने पर उसका रोल नंबर और पर्सनल डिटेल्स तो बिल्कुल सही थीं, लेकिन पन्ना पलटते ही अंदर की लिखावट उसकी हैंडराइटिंग से पूरी तरह अलग थी. अंदर उन सवालों को हल किया गया था, जिन्हें वेदांत ने परीक्षा में छुआ तक नहीं था। इसका सीधा मतलब यह था कि पहले पन्ने को छोड़कर अंदर की पूरी की पूरी आंसर शीट किसी दूसरे छात्र की कॉपी के साथ स्वाइप (बदल) हो गई थी. हालांकि, वेदांत द्वारा मंगवाई गई अन्य विषयों (मैथ्स, इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस) की कॉपियों में उसकी मूल लिखावट ही मौजूद थी.
सीबीएसई के ऑन स्क्रीन मार्किंग पर उठे सवाल
इस साल सीबीएसई ने कॉपियों को जांचने के लिए 'ऑन स्क्रीन मार्किंग' (OSM) यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली का इस्तेमाल किया था. बोर्ड का दावा था कि यह डिजिटल सिस्टम पूरी तरह से पारदर्शी और त्रुटिहीन है, लेकिन वेदांत के मामले ने इस सिस्टम की गंभीर कमियों को उजागर कर दिया है. डिजिटल स्कैनिंग और अपलोडिंग के दौरान कॉपियों के इस घालमेल से छात्र अब यह सवाल उठा रहे हैं कि वेदांत की असली फिजिक्स की कॉपी कहां है और उसे किस आधार पर नंबर दिए गए?
इसके अलावा कई अन्य छात्रों का भी आरोप है कि इस साल डिजिटल स्कैनिंग बेहद खराब क्वालिटी में हुई है, जिससे लिखे हुए आंसर और डायग्राम्स ठीक से दिखाई नहीं दे रहे हैं. छात्रों का दावा है कि इस बार सख्त स्टेप मार्किंग न होने के कारण 12वीं का कुल पास प्रतिशत भी गिरा है.
क्या है ये ऑन स्क्रीन मार्किंग
ऑन-स्क्रीन मार्किंग कॉपियां चेक का एक डिजिटल तरीका है. इसमें छात्रों की असली कागज वाली कॉपियों को स्कैन करके कंप्यूटर पर अपलोड कर दिया जाता है. इसके बाद कॉपियां जांचने वाले टीचर्स उन्हें हाथ से छूने के बजाय कंप्यूटर स्क्रीन पर देखकर ही नंबर देते हैं. सीबीएसई (CBSE) ने इस साल पहली बार इस सिस्टम को चालू किया था.
बोर्ड का दावा था कि इससे कॉपियां ज़्यादा सही तरीके से जांची जाएंगी, नंबरों की हेरफेर जैसी इंसानी गलतियाँ नहीं होंगी और पूरा प्रोसेस साफ-सुथरा रहेगा. बोर्ड ने यह तर्क भी दिया कि विदेशों की परीक्षाओं और कुछ राज्यों के बोर्ड में यह सिस्टम पहले से ही कामयाबी के साथ चल रहा है. दूसरी तरफ, पढ़ाई-लिखाई से जुड़े जानकारों का मानना है कि इतने बड़े देश में इतने बड़े पैमाने पर इस सिस्टम को लागू करने से पहले सीबीएसई को और ज़्यादा तैयारी और टेस्टिंग करनी चाहिए थी.
ट्रोलर्स के निशाने पर वेदांत
एक तरफ जहां वेदांत अपने भविष्य के लिए न्याय की गुहार लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह सोशल मीडिया पर कुछ ट्रोल्स के निशाने पर भी आ गया है. वेदांत के सोशल मीडिया अकाउंट की लोकेशन में 'साउथ एशिया' लिखे होने के कारण कुछ इंटरनेट यूजर्स ने उस पर निशाना साधना शुरू कर दिया और उसे पाकिस्तानी तक कह डाला.
सीबीएसई का पक्ष भी जान लीजिए
इस पूरे विवाद पर सीबीएसई (CBSE) का कहना है कि कंप्यूटर पर कॉपियां जांचने यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग से नंबर बिल्कुल सही मिलते हैं, पूरा काम साफ-सुथरा रहता है और इंसानी गलतियों की गुंजाइश भी कम हो जाती है. हालांकि, बोर्ड ने खुलकर यह बात कभी नहीं मानी है कि उनकी कॉपियां जांचने या स्कैन करने के सिस्टम में कोई बड़ी खराबी या गड़बड़ी हुई है. लेकिन कॉपियां दोबारा जांचने (रीवैल्यूएशन) की आखिरी तारीख को आगे बढ़ाना और तकनीकी एक्सपर्ट्स की मदद लेना इस बात का साफ इशारा है कि बोर्ड इस समस्या को गंभीरता से ले रहा है.
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