आमतौर पर जेल के भीतर किसी भी पत्रकार को कैमरा, रिकॉर्डर ले जाने या सीधे आमने-सामने बैठकर लाइव इंटरव्यू करने की अनुमति कानूनन नहीं होती है. शरजील इमाम जैसे आरोपी के मामले में तो ये बहुत रेयर था. फिर भी द क्विंट ने शरजील इमाम का इंटरव्यू किया लेकिन बिना किसी कैमरे, माइक या रिकॉर्डर के. द क्विंट ने दावा किया है कि शरजील इमाम का इंटरव्यू पूरी तरह लिखित यानी प्रिसन राइटिंग्स(Prison Writings) से हुआ. जेल प्रशासन और कानूनी नियमों के दायरे में हुआ. द क्विंट के रिपोर्टर के लिखित सवाल शरजील इमाम तक पहुंचाए गए. शरजील ने तिहाड़ जेल के अंदर से कागज पर लिखकर जवाब भेजे. उन्हीं जवाबों में एक्सप्लेन कर दिया जिसे कहा जा रहा Islamist manifesto?
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2020 में गिरफ्तारी के बाद शरजील इमाम को कभी बोलते नहीं सुना गया. देखा तब गया जब मानवीय आधार पर पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए कुछ दिनों के लिए रिहाई मिली. पहली बार शरजील इमाम ने अपने विचार और आइडियोलॉजी सामने रखी. सवालों के जवाब में तीखापन है. जैसे सेक्युलर कन्सेंसस भारतीय मुसलमानों के लिए एक जाल और झूठ है जो केवल अल्पसंख्यकों के हाशिए पर जाने की प्रक्रिया को मजबूत करता है.
धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संविधान पर शरजील ने जो कहा वो हैरान करने वाला है. 2020 से जेल में जमानत के बिना दिन रात काट रहे शरजील इमाम जरा भी नहीं बदले, जरा भी नहीं झुके. पूरी अकड़ के साथ शरजील ने संविधान को फासीवादी कहा, धर्मनिरपेक्षता को जाल बताया और लोकतंत्र को मुसलमानों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने का तरीका बताया. सभी हिंदुओं को एक समान मानते हैं, जो मुसलमानों को उस राजनीतिक सत्ता से वंचित करने के लिए एकमत हैं. अनजाने में ही सही, शरजील कह गए कि मुसलमान बाकी सब चीजों से बढ़कर सबसे पहले भारतीय हैं. इंटरव्यू से अचानक चर्चा में आए शरजील इमाम बने हैं चर्चित चेहरा जो सरकार, बीजेपी की नजरों में देशद्रोही हैं. जो सरकार, बीजेपी से नाराज या खिलाफ हैं उनमें से बहुतों के लिए हीरो हैं.
शरजील ने जेल से क्या-कुछ बताया?
शरजील ने बहुत सारे राजनीतिक, वैचारिक जवाबों के साथ ये भी बताया कि जेल में दो बिल्लियों, अपनी किताबों और अधूरे पीएचडी शोध के साथ वक्त गुजार रहे हैं. तिहाड़ में बेहद अकेलेपन के बीच शरजील के सबसे करीबी साथी कोई इंसान नहीं, बल्कि 'चू' (Chu) और 'लीसा' (Lisa)' नाम की दो बिल्लियां हैं, जिन्हें वे रिहाई के बाद अपने साथ घर ले जाना चाहते हैं. जेल में बंद सैकड़ों कैदी जिन्हें कानून की समझ नहीं है, वे अपनी चार्जशीट और अदालती फैसले लेकर शरजील के पास आते हैं. आईआईटी बॉम्बे का यह पूर्व छात्र जेल में उन अनपढ़ या गरीब कैदियों की चार्जशीट पढ़ता है, उन्हें केस समझाता है और कानूनी मदद की सलाह देता है.
क्यों जेल में बंद है शरजील इमाम?
शरजील इमाम और उमर खालिद ये वो दो लड़के हैं जो सीएए विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों से संबंधित केस में जनवरी 2020 से जेल में हैं. हीरो या विलेन-इसे साबित करने के लिए लीगल फाइल पिछले 6 सालों से यानी 2200 से ज्यादा दिनों से बिना ट्रायल यानी विचाराधीन कैदी के रूप में जारी है. शरजील इमाम को 28 जनवरी 2020 को गिरफ्तार किया गया था और उमर खालिद की गिरफ्तारी 13 सितंबर 2020 को हुई थी. आरोपों में सीएए विरोधी प्रदर्शनों और दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मास्टरमाइंड और मुख्य सूत्रधार हैं.
FIR 59 के तहत दर्ज सख्त यूएपीए कानून के मामले में दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कई बार खारिज हो चुकी हैं. हालांकि लंबे संघर्ष के बाद 5 सह आरोपी जमानत पर रिहा हो चुके हैं. जमानत नहीं मिलने का विवाद इतना बड़ा बन चुका है कि कई सारे पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज भी सवाल उठाते रहे हैं. पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को सफाई देनी पड़ी. कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धुलिया ने कहा कि उमर और शरजील को बहुत पहले ही जमानत मिल जानी चाहिए थी, क्योंकि किसी को बिना दोष साबित किए इतने लंबे समय तक अंडरट्रायल कैदी बनाकर रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.
कौन हैं शरजील इमाम?
तिहाड़ में फंसे शरजील इमाम की कहानी किसी को भी हैरान करने वाली है. बिहार के जहानाबाद जिले के काको गांव में 1988 में जन्मे शरजील इमाम के पिता अकबर इमाम नेता थे. 2005 में जेडीयू के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़े. 2014 में कैंसर से निधन हो गया. शरजील का बचपन आराम से बीता. पटना के बड़े स्कूल सेंट जेवियर हाई स्कूल से स्कूलिंग करने के बाद दिल्ली के डीपीएस वसंत कुंज में पढ़ने गए.
मेरिट था तो आईआईटी बॉम्बे में सिलेक्शन हुआ जहां से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री ली. ग्रेजुएशन के बाद शरजील ने बेंगलुरु की सॉफ्टवेयर कंपनी ज्वाइन की. डेनमार्क के कोपेनहेगन जाकर आईटी यूनिवर्सिटी में प्रोग्रामर की भी जॉब की. यानी वो सब कुछ मिला जो किसी का भी चाहिए होता है लेकिन जिंदगी में हमेशा सब कुछ वो नहीं होता जिसके लिए मेहनत की जाती है. कुछ तो डेस्टनी भी करती-कराती है.
IIT के बाद पहुंचे थे JNU
आईआईटी से टेकी बन चुके शरजील इमाम को न जाने क्यों और कैसे हिस्ट्री और पॉलिटिकल साइंस की ओर मुड़े. नौकरी-वौकरी छोड़कर 2013 में JNU में मॉडर्न हिस्ट्री में मास्टर्स करने के लिए एडमिशन लिया. 2015 से विभाजन और मुस्लिम राजनीति पर पीएचडी रिसर्च कर रहे थे. तब तक शरजील इमाम साधारण नौजवान था जो कुछ बनने के लिए पढ़ने, सीखने, जानने के लिए जी जान लगाए हुए था लेकिन आगे पुलिस ने थ्योरी दी कि शरजील इमाम पीएचडी रिसर्च और किताबों से ही रेडिकलाइज हुए. विभाजन और 1946 के सांप्रदायिक दंगों पर किताबें पढ़ते-पढ़ते व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा पनपा.
कैसे शुरू हुई शरजील की चर्चा?
शरजील इमाम की चर्चा शुरू हुई 2020 में जब सोशल मीडिया में भाषण वायरल हुआ जो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दिया था. उस दौर में CAA और NRC कानून को लेकर देश में बड़ा विरोध चल रहा था. कथित भाषण में शरजील इमाम को कहते हुए सुना गया था कि, 'अगर हम 5 लाख लोग संगठित हो जाएं, तो हम हिंदुस्तान और असम को हमेशा के लिए अलग कर सकते हैं... असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है.'
वायरल भाषण दिल्ली पुलिस, सरकार तक भी पहुंची. सबने शरजील इमाम के भाषण और सोच को देश की संप्रभुता और अखंडता पर सीधा हमला माना और देश को बांटने की साजिश करार दिया. ताबड़तोड़ एक्शन शुरू हो गया शरजील इमाम को दबोचने के लिए. दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में उनके खिलाफ देशद्रोह और यूएपीए (UAPA) के तहत मामले दर्ज हुए. चौतरफा दबाव के बीच, 28 जनवरी 2020 को शरजील इमाम ने अपने पैतृक गांव काको में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया और पुलिस ने गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल में डाल दिया.
शरजील की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने बनाया था चक्रव्यूह!
शरजील इमाम की गिरफ्तारी की अलग कहानी है. 2020 की जनवरी में जब शरजील पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ और वे कानून की नजरों से छुपकर अंडरग्राउंड हो गए, तब पुलिस की दर्जनों टीमें उनका सुराग ढूंढने में नाकाम साबित हो रही थीं।. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की थ्योरी के मुताबिक, पुलिस ने जब उनके दोस्तों और भाई को हिरासत में लेकर पूछताछ की, तो पता चला कि फरार चल रहे शरजील सिर्फ एक ही शख्स के लगातार संपर्क में थे और वो थीं उनकी प्रेमिका.
जांच एजेंसियों ने एक चक्रव्यूह रचा. पुलिस ने उनकी कथित प्रेमिका पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया और उनसे शरजील को फोन करवाया. प्यार के इसी बुलावे पर, कानून के शिकंजे से बेखबर शरजील 28 जनवरी 2020 को बिहार के जहानाबाद जिले के मलिक टोला के इमामबाड़े में अपनी उसी प्रेमिका से मिलने पहुंचे. लेकिन वहां पहले से सादे कपड़ों में मुस्तैद पुलिस ने घेराबंदी कर रखी थी, और इस तरह मोहब्बत का वो बुलावा उन्हें सीधे तिहाड़ जेल ले गया.
पुलिस ने जांच की गोपनीयता और सुरक्षा कारणों के चलते लड़की की पहचान कभी सार्वजनिक नहीं की. कभी पता नहीं चला कि शरजील की जिंदगी में कौन थी वो लड़की. चार्जशीट में उसका नाम गोपनीय प्रोटेक्टेड विटनेस के तौर पर रखा गया. कभी ओपन कोर्ट रूम में पेशी नहीं हुई, न कभी बयान सामने आए. पुलिस ने कथित प्रेमिका के कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) और लोकेशन का इस्तेमाल केवल शरजील इमाम को इमामबाड़े तक खींचने और गिरफ्तार करने के एक 'ऑपरेशनल टूल' के रूप में किया.
शरजील और उमर खालिद का है कोई कनेक्शन?
शरजील इमाम की और मुसीबतें आगे शुरू हुईं. फरवरी में दिल्ली में दंगे हुए. देशविरोधी साजिश के विवाद में एक और पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद को भी पुलिस ने दबोचा. कहानी बनी कि शरजील इमाम और उमर खालिद मिलकर देश के खिलाफ साजिश रच रहे थे. आगे चलकर दोनों लड़कों में सबसे ज्यादा चर्चा उमर खालिद की होने लगी.
शरजील के वकील कोर्ट में कहते-कहते थक गए कि उमर खालिद कभी शरजील के मेंटर या गुरु नहीं थे. दोनों के बीच न तो किसी तरह की फोन कॉल या चैट का रिकॉर्ड है और न ही दोनों की विचारधाराएं पूरी तरह मेल खाती थीं. शरजील खुद को उमर खालिद की तथाकथित सेक्युलर राजनीति से अलग एक स्वतंत्र एक्टिविस्ट बताते रहे. शरजील के वकील ये भी साबित नहीं कर पाए कि उनके भाषण का मतलब देश को तोड़न नहीं बल्कि पूर्वोत्तर को जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकन नेक पर चक्का जाम कर सरकार पर दबाव बनाना था.
उमर और शरजील के केस में सबसे बड़ा विवाद ये है कि ट्रायल यानी 6 साल में मुकदमा भी शुरू हुआ तो दोनों को जेल में क्यों रखा गया है. बरसों की कोर्ट कचहरी के बाद अभी तक यही हुआ कि इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने शरजील इमाम और उमर खालिद की नियमित जमानत याचिकाएं ये कहते हुए खारिज कर दी कि दंगों की साजिश में इनकी भूमिका अन्य सह-आरोपियों से अलग और सेंटर में थी. पिछले साल दोनों को जमानत तो नहीं मिली लेकिन मानवीय आधार पर पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए कुछ दिनों की छुट्टी मिलती रही लेकिन मीडिया या सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने जैसी कड़ी शर्तों के साथ.
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