देश में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसी समस्याओं से जब नौजवानों की जिंदगी प्रभावित हो रही थी, उसी दौरान चीफ जस्टिस द्वारा नौकरी और पढ़ाई का हक मांगने वालों को कथित तौर पर 'कॉकरोच' कहे जाने के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया. इस ताने के खिलाफ जहां विपक्ष को सड़क पर होना चाहिए था, वहीं अमेरिका में बैठे भारतीय नौजवान अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से देश का सबसे बड़ा डिजिटल आंदोलन खड़ा कर दिया. सरकार और पुलिस प्रशासन की मंजूरी के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक के जिम्मेदार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर धरना शुरू हुआ.
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इस आंदोलन को तब एक बड़ा मोड़ मिला जब लद्दाख के मशहूर क्लाइमेट एक्टिविस्ट और इनोवेटर सोनम वांगचुक बिना किसी जान-पहचान के अपना झोला उठाकर जंतर-मंतर पहुंच गए. सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर अनशन करते हुए 12 दिन हो चुके हैं. वहां लोग लगातार उनसे मिलने आ रहे हैं और विपक्ष के मिडिल ऑर्डर के नेता भी उनका हौसला बढ़ाने पहुंच रहे हैं, लेकिन सरकार की तरफ से अभी तक कोई भी उनसे मिलने नहीं पहुंचा है.
बचपन में कमजोर समझे जाने वाले सोनम कैसे बने लद्दाख के नायक
सोनम वांगचुक का जन्म 1966 में लद्दाख के एक छोटे से गांव अलछी में हुआ था. शुरुआती 9 वर्षों तक वे स्कूल नहीं गए और घर पर ही अपनी मां से पढ़ाई की. जब पहली बार स्कूल गए तो स्थानीय भाषा न समझने के कारण उन्हें कमजोर छात्र मान लिया गया था, लेकिन उनके भीतर छिपे जीनियस को कोई भांप नहीं सका. बाद में उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की.
वांगचुक के आंदोलनकारी बनने की शुरुआत लद्दाख के लचर एजुकेशन सिस्टम के खिलाफ लड़ाई से हुई. साल 1988 से 1990 के दौर में लद्दाख के करीब 95% छात्र बोर्ड परीक्षाओं में फेल हो जाते थे, क्योंकि उन्हें उनकी मातृभाषा के बजाय ऐसी भाषा में पढ़ाया जाता था जिसे वे समझ नहीं पाते थे. सोनम ने इसे छात्रों की नहीं बल्कि सिस्टम की नाकामी माना और 'सेकमोल' (SECMOL) नाम का स्कूल बनाकर लद्दाख की टेक्स्ट बुक और एजुकेशन पॉलिसी को बदलवा दिया.
उनके इन प्रयासों की बदौलत कुछ ही सालों में छात्रों का पासिंग परसेंटेज 5% से बढ़कर 75% तक पहुंच गया. इसी सफलता ने उन्हें सोशल रिफॉर्म की राह पर आगे बढ़ाया और उनकी इसी 'सक्सेस फिलॉसफी' (कामयाबी के पीछे मत भागो, काबिल बनो...) पर आमिर खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'थ्री इडियट्स' बनी, जिसका मुख्य किरदार 'फुनसुक वांगडू' सोनम वांगचुक से ही प्रेरित था.
अनोखी है प्रेम कहानी, पत्नी गीतांजलि बनीं सबसे बड़ी ताकत
सोनम वांगचुक की निजी जिंदगी और उनकी प्रेम कहानी भी उनके आविष्कारों की तरह ही लीक से हटकर है. सोनम वांगचुक और गीतांजलि जे आगमो की पहली मुलाकात साल 2004 में हुई थी. गीतांजलि एक पंजाबी जैन परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिन्होंने फिजिक्स से ग्रेजुएशन और एमबीए करने के बाद एक शानदार कॉर्पोरेट लाइफ जी थी. वे ऑक्सफोर्ड की फेलो और कराटे में ब्लैक बेल्ट भी हैं.
गीतांजलि लद्दाख के बच्चों की शिक्षा में मदद करने के लिए सोनम के सेकमोल स्कूल में एक वॉलंटियर बनकर आई थीं. मुलाकात के बाद दोनों के विचार इस कदर मिले कि गीतांजलि ने अपना हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट करियर छोड़ दिया और लद्दाख के पारंपरिक बौद्ध रीति-रिवाजों से बेहद सादगी के साथ दोनों ने शादी कर ली. शादी के शुरुआती सालों में उन्होंने अपने पहले बच्चे को खो दिया, जिसने दोनों को एक-दूसरे के और करीब ला दिया. आज गीतांजलि सोनम के हर आंदोलन, भूख हड़ताल और हर नए आविष्कार में कंधे से कंधा मिलाकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़ी रहती हैं.
मशीन नहीं दिमाग का चमत्कार, दुनिया को चौंकाने वाले आविष्कार
सोनम वांगचुक को उनके अनोखे आविष्कारों ने एक ग्लोबल फेस बना दिया है. लद्दाख के पहाड़ों में पानी की किल्लत दूर करने के लिए उन्होंने 'आइस स्तूप' (Ice Stupa) का निर्माण किया. सर्दियों में बेकार बहने वाले पानी को पाइप के जरिए हवा में फुहारे की तरह छोड़कर उन्होंने माइनस डिग्री तापमान में बर्फ के विशाल पहाड़ खड़े कर दिए, जो गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलकर किसानों को खेती के लिए पानी देते हैं.
इसके अलावा उन्होंने भारतीय सेना के जवानों के लिए 'सोलर हीटेड टेंट' बनाया, जो बाहर -40 डिग्री की जानलेवा ठंड होने पर भी बिना किसी ईंधन या कोयले के सिर्फ धूप की ऊर्जा से टेंट के भीतर का तापमान प्लस 15 डिग्री बनाए रखता है. उन्होंने मिट्टी और भूसे से ऐसी इको-फ्रेंडली इमारतें भी बनाईं जो सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडी रहती हैं. साल 2013 में उन्होंने 'न्यू लद्दाख मूवमेंट' की शुरुआत की, जिसका मुख्य मकसद लद्दाख के पर्यावरण, नदियों, ग्लेशियरों और वहां की संस्कृति की रक्षा करना था.
जब सरकार के चहेते से अचानक 'सुरक्षा के लिए खतरा' बन गए सोनम
सोनम वांगचुक का सफर दिखाता है कि कैसे जनहित में सरकार को वादे याद दिलाने पर सिस्टम उन्हें अलग नजर से देखने लगता है. साल 2019 में जब केंद्र सरकार ने लद्दाख से धारा 370 हटाई, तो सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुलकर समर्थन किया था. सरकार भी उनकी देशभक्ति, सोलर टेंट और पर्यावरण मॉडल्स की मुरीद थी.
लेकिन जब उन्होंने लद्दाख के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए सरकार को 'छठी अनुसूची' का वादा याद दिलाया, तो इस रिश्ते में दरार आ गई. शांत लद्दाख में वादे पूरे न होने पर आंदोलन भड़का, जिसके बाद सरकार ने उन्हें सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया. नतीजा यह हुआ कि जो इंजीनियर देश के जवानों को ठंड से बचाने के लिए टेंट बना रहा था, उसे सितंबर 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार कर करीब 6 महीने के लिए जेल भेज दिया गया.
राजनीति से दूरी और गांधीवादी विचारधारा पर अटूट विश्वास
6 महीने जेल में काटने और मुश्किल से जमानत पर रिहा होने के बाद भी सोनम वांगचुक के हौसले पस्त नहीं हुए हैं. लद्दाख के मुद्दों को पीछे छोड़ अब वे दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन के लिए अनशन पर बैठे हैं और अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं. एक ऐसे दौर में जब थोड़ी सी लोकप्रियता मिलते ही लोग चुनावी मैदान में कूद जाते हैं, सोनम वांगचुक ने राजनीति से पूरी तरह दूरी बना रखी है.
उनका कहना है कि राजनीति के दलदल में फंसकर वे अपनी स्वतंत्रता नहीं खोना चाहते. वांगचुक का मानना है कि बदलाव लाने के लिए संसद या विधानसभा में बैठना जरूरी नहीं है. वे महात्मा गांधी की विचारधारा पर चलते हैं, जो सरकार से बाहर रहकर जनता की चेतना जगाने में विश्वास रखती है. वे एक क्लाइमेट एक्टिविस्ट और इनोवेटर बनकर ही सरकारों को सही राह पर लाना पसंद करते हैं, न कि खुद सरकार का हिस्सा बनना.
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