Charchit Chehra: 35 दिनों तक प्रदर्शनकारियों को खिलाया खाना, लेकिन फिर दहाड़ मारकर रोने लगे! आखिर कौन हैं जुनैद मलिक, जिनकी हो रही इतनी चर्चा?

रूपक प्रियदर्शी

• 11:58 AM • 29 Jul 2026

Junaid Malik Profile: जंतर-मंतर पर CJP आंदोलन के दौरान 35 दिनों तक हजारों प्रदर्शनकारियों के लिए खाने-पानी का इंतजाम करने वाले जुनैद मलिक आखिर कौन हैं? जानिए कैसे एक मोबाइल रिपेयरिंग और डेयरी का काम करने वाला युवक आंदोलन का सबसे चर्चित चेहरा बन गया, पुलिस कार्रवाई को लेकर उन्होंने क्या आरोप लगाए और सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचना पड़ा.

Junaid Malik Profile
Junaid Malik Profile
Google CTA

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का छात्र आंदोलन एक ऐसा रंगमंच बन गया था, जहां हर तरह के किरदारों का मेला लगा हुआ था. आंदोलन में कुछ लोग कंटेंट क्रिएट करने आए तो कुछ ऐसे भी थे जिनके सेवाभाव से कई लोगों का पेट भर पाया. आज कहानी जुनैद मलिक की. जिस जंतर-मंतर की तपती सड़कों पर बड़े-बड़े वादों की सियासत दम तोड़ देती है, वहां 34 दिनों तक हजारों भूखे बच्चों को उम्मीद का निवाला खिलाने वाला एक नौजवान रातों-रात 'मुजरिम' कैसे बन गया? जो हाथों में बिरयानी और पूड़ी-सब्जी की हांडियां लेकर छात्रों के आंसू पोंछ रहा था, आज उसकी अपनी आंखों में बेबसी के आंसू हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि आंदोलन में नेक काम करने वाले जुनैद को पुलिस ने बीच रास्ते से उठाकर आंखों पर पट्टी लगाई और किसी और शहर में पटक दिया. आंदोलन का स्टार कैसे 35 दिनों में विलेन बन गया? दर्द ऐसा कि देश की सर्वोच्च अदालत तक का रुख करना पड़ गया. ऐसे मोड़ पर क्या सीजेपी फाउंडर अभिजीत दिपके ने भी क्या जुनैद का साथ छोड़ दिया है...इन्हीं सारी चर्चाओं की बीच आज हमारा चर्चित चेहरा बने हैं जुनैद मलिक. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.

Read more!

CJP का आंदोलन और जुनैद बने अन्नदाता!

दिल्ली की तपती सड़कों पर 'कॉकरोच आंदोलन' का शंखनाद हो गया था. पहले भीड़ बहुत ज्यादा नहीं थी इसलिए उनके खाने पीने की चिंता उतनी गहरी नहीं थी. किसी को इल्म नहीं था कि जंतर-मंतर की यह चिंगारी एक दिन सैलाब जुटा लेगी. शुरुआत में कुछ सौ छात्रों की भीड़ थी, लेकिन देखते ही देखते देश के कोने-कोने से नौजवानों का कारवां जंतर-मंतर की तरफ कूच करने लगा. 

चंद दिनों में ही वहां हजारों छात्रों का एक ऐसा समंदर उमड़ पड़ा, जिसकी कल्पना न तो प्रशासन ने की थी और न ही दिपके एंड टीम ने. जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, चिंता होने लगी कि कैसे सैंकड़ों लोगों का पेट भरा जाए. जून की वो झुलसा देने वाली गर्मी, आसमान से बरसती आग और चारों तरफ तैरता पुलिस का कड़ा पहरा. दूर-दराज के गांवों और कस्बों से आए इन गरीब छात्रों के पास न तो ठहरने का ठिकाना था और न ही दो वक्त की रोटी का इंतजाम. मंच से बड़े-बड़े भाषण हो रहे थे, नारों से आसमान गूंज रहा था, लेकिन जैसे ही शाम ढलती, इंकलाब के उन नारों के बीच भूखे पेटों की मूक चीखें दब जाती थीं. इसी सबके बीच एंट्री होती है जुनैद मलिक की! 

गाजियाबाद की एक साधारण सी मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान और डेयरी चलाने वाला यह दुबला-पतला नौजवान, किसी राजनीतिक दल का सिपाही नहीं था. वह जंतर-मंतर पर कोई 'स्टार' बनने या माइक थामने नहीं आया था. जुनैद तो बस आंदोलन के सोशल मीडिया वीडियो देखकर छात्रों का दर्द महसूस करने आया था. लेकिन जब उसने अपनी आंखों से भूख से बिलखते और पानी के लिए तरसते छात्रों को देखा, तो उसके भीतर की इंसानियत जाग उठी. जुनैद ने मंच की तरफ नहीं देखा, उसने सीधे जंतर-मंतर की उस जमीन को अपनी कर्मभूमि चुना. उसने जेब टटोली, अपने दोस्तों को फोन घुमाया और बिना किसी तामझाम के, पहले दिन सिर्फ पानी के कैंप से शुरुआत की. किसी को नहीं पता था कि शांत स्वभाव का, आंखों में चश्मा लगाए यह आम सा दिखने वाला लड़का, आने वाले 35 दिनों तक जंतर-मंतर का 'अन्नदाता' बनने जा रहा है. जहां बड़े-बड़े सूरमाओं के हौसले पस्त हो रहे थे, वहां जुनैद मलिक ने ठान लिया था कि- 'चाहे जो हो जाए, आंदोलन की इस पावन धरती पर आज के बाद कोई छात्र भूखा नहीं सोएगा.'

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के जश्न से गायब रहा जुनैद

आंदोलन दिन पर दिन आक्रामक होता गया. वहां बैठे हर शख्स की जिद्द केवल यही कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो. एक महीने तक इस्तीफा तो नहीं हुआ, लाठी डंडे जरूर चले. जब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी थी, तब करीब एक महीने बाद अचानक होता है शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान का रेजिग्नेशन. वहां मौजूद हर शख्स झूम उठा. लेकिन 35 दिनों तक आंदोलन में मुस्तैदी से काम करने वाले जुनैद मलिक नदारद थे. कोई अता पता नहीं था. उस खुशी में उस क्षण वो शरीक नहीं हो पाए. बाद में असली कहानी पता लगी तो लोग सन्न रह गए.

आखिर कहां गायब हो गए थे जुनैद?

जुनैद का आरोप है कि 24 जुलाई की आधी रात वो एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाकर दिल्ली के आरएमएल अस्पताल से लौट रहे थे. इसी दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों ने जुनैद को रास्ते से उठा लिया. जुनैद का आरोप है कि पुलिस ने करीब पांच छह घंटे तक पुलिस व्हीकल में बैठाकर रखा. इस दौरान जुनैद की आंखों पर पट्टी चढ़ाकर रखी गई. जुनैद के मुताबिक उन्हें धमकाया गया और डराने धमकाने की कोशिश की गई. जुनैद ने कहा कि पुलिस ने उसका फोन तक छीन लिया और फोन अनलॉक करने के लिए मजबूर किया. फिर जुनैद का फोन खंगाला और उनसे पूछा कि उन्हें फंडिंग कौन कर रहा है और आंदोलन में खाना बांटने के पैसे उनके पास कहां से आ रहे हैं. जुनैद के परिवार और रिश्तेदारों के भी बैंक खातों की जांच हो रही है.

जुनैद ने सुप्रीम कोर्ट में फाइल की पेटिशन!

यही सारे दावे जुनैद मलिक ने अपनी उस पेटिशन में किए हैं जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में फाइल की. जुनैद ने बताया कि 5-6 घंटे उन्हें घुमाने के बाद उन्हें देहरादून रोड पर एक सुनसान जगह पर पुलिस ने छोड़ दिया. जुनैद को यकीन नहीं हुआ उनके साथ ये क्या हुआ. उन्होंने किसी तरह वापस दिल्ली की टैक्सी की. जुनैद ने ये भी दावा किया कि उनके माता पिता, परिवारजन के लोकेशन्स पर भी पुलिस ने पहुंचकर उन्हें हिरासत में लिया. कहा कि पुलिस की यह सारी कार्रवाई बिना किसी लिखित दस्तावेज, नोटिस या कानूनी प्रक्रिया का पालन किए की गई. इन सारे आरोपों के साथ ही जुनैद ने मांग की है कि पुलिस को उनके परिवार के खिलाफ किसी भी प्रकार की आगे की दबावपूर्ण कार्रवाई से रोका जाए और अगर कोई जांच की जाती है तो वह पूरी तरह कानून के नियमों के अनुसार हो और आंदोलन में पुलिस हिंसा के खिलाफ कार्रवाई हो.

CJP ने छोड़ दिया जुनैद का साथ?

इस सबके बीच एक चर्चा ये भी शुरु हुई कि क्या सीजेपी एंड टीम इस मुश्किल घड़ी में जुनैद का साथ नहीं दे रही है? एक वायरल वीडियो में जुनैद के हवाले से दावा किया गया कि अभिजीत दिपके ने उन्हें फोन नहीं किया और न ही सीजेपी प्रवक्ता ने. उन्हें मेरा साथ देना चाहिए. ऐसी उड़ती अफवाहों के बीच जुनैद का जवाब आया. जुनैद ने एक वीडियो में साफ किया कि सीजेपी की टॉप लीडरशिप उनके साथ है और किसी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें.

जुनैद के पास कहां से आई इतनी फंडिंग?

बात कर लें जुनैद की फंडिंग की तो जुनैद ने बताया कि उन्होंने आंदोलन में पहले पानी बांटने से शुरुआत की. फिर बिसकुट, नमकीन और देखते ही देखते उनकी 15-20 लोगों की टीम सी बन गई जो साथ मिलकर काम करने लगे. जुनैद ने कहा कि 20 जुलाई के बाद तो उन्हें कुछ करने की खास जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि लोग ही वहां खाना भेज रहे थे. तब से वो केवल मैनेज ही कर रहे हैं.

यहां देखें वीडियो

'हमने तो बेटे को देश को दे दिया...' जंतर-मंतर पर वायरल इरफान के माता-पिता ने बयां की संघर्ष की दास्तान, देखिए खास बातचीत