Charchit Chehra: कौन हैं जस्टिस उज्जल भुइयां जिन्होंने SIR मामले में चुनाव आयोग को ही घेरा? जानिए पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 12:05 PM • 07 Oct 2026

Charchit Chehra Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने NALSAR में वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम हटाने को लेकर गंभीर टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि बिना उचित सुनवाई के मताधिकार से वंचित करना मनमाना है और संविधान के मूल ढांचे पर चोट करता है. जानिए जस्टिस उज्जल भुइयां की पूरी कहानी.

Justice Ujjal Bhuyan Biography
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की अंदरूनी कलह को लेकर इस समय देश में जोरदार राजनीतिक आंदोलन चल रहा है. हर गली, चौक, चौराहे पर सड़क से लेकर संसद तक राहुल गांधी, नेहा बोरा, कॉकरोच जनता पार्टी समेत सिविल सोसाइटी ने मोर्चा खोला हुआ है. इस सबके बीच चुनाव आयोग से जुड़े कई केसेस सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग हैं. सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज जस्टिस उज्जल भुइयां की अदालत में ऐसा कोई केस नहीं चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने एक पब्लिक फोरम पर कुछ ऐसा कह दिया है जिससे पूरे देश में जबरदस्त हंगामा मचा है. ऐसे दौर में जब सुप्रीम कोर्ट पर सरकार के पक्ष में फैसले देने के छींटे उड़े हैं तब जस्टिस भुइयां कोर्ट के बाहर भी न्यायपालिका के रेयर कॉन्शियस कीपर यानी अंतरात्मा की आवाज बनकर उभरे हैं. 

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हैदराबाद की NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी के मंच से सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज जस्टिस भुइयां ने वोटर लिस्ट से करोड़ों नाम गायब होने को संविधान की आत्मा पर चोट और मनमाना करार दिया. NALSAR लॉ यूनिवर्सिटी के उन छात्रों की तारीफ करते हुए बोल्ड और ब्रेव बोल दिया जिन्होंने विरोध करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में आने नहीं दिया. देश के चर्चित चेहरा बने हैं जस्टिस उज्जल भुइयां, न जाने से कहां आया इतना हौसला कि सीटिंग जज होते हुए उन्होंने चुनाव आयोग, सरकार को रगड़ दिया. सीटिंग जज होते हुए उन्होंने क्या कहा दिया कि उनके सीनियर रहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस और जजों ने न्यायिक मर्यादा तोड़ने के आरोप लगा दिए. आइए विस्तार से जानते हैं जस्टिस उज्जल भुइयां की पूरी कहानी. 

जस्टिस भुइयां के साथ जस्टिस रोहिंटन ने मिलाए सुर!

सुप्रीम कोर्ट के जज बोलते हैं और आजकल खूब बोल रहे हैं लेकिन रिटायर होने के बाद. जस्टिस अभय ओक, जस्टिस रोहिंटन नरीमन जैसे जज भी आजकल फायर हैं लेकिन उन्होंने इंतजार रिटायर होने का. 2014 से 2021 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहे जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन ने भी जस्टिस उज्जल भुइयां के सुर में सुर मिलाते हुए चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला. राजकोट में दिए भाषण में कह गए कि आप एक ऐसा चुनाव आयोग बर्दाश्त नहीं कर सकते जो इस तरह से काम करें या गलत तरीके से काम करें. उन्होंने वरडिक्ट दे दिया कि बंगाल में करीब 90 लाख वोटर्स को अवैध रूप से वोट से वंचित किया गया. जस्टिस रोहिंटन ने हैरानी जताई कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर समय रहते रोक क्यों नहीं लगाई. 

चर्चा जस्टिस अभय ओक की भी हो रही हैं. उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर पर्यावरण कार्यकर्ताओं से बोल दिया कि  वो दिमागी नक्सल' या 'अर्बन नक्सल' जैसे राजनीतिक लेबलों से डरे बिना पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अपनी लड़ाई जारी रखें.

संगीत रागी ने किया आग में घी डालने का काम?

जस्टिस उज्जल भुइयां ने जो कहा उससे आग लगी. आग में घी डालने में काम किया बीजेपी समर्थक डीयू प्रोफेसर और पॉलिटिकल कमेंटेटर संगीत रागी ने. संगीता रागी ने दावा किया कि जज साहब की वैचारिक पृष्ठभूमि ही ऐसी है जो उन्हें व्यवस्था विरोधी बनाती है. जस्टिस उज्जल भुइयां के न्यायिक फैसलों के बजाय उनके पारिवारिक इतिहास और राजनीतिक कनेक्शन को निशाना बनाते हुए संगीत रागी ने लिखा-सुना है कि जस्टिस भुइयां के पिता सीपीआई (CPI) से जुड़े रहे हैं. वे कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में दो बार 1983 से 1986 और 1993 से 1996 असम के एडवोकेट जनरल रहे हैं. जस्टिस भुइयां को जुलाई 2011 में कांग्रेस सरकार ने असम का एडिशनल एडवोकेट जनरल नियुक्त किया था.

संगीत रागी ने जो लिखा उसे बदला माना जा सकता है कि जस्टिस उज्जल भुइयां के भाषण से चोट बीजेपी को लगी. संगीत रागी के कहने का मतलब शायद ये हो सकता है कि जज को लेफ्ट विचारधारा का साबित किया जाए जो जानबूझकर ये सब बोले. संगीत रागी के पोस्ट से नई बहस शुरू हुई कि जजों की वंशावली खंगालने और पर्सनल अटैक सीटिंग सुप्रीम कोर्ट जज को डराने के लिए तो नहीं हुआ?

कौन हैं जस्टिस भुइयां?

कानून और न्याय की समझ जस्टिस भुइयां को विरासत में मिली थी. उनका जन्म 2 अगस्त 1964 को असम के गुवाहाटी में हुआ था. उनके पिता सुचेंद्र नाथ भुइयां असम के सीनियर वकील होने के साथ-साथ राज्य के एडवोकेट जनरल भी रह चुके थे. गुवाहाटी के डॉन बॉस्को हाई स्कूल और कॉटन कॉलेज से पढ़ने के बाद दिल्ली आ गए. दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज से आर्ट्स में ग्रेजुएशन (BA) की डिग्री ली. इसके बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए वापस असम लौटे और गुवाहाटी के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से एलएलबी (LL.B.) की डिग्री हासिल की. कानून को और गहराई से समझने के लिए उन्होंने गौहाटी यूनिवर्सिटी से एलएलएम भी पूरा किया. इस मजबूत शैक्षणिक आधार के साथ वे कोर्ट रूम की जंग में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके थे.

16 साल तक रहें आयकर विभाग के वकील

साल 1991 में उन्होंने बार काउंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन कराया और गुवाहाटी हाई कोर्ट की मुख्य बेंच में वकालत की शुरुआत की. उन्होंने न सिर्फ असम बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे अगरतला, शिलॉन्ग, कोहिमा और ईटानगर की बेंचों में भी अपनी कानूनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. वे करीब 16 सालों तक आयकर विभाग के स्थायी वकील रहे. उनकी बेजोड़ कानूनी समझ को देखते हुए साल 2010 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया और जुलाई 2011 में उन्हें असम राज्य का अतिरिक्त एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया.

शानदार काम के बदौलत लगातार बढ़ता रहा कद

सरकारी वकील के रूप में शानदार पारी खेलने के बाद उनके न्यायिक सफर का नया अध्याय शुरू हुआ. अक्टूबर 2011 को उन्हें गुवाहाटी हाई कोर्ट का एडिशनल जज नियुक्त किया गया, जो बाद में स्थायी जज बने. इसके बाद उनका तबादला देश के सबसे बड़े हाई कोर्ट्स में से एक बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर तेलंगाना हाई कोर्ट में हुआ. जून 2022 में वे तेलंगाना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने. शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के कारण सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश की और 14 जुलाई 2023 को उन्होंने चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ली. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस भुइयां का कार्यकाल 2029 तक है लेकिन वो कभी चीफ जस्टिस नहीं बन पाएंगे. सीनियरिटी लिस्ट में वो 18वें स्थान पर आते हैं. उनका कार्यकाल 1 अगस्त 2029 को खत्म होगा. 

जस्टिस भुइयां पर अब उठ रहे सवाल!

जस्टिस भुइयां ने धमाकेदार भाषण से कोर्ट रूम के बाहर समाज, मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चल रही उन तमाम चर्चाओं और आशंकाओं पर एक तरह से नैतिक मुहर लगा दी जिन्हें अब तक केवल राजनीतिक आरोप माना जा रहा था. एक सिटिंग जज का व्यवस्था को इस तरह आईना दिखाने और सीजेआई सूर्यकांत का विरोध करने वाले छात्रों की पीठ थपथपाने से यह विवाद अब केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के भीतर के वैचारिक अंतर्विरोधों का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया है.

पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई, पूर्व जज एस एन ढींगरा, आर एस सोढ़ी जैसे कई पूर्व जजों ने सिटिंग जज के इस कदम पर गंभीर सवाल उठा दिए हैं. पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई ने कड़ी आपत्ति के साथ कि कहा कि जब SIR और चुनाव आयोग का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तो एक सिटिंग जज को सार्वजनिक मंच से ऐसी टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए. पूर्व जज एस.एन. ढींगरा ने कहा कि यह बयान सुप्रीम कोर्ट के जज की मर्यादा और सीमा से बिल्कुल बाहर है, और बयान देने से पहले उन्हें हजार बार सोचना चाहिए था क्योंकि उनके पास मामले से जुड़े सभी जमीनी तथ्य मौजूद नहीं थे.

पहले भी रहे हैं चर्चा में! 

जस्टिस उज्जल भुइयां की चर्चा अब थोड़ी ज्यादा हो गई लेकिन बोल्ड एंड ब्रेव फेस वो पहले भी दिखा चुके हैं. अरविंद केजरीवाल को जमानत देते हुए सीबीआई से कह दिया कि उसे पिंजरे में बंद तोते की छवि से बाहर आना चाहिए और यह दिखना चाहिए कि वह एक स्वतंत्र जांच एजेंसी है. बिलकिस बानो केस में दोषियों की समय से पहले रिहाई को रद्द करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच में था. जस्टिस बी.वी. नागरत्ना के साथ शामिल जस्टिस उज्जल भुइयां ने गुजरात सरकार के रिहाई के फैसले को 'कानून के शासन का गंभीर उल्लंघन' और 'अधिकारों का दुरुपयोग' बताया था. पिछले महीने बढ़ते मुकदमों पर कह गए कि आजकल देश में कविताएं पढ़ने, नारे लगाने, सोशल मीडिया पर कमेंट करने, स्टैंड-अप कॉमेडी करने और यहां तक कि किताबों व फिल्मों के नाम जैसी मामूली और फालतू बातों पर धड़ाधड़ आपराधिक केस दर्ज किए जा रहे हैं', जो नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रहार है.

अब सबसे बड़ा सवाल है कि, क्या उनके भाषण से चुनाव आयोग के खिलाफ चल रहे मुकदमों पर कोई कानूनी असर पड़ेगा? स्थिति ये है कि किसी जज का सार्वजनिक भाषण कोर्ट रूम में कानूनी सबूत नहीं बन सकता. अदालतें केवल अपने लिखित फैसलों से बोलती हैं. लेकिन हां, देश के इतने वरिष्ठ जज के बयान से सिस्टम पर एक बहुत बड़ा 'नैतिक और वैचारिक दबाव' जरूर बन गया है. यह भी मुमकिन है कि निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जस्टिस भुइयां भविष्य में इस केस की सुनवाई करने वाली बेंच से खुद को अलग (Recuse) करना पड़े.

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