देश में हर रोज दर्जनों आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले होते हैं. सरकारी फाइलों पर दस्तखत होते हैं और अधिकारी अपना नया दफ्तर संभाल लेते हैं. एक आम आईएएस या आईपीएस अधिकारी अपने पूरे 30 से 35 साल के करियर में लगभग 15 से 25 अलग-अलग पोस्टिंग देखता है. कभी वो किसी जिले का कलेक्टर या एसपी बनता है, कभी किसी विभाग का डायरेक्टर, तो कभी सचिवालय की एसी कुर्सियों पर बैठकर फाइलें आगे बढ़ाता है. ट्रांसफर और पोस्टिंग सिविल सर्विसेज के रूटीन करियर का एक बेहद सामान्य हिस्सा है. लेकिन जब हर रोज होने वाले इन दर्जनों रूटीन तबादलों के बीच अचानक एक ऐसा नाम सामने आता है, जिसकी चर्चा देश के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंजने लगती है, तो समझ जाइए कि वह सिर्फ एक सामान्य ट्रांसफर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सरकार कुछ बड़ा प्लान कर रही है. नई पोस्टिंग उसी का बड़ा टर्निंग पॉइंट हो सकती है.
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टर्निंग पॉइंट डॉ. संजुक्ता पराशर के करियर में भी आया है. पिछले 20 साल की सर्विस में उन्होंने कई सारी पोस्टिंग संभाली लेकिन कभी इतनी चर्चा नहीं हुई. चर्चा इसलिए हो रही है कि उनकी पोस्टिंग केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स यानी CRPF में हुई है और उसमें भी सबसे खतरनाक गुरिल्ला कमांडो यूनिट कोबरा का नया आईजी नियुक्त किया गया है. इस एक पोस्टिंग से डॉ. संजुक्ता पराशर इतनी वायरल हुई हैं कि सोशल मीडिया से लेकर स्मृति ईरानी जैसे टॉप लीडर्स भी डॉ. संजुक्ता पराशर के लिए प्राउड फील कर रहे हैं और भर-भर कर शुभकामनाएं दे रहे हैं. नियुक्ति इसलिए बड़ी है कि इतिहास में पहली बार कोबरा की 10 बटालियनों की कमान किसी महिला अधिकारी के हाथों में गई है. सरकार ने हाथ में AK-47 थमाकर शांति के दुश्मनों का काल बनाकर संजुक्ता पराशर को चर्चित चेहरा बना दिया है. हर लड़की, हर महिला के लिए इन्स्पायरिंग स्टोरी बन गई हैं संजुक्ता. आइए विस्तार से जानते हैं उनकी पूरी कहानी.
स्मृति ईरानी ने की जमकर तारीफ
स्मृति ईरानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संजुक्ता पराशर की तारीफ करते हुए लिखा कि, "उनका असम में विद्रोहियों के खिलाफ ऑपरेशन्स का अनुभव और एनआईए (NIA) में जटिल जांचों को संभालने का जज्बा उनके नेतृत्व को दर्शाता है. यह भारत के सुरक्षा बलों के लिए एक गौरवशाली क्षण है.' संजुक्ता पराशर के लिए आज ये कहा या लिखा जा रहा है तो उसकी कहानी एक दिन में या रातोंरात लिखी नहीं गई. सरकार ने 'कोबरा' जैसी प्रीमियम फाइटर विंग की कमान किसी कागजी अफसर को नहीं, बल्कि प्रूवन वारियर'(Proven Warrior) को सौंपी है. उन्होंने 1996 बैच के आईपीएस अधिकारी दानेश राणा की जगह ली है.
कौन हैं संजुक्ता पराशर?
अक्टूबर 1979 में असम में जन्मी संजुक्ता बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में आगे थीं. असम से स्कूलिंग करने के बाद दिल्ली आ गईं, जहां उन्होंने इंद्रप्रस्थ कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया और फिर JNU से इंटरनेशनल रिलेशंस में पोस्ट-ग्रेजुएशन किया. पीएचडी की डिग्री हासिल करके नाम के आगे डॉक्टोरेट की उपाधि लगी. 2006 में उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में ऑल इंडिया 85वीं रैंक हासिल की. रैंक इतनी शानदार थी कि आसानी से आईएएस बन सकती थीं, लेकिन उन्होंने देश की सुरक्षा को चुना आईपीएस बनने का फैसला किया. एक महिला अधिकारी होने के बावजूद उन्होंने एयरकंडीशंड दफ्तरों के बजाय हमेशा 'ऑन-फील्ड' रहकर जानलेवा मोर्चों को चुना.
संजुक्ता और पुरु की मुलाकात और शादी!
संजुक्ता पराशर और उनके पति पुरु गुप्ता की मुलाकात मसूरी के LBSNAA में हुई थी, जहां UPSC पास करने के बाद देश के सभी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की ट्रेनिंग होती है. दोनों ही 2006 बैच के अधिकारी हैं. जब साल 2006 में संजुक्ता का सिलेक्शन आईपीएस(IPS) के लिए और दिल्ली के रहने वाले पुरु गुप्ता का चयन आईएएस(IAS) के लिए हुआ, तो वे ट्रेनिंग के दौरान लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (LBSNAA) में मिले. यहीं पर दोनों के बीच जान-पहचान हुई, जो जल्द ही गहरी दोस्ती और फिर प्यार में बदल गई. इसके बाद साल 2008 में दोनों ने शादी करने का फैसला किया.
मसूरी की खूबसूरत वादियों में शुरू हुई यह प्रेम कहानी सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक सेवा के दो दिग्गजों का एक बड़ा फैसला थी। पुरु गुप्ता मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले थे, जबकि संजुक्ता पराशर असम की थीं. नियमों के मुताबिक, जब दो अलग-अलग राज्यों के सिविल सर्वेंट्स आपस में शादी करते हैं, तो सरकार उन्हें किसी एक राज्य में 'मैरिज ग्राउंड' पर एक ही कैडर (राज्य) अलॉट कर देती है.
पुरु ने भी लिया असम में ट्रांसफर, लेकिन दो महीने में होती है मुलाकात!
संजुक्ता पराशर को पहले ही उनकी शानदार रैंक की वजह से उनका गृह राज्य असम-मेघालय कैडर मिल चुका था. पुरु गुप्ता ने संजुक्ता से शादी के बाद अपनी पत्नी के काम और उनके राज्य के प्रति लगाव का सम्मान किया और वे खुद भी दिल्ली से ट्रांसफर लेकर असम आ गए. तब से यह पावर कपल असम में ही तैनात है. हालांकि, अलग-अलग जिलों में पोस्टिंग के कारण दोनों को केवल दो महीने में एक बार ही मिलने का मौका मिलता है, लेकिन मसूरी की ट्रेनिंग से शुरू हुआ यह मजबूत सफर आज भी राष्ट्रीय सेवा की राह पर उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ रहा है.
सिविल सर्विसेज में कोई भी अधिकारी अपनी मर्जी से कोई राज्य चुनकर पोस्टिंग नहीं ले सकता. उम्मीदवार सिर्फ अपनी प्रेफेरेंस फॉर्म में भर सकते हैं. कैडर अलॉटमेंट केंद्र सरकार का DoPT (Department of Personnel and Training) करता है. कैडर का मिलना पूरी तरह से अधिकारी की रैंक, उनकी कास्ट कैटेगरी स्टेट कोटे की वैकेंसी पर निर्भर करता है. चूंकि संजुक्ता पराशर की रैंक 85वीं बेहद शानदार थी और उस साल असम-मेघालय कैडर में उनके कोटे की सीट खाली थी, इसलिए सरकारी नियमों और मेरिट के आधार पर उन्हें अपना गृह राज्य यानी असम-मेघालय का संयुक्त कैडर अलॉट कर दिया गया. वही उस संजुक्ता की नई कहानी लिखनी शुरू हुई जिसकी आज चर्चा हो रही है.
संजुक्ता की सर्विस जर्नी
असम-मेघालय कैडर मिलते ही उनका एनकाउंटर बोडो उग्रवादियों से पक्का हो गया. जब साल 2008 में उनकी पहली पोस्टिंग हुई, तब वे असम के माकुम में असिस्टेंट के पद पर तैनात हुई थीं. उन्होंने अपने करियर के शुरुआती 10 से 12 साल असम के अलग-अलग जिलों, जैसे उडलगिरी, जोरहाट और सोनितपुर में बतौर एसपी (SP) ग्राउंड पुलिसिंग और असम पुलिस के जवानों को लीड करते हुए बिताए. तो फिर सीआरपीएफ में कैसे आईं?
आईपीएस अधिकारियों के करियर में एक सिस्टम होता है जिसे सेंट्रल डेपुटेशन यानी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति कहा जाता है. स्टेट कैडर के IPS अफसरों को कुछ सालों के लिए केंद्र सरकार की एजेंसियों जैसे NIA, IB, CBI या पैरामिलिट्री फोर्सेज जैसे CRPF, BSF में पोस्टिंग दी जाती है. संजुक्ता पराशर भी इसी नियम के तहत पहले आतंक विरोधी एजेंसी NIA में सेंट्रल डेपुटेशन पर गईं, जहां डीआईजी बनीं. आतंकवाद और कश्मीर टेरर फंडिंग से जुड़े कई हाई-प्रोफाइल मामलों की जांच की.
कैसे बनी CRPF की कोबरा विंग की आईजी?
स्टेट कैडर में लौटीं तो असम सीआईडी विंग की चीफ बनीं. अब वापस केंद्र सरकार ने उनकी वीरता और जंगल वॉरफेयर के अनुभव को देखते हुए उन्हें एक बार फिर सेंट्रल डेपुटेशन पर बुलाकर सीआरपीएफ की 'कोबरा विंग' का नेशनल हेड यानी आईजी नियुक्त किया है.
देश में नक्सलियों के लगभग खात्मे के बाद, हाल ही में कोबरा की दो अहम यूनिट्स को मणिपुर के अशांत इलाकों में तैनात किया गया है. मणिपुर और पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति और वहां के उग्रवाद को संजुक्ता पराशर से बेहतर कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत ही इन्हीं जंगलों से की थी. उनकी यह नियुक्ति उग्रवादियों के हौसले पस्त करने और आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने में एक गेम-चेंजर साबित होने वाली है.
संजुक्ता को क्यों कहा जाता है असम की आयरन लेडी?
संजुक्ता पराशर को असम की आयरन लेडी भी कहा जाता है और ये हुआ असम में सोनितपुर की एसपी वाली पोस्टिंग के दौरान. 2013-15 के बीच उनके करियर की सबसे बड़ी टर्निंग पॉइंट पोस्टिंग थी. उनका सबसे बड़ा इम्तिहान सोनितपुर जिले में बतौर एसपी हुआ. साल 2013 से 2015 के बीच जब असम में NDFB नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के उग्रवादियों का आतंक चरम पर था, तब संजुक्ता सोनितपुर की एसपी थीं. संजुक्ता पराशर ने खुद हाथ में लोडेड AK-47 थामी और अपनी टीम के साथ घने जंगलों में उतर गईं.
16 से ज्यादा बड़े और सफल एनकाउंटर ऑपरेशन्स को अंजाम दिया. महज 15 महीनों के भीतर 16 खूंखार उग्रवादी मारे गए, 64 से ज्यादा गिरफ्तार हुए और भारी मात्रा में आधुनिक हथियार और गोला-बारूद जब्त किया गया. इसके अलावा उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में करीब 350 से अधिक आतंकियों/उग्रवादियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा. घने और जानलेवा जंगलों में उनके डेयरिंग ऑपरेशंस को देखकर ही उन्हें जंगलों की आयरन लेडी पुकारा जाने लगा.
कोबरा विंग के हेड बनने पर संजुक्ता की इतनी चर्चा क्यों?
अब सवाल उठता है कि आखिर सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट में संजुक्ता की नियुक्ति इतनी महत्वपूर्ण क्यों बनी है? कोबरा का फुल फॉर्म है Commando Battalion for Resolute Action. जिसका गठन 2008-09 में देश के सबसे दुर्गम जंगलों में नक्सलियों और उग्रवादियों से लोहा लेने के लिए किया गया था. कोबरा कमांडोज को जंगल वॉरफेयर और गुरिल्ला युद्ध में महारत हासिल होती है. जहां आम फोर्स जाने से कतराती है, वहां कोबरा के जवान सीना ताने खड़े रहते हैं. कोबरा कमांडो देश के सबसे घने जंगलों में नक्सलियों और उग्रवादियों से छिपकर लड़ने गुरिल्ला युद्ध के लिए जाने जाते हैं.
कोबरा कमांडोज ने देश के 'रेड कॉरिडोर' यानी नक्सल प्रभावित इलाकों में 40 हजार से अधिक सफल ऑपरेशन्स को अंजाम दिया है. इस दौरान इन जांबाज कमांडोज ने 640 से ज्यादा दुर्दांत नक्सलियों को ढेर किया, 4000 से अधिक को गिरफ्तार किया और करीब 3400 से ज्यादा नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया. जंगलों को अपना घर बनाने वाले इन लड़ाकों ने नक्सलियों की कमर तोड़ देश को सैकड़ों हमलों से बचाया वो भी बिना वायरल और हेडलाइन मेटेरियल बने बिना.
कोबरा विंग में करीब हजार कमांडोज होते हैं जो 10 बटालियंस में बंटे होते हैं. हर एक बटालियन में करीब 1000 कमांडोज की स्ट्रेंथ होती है. ये सारे कोबरा अब संजुक्ता पराशर की सुनेंगे क्योंकि आईजी ही कोबरा विंग का हेड होता है. जंगलों में जब कोबरा ऑपरेशन के लिए उतरती है, तो 1000 जवान एक साथ नहीं जाते. इनका फील्ड स्ट्रक्चर बहुत छोटा और घातक होता है. किसी भी खुफिया इनपुट पर कोबरा की 15 से 30 कमांडोज की छोटी टीमें जंगल में भेजी जाती हैं.
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