पीयूष मिश्रा फिल्मों के एक्टर हैं, थियेटर के भी एक्टर हैं, सिंगर हैं जो अपने गीत खुद लिखते हैं. मल्टी टैलेंटेड पीयूष मिश्रा अचानक चर्चा में आए जब उन्हें रांची में छात्रों के आंदोलन में देखा गया. रांची के छात्र आंदोलन की भी उतनी ही चर्चा है जितनी जंतर मंतर वाले आंदोलन की हुई लेकिन जितने सेलिब्रिटी जंतर मंतर पर आए उतने रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में नहीं देखे गए. देखें गए तो बस पीयूष मिश्रा जिन पर टैग लगा है बॉलीवुड सेलिब्रिटी का. जब कोई नहीं जा रहा था तब अकेले पीयूष मिश्रा चले गए. गए भी और हाथ में माइक लेकर अपना ही लिखा गाना आरंभ है प्रचंड, बोल मस्तकों के झुंड सुनाकर छात्रों में जोश भर दिया. पीयूष मिश्रा ने आंदोलन को न सिर्फ अपना नैतिक समर्थन दिया, बल्कि तिरपाल, गद्दे, खाना और आर्थिक मदद की व्यवस्था भी कराई. आंदोलन कर रहे छात्रों को समर्थन देकर पीयूष मिश्रा को बना दिया है चर्चित चेहरा. आइए जानते है उनकी पूरी कहानी.
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प्रियकांत शर्मा से नाम बदलकर रखा 'पीयूष मिश्रा'!
पीयूष मिश्रा का जन्म 13 जनवरी 1963 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके बचपन का नाम प्रियकांत मिश्रा था. चपन घुटन और कठोर पारिवारिक बंधनों में बीता, जिसने उनके भीतर विद्रोही को जन्म दिया. जब 10वीं क्लास में थे, तो उन्होंने खुद कानूनी रास्ते से सरनेम 'शर्मा' से बदलकर 'मिश्रा' किया. नाम प्रियकांत से बदलकर 'पीयूष मिश्रा' रख लिया. महज 15 साल की उम्र में कानूनन अपना नाम खुद चुनना उनकी जिंदगी की पहली 'एंटी-एस्टेब्लिशमेंट' कहानी थी.
ग्वालियर से पढ़ाई के बाद दिल्ली आ गए. एक्टर बनने के लिए 1983 में उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लिया. यहां से पास आउट होने के बाद उन्होंने दिल्ली के थिएटर ग्रुप 'अस्मिता' के साथ मिलकर कई ऐतिहासिक नाटक किए. उनका नाटक 'गगन दमामा बाजयो' आज भी भगत सिंह के जीवन पर बना सबसे बेहतरीन नाटक माना जाता है.
'गुलाल' बना पीयूष मिश्रा के करियर का टर्निंग पॉइंट!
सिनेमा की चकाचौंध पीयूष मिश्रा को बहुत देर से मिली, क्योंकि वो लंबे समय तक खुद में खोए रहे और शराब की लत से भी जूझे. लेकिन जब उन्होंने बड़े पर्दे पर कदम रखा, तो किरदार बनते गए. सबसे बड़ा ब्रेक विशाल भारद्वाज की 2003 की फिल्म मकबूल से मिला. हालांकि, इससे पहले उन्होंने 1998 में मणि रत्नम की दिल से में इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर का रोल किया था.
अनुराग कश्यप की कल्ट फिल्म 'गुलाल' पीयूष मिश्रा के करियर का टर्निंग पॉइंट मानी जाती है. गुलाल में पीयूष मिश्रा ने एक्टिंग की, डायलॉग लिखे, म्यूजिक कंपोज किया, सारे गाने खुद लिखे और गाए भी. ऐसे 'ऑल-राउंडर' काम के लिए दोस्त से बस 2 लाख लिए. आगे अनुराग कश्यप ने गैंग्स ऑफ वासेपुर में बड़े-बड़े रोल दिए जिसने उन्हें मजबूत पहचान दिलाई. एक दिन ऐसा भी आया जब वो पिंक में महानायक अमिताभ बच्चन के सामने सरकारी वकील बनकर खड़े हो गए.
पीयूष मिश्रा एक्टिंग से ही बंधे नहीं रहे. क्रिएटिविटी के संपूर्ण पैकेज बने. आरंभ है प्रचंड, दुनिया, हुस्ना, इक बगल में चांद होगा जैसे गहरे और रोंगटे खड़े कर देने वाले गाने लिखे और गाए भी. उनका एक बैंड भी बल्लीमारन जिसमें वो अपने लिखे गीत गाते हैं गा-गाकर जिंदगी की कहानियां सुनाते हैं.
पीयूष मिश्रा और शराब की लत!
पीयूष मिश्रा की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा डिप्रेशन, भटकाव और शराब की भयानक लत से जूझते हुए बीता लेकिन पत्नी के अटूट विश्वास और परिवार के साथ ने दलदल से बाहर निकाला. पीयूष मिश्रा की जिंदगी का एक दौर ऐसा था जब सफलता की ओर बढ़ रहे थे लेकिन अंदर से एकदम बिखरे-बिखरे से थे. NSD से निकलने के बाद थियेटर करके हुए शराब की भयंकर लत की चपेट में आए. कई बड़े प्रोजेक्ट्स हाथ से निकलते गए. डिप्रेशन और अकेलेपन से वापसी मुमकिन नहीं लग रही थी और ये सिलसिला करीब 15-20 सालों तक चला.
कैसे हुई थी पीयूष की प्रिया से मुलाकात?
उसी दौर में उनकी जिंदगी में एंट्री हुई हुस्ना आर्किटेक्ट प्रिया की. मुलाकात दिल्ली के थिएटर सर्कल के दौरान हुई थी. पीयूष थोड़े अजीब से थे लेकिन प्रिया को भा गए. प्रिया के परिवार को पीयूष कतई पसंद नहीं थे. जब प्रिया के परिवार वाले नहीं माने तो उन्होंने अपनी प्रेमिका एक तरह से अगवा कर 1995 में कोर्ट मैरिज कर ली.
1995 में दोनों ने शादी कर ली, लेकिन चीजें बेतरतीब रहीं. घर तंगी, तनाव से चल रहा था. एक इंटरव्यू में पीयूष मिश्रा ने खुद स्वीकार किया कि शादी के शुरुआती 10-15 साल वो अच्छे पति नहीं रहे, उन्होंने पत्नी प्रिया को चीट किया और बाद में खुद ही उनके सामने रोते हुए सब कबूल किया था.
कैसे सुधरे थे पीयूष मिश्रा?
परिवार की जिम्मेदारी और बेटों के बड़े होने के अहसास ने पीयूष को बदलना शुरू किया. 2005 के आसपास जब पीयूष मुंबई शिफ्ट हुए, तो तब लगा कि अगर ऐसे ही पीते रहे तो पत्नी और बच्चों की जिंदगी पूरी तरह बर्बाद कर देंगे. उन्होंने 'विपश्यना' का सहारा लिया और एक दिन परिवार, पत्नी के सपोर्ट और इच्छाशक्ति से बुराइयों से पीछा छुड़ा लिया. प्रिया चटर्जी ने भी हिम्मत नहीं हारी और एक दिन सचमुच पीयूष और अपना परिवार सब संभाल लिया. पीयूष मिश्रा ने एक्टिव करियर के बीच ऑटोबायोग्राफी भी लिखी तुम्हारी औकात क्या है जिसमें उन्होंने अपनी बहुत सारी कहानियां लिखी हैं. ये टाइटल भी इसलिए रखा कि ताकि अपनी भगवान जैसी छवि को ध्वस्त कर सके.
अचानक क्यों शुरू हो गई पीयूष मिश्रा की चर्चा?
ऐसे पीयूष मिश्रा छात्रों के आंदोलन में शामिल हो गए तो किसी राजनीतिक विचारधारा के सांचे में फिट नहीं होते. राहुल गांधी, कांग्रेस, बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर उनके विचार इंटरव्यू, बयानों से सामने आते रहे जिससे निचोड़ निकलता है कि वो तटस्थ भी हैं और अपनी मर्जी से अपनी राजनीतिक पसंद-नापसंद को नापते-तौलते हैं. हालांकि स्वभाव एंटी-एस्टेब्लिशमेंट या लीक से हटकर रहा है. वह किसी एक राजनीतिक दल के पाले में खड़े नहीं होते, बल्कि अपनी अंतरात्मा की सुनते हैं.
नसीरुद्दीन शाह और पीयूष मिश्रा की कोई प्रोफेशनल या राइवलरी नहीं रही है लेकिन न जाने क्यों जब पीयूष मिश्रा रांची गए तो उन्होंने नसीरुद्दीन शाह को रगड़ दिया. नासिर ने जंतर मंतर प्रोटेस्ट के समय तो बोले लेकिन रांची प्रोटेस्ट पर चुप्पी साधे हुए हैं. जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट हुआ तब नसीरुद्दीन शाह का बयान बड़ा वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने पीएम मोदी पर निशाना साधा था. उससे पहले सीएए-एनआरसी प्रोटेस्ट के समय नसीरुद्दीन शाह ने फिल्म इंडस्ट्री के शांत रहने पर कहा था कि जिनके मुंह में हड्डी होती है, वे बोल नहीं सकते.
पीयूष ने नसीरुद्दीन शाह को क्या कहा?
पीयूष मिश्रा रांची में दाल-भात खाकर जमीन पर बैठे छात्रों का दर्द देखा, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा. इस बात पर कि दिल्ली-मुंबई के जिन आंदोलनों में पिज्जा-बर्गर बट रहे थे, वहां तो पूरा बॉलीवुड और बुद्धिजीवी वर्ग खड़ा था, लेकिन रांची के इस वास्तविक छात्र आंदोलन पर सबने आंखें मूंद ली हैं. नसीरुद्दीन शाह को सुनाते हुए कहा-मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं, लेकिन अब मुझे आपसे डर नहीं लगता. मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आज जब देश का यह गरीब और ईमानदार युवा अपनी नौकरी और भविष्य के लिए रो रहा है, तो वो कौन से 'कुत्ते' हैं जिनके मुंह में हड्डियां हैं और वे चुप बैठे हैं?
करियर के शुरुआती दिनों में पीयूष मिश्रा लेफ्ट और थियेटर ग्रुप्स से गहरे जुड़े थे. लेकिन बाद में उन्होंने लेफ्ट की आइडियोलॉजी में खोखलापन महसूस करना शुरू किया और पूरी तरह अलग होते गए. जिम्मेदार मानते हैं कि लेफ्ट ने जीवन के 20 साल बर्बाद किए. लगातार मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के सिलेक्टिव स्टैंड यानी चुनिंदा मुद्दों पर बोलने पर सवाल उठाते आए हैं. रांची में भी उन्होंने कहा कि मुझे बॉम्बे से बोलते हुए शर्म आ रही थी क्योंकि वहां से कोई युवाओं के वास्तविक दर्द पर नहीं बोल रहा है.
किस पार्टी के समर्थक है पीयूष?
पीयूष मिश्रा कितने राजनीतिक हैं, कितने अराजनीतिक, इसे समझने के लिए समझना होगा कि वो बोलते क्या हैं. राहुल गांधी की नीयत या चरित्र पर कोई कीचड़ नहीं उछालते, बल्कि अलग तरह की सहानुभूति रखते हैं. कई इंटरव्यूज में कहा कि राहुल गांधी सच्चे, ईमानदार और साफ दिल के इंसान हैं. उन्हें राहुल गांधी बेहद 'भोले' और अच्छे संस्कारों वाले नेता लगते हैं. ये भी जोड़ते हैं कि शायद राजनीति जैसा क्रूर और चालाक क्षेत्र उनके जैसे सीधे और भोले इंसान के लिए बना ही नहीं है. हालांकि उनकी सोच है कि जब कांग्रेस सत्ता में थी या जब वह आज विपक्ष में है, तब भी उसने देश के असली और जमीनी युवाओं के दर्द को उस गंभीरता से नहीं उठाया, जैसा कि उठाया जाना चाहिए था.
पीयूष मिश्रा की वैचारिकी उन्हें बीजेपी समर्थित बनाती है. वो खुद कह चुके हैं कि मोदी के काम, नीयत पर भरोसा है इसलिए बीजेपी को वोट देते हैं. लेकिन पीयूष मिश्रा कहते हैं कि जो लोग उन्हें बीजेपी का अंधभक्त या पारंपरिक समर्थक मान लेते हैं, वे मूर्ख हैं. वो किसी भी पार्टी के कैडर नहीं हैं, न ही किसी खेमे में बंधना पसंद है.
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"मैं गुस्से से खौल रहा हूं..." छात्रों के समर्थन में उतरे नसीरुद्दीन शाह, सरकार पर साधा तीखा निशाना
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