Charchit Chehra: 17 रुपए लेकर निकले थे किस्मत आजमाने, खड़ा कर दिया करोड़ों का साम्राज्य...अरमानी सूट में रखते थे 502 पताका बीड़ी! जानिए सुभाष चंद्रा की कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 12:20 PM • 29 Aug 2026

Charchit Chehra Subhash Chandra: 17 रुपये लेकर कारोबार की दुनिया में कदम रखने वाले सुभाष चंद्रा ने कैसे ZEE TV से लेकर Essel Group तक करोड़ों का साम्राज्य खड़ा किया? NCLT के 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज मामले में 6.5 करोड़ रुपये के सेटलमेंट से लेकर बीजेपी से उनके राजनीतिक कनेक्शन और राहुल गांधी के हमले तक, जानिए सुभाष चंद्रा की पूरी कहानी.

Subhash Chandra Story
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NCLT ने सुभाष चंद्रा की दुनिया बदलने और बैंकों की दुनिया हिलाने वाला ऐसा फैसला सुनाया कि सब हिल गए. 22 हजार 6 करोड़ के बदले सुभाष चंद्रा केवल 6 करोड़ 50 लाख रुपये रीपे करेंगे और कर्ज से मुक्त हो जाएंगे. फाइनेंशियल भाषा में इसे 99.97% का 'हेयरकट' यानी कर्ज में कटौती कहा जा रहा है. इसका सीधा मतलब ये हुआ कि बैंकों और कर्ज देने वालों को हर 100 रुपये के बदले सिर्फ 3 पैसे मिलेंगे. बस इसी से हंगामा मचा है कि कैसे सुभाष चंद्रा का कर्ज माफ हो गया और यहां एक आदमी एक EMI मिस कर दे तो उसके साथ क्या कुछ नहीं हो जाता. चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में आइए जानते हैं सुभाष चंद्रा की पूरी कहानी. 

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आखिर क्या है कर्ज का पूरा मामला?

सुभाष चंद्रा इस समय देश की सबसे बड़ी बिजनेस और पॉलिटिकल हेडलाइन बने हुए हैं. मामला उनकी पर्सनल इनसॉल्वेंसी यानी व्यक्तिगत दिवालियापन प्रक्रिया का है. 25 अगस्त को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने सबको हैरान कर दिया. डॉ. सुभाष चंद्रा पर, उनकी कंपनी पर बैंकों का 22 हजार 6 करोड़ का कर्ज था. क्रेडिटर्स को अपने-अपने पैसे वापस नहीं मिल रहे थे इसलिए उन्होंने NCLT का दरवाजा खटखटाया कि हमारे पैसे दिलवा दीजिए. ऐसे मामले के लिए NCLT ही सबसे पावरफुल बॉडी है. 

NCLT में केस इसलिए पहुंचा था कि 2022 में एस्सेल ग्रुप की कंपनी विवेक इन्फ्राकॉन ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस का 170 करोड़ का लोन डिफॉल्ट किया. सुभाष चंद्रा ने पर्सनल गारंटी दी थी. इंडियाबुल्स ने NCLT में सुभाष चंद्रा को घसीटा. जैसे ही केस एडमिट हुआ तो एलआईसी हाउसिंग और एक्सिस बैंक जैसे देश के अन्य बड़े बैंक भी चंद्रा की पर्सनल गारंटी वाले अपने पुराने बकाये लोन लेकर इसी केस में शामिल हो गए. इससे शुरुआती चिंगारी जो सिर्फ 170 करोड़ की थी, वो आगे चलकर 22 हजार करोड़ का पहाड़ बन गई.

बैंक ने क्यों किया इतने कम में सेटलमेंट?

डॉ. सुभाष चंद्रा की निजी संपत्तियों का ग्राफ चुनावी हलफनामों से लेकर मौजूदा इनसॉल्वेंसी केस यानी दिवालियापन प्रक्रिया तक काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2016 का राज्यसभा चुनाव लड़ते समय उन्होंने घोषित संपत्ति करीब 39 करोड़ बताई थी. 2022 के राजस्थान चुनाव के हलफनामे में घोषित संपत्ति बढ़कर करीब 50 करोड़ तक पहुंची. 

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए सामने आए दस्तावेजों के अनुसार उनकी निजी संपत्ति घटकर 31-32 करोड़ रह गई है. चंद्रा के दफ्तर के मुताबिक, संपत्ति में अब लगभग 25 करोड़ की कीमत का सिर्फ एक आवासीय घर बचा है, और इसी बेहद कम निजी संपत्ति को आधार बनाकर बैंकों ने 22,000 करोड़ के दावों के बदले चंद्रा के 6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है, क्योंकि कानूनी तौर पर उनकी व्यक्तिगत हैसियत इससे ज्यादा भुगतान करने की नहीं बची है.

सुभाष चंद्रा के दफ्तर ने साफ किया है कि उन्होंने व्यक्तिगत क्षमता में कोई कर्ज नहीं लिया था, बल्कि यह राशि एस्सेल ग्रुप की कंपनियों के लिए दी गई उनकी पर्सनल गारंटी से जुड़ी थी. क्रेडिटर्स कमेटी के 80.81% वोटर्स ने इस प्लान को मंजूरी दी थी, जिसके आधार पर NCLT ने यह फैसला सुनाया.

राहुल गांधी ने सरकार को घेरा

NCLT से सुभाष चंद्रा को अप्रतिम राहत मिली और उस राहत पर अब अप्रतिम राजनीति शुरू हो गई है. सोशल मीडिया पर खुसर-फुसर के बीच राहुल गांधी ने सुभाष चंद्रा के बहाने सरकार को रगड़ दिया. राहुल गांधी ने टॉन्ट करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट में NCLT का नया नाम 'नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल' रख दिया. राहुल गांधी ने सरकार को ये कहकर लपेटा कि देश में दो तरह की व्यवस्थाएं चल रही हैं- एक चुनिंदा अरबपतियों के लिए और दूसरी आम जनता के लिए. अगर कोई गरीब किसान 50 हजार का कर्ज न चुकाए तो उसकी जमीन नीलाम हो जाती है, मिडिल क्लास की एक EMI छूट जाए तो बैंक के गुंडे घर आ जाते हैं, लेकिन बड़े उद्योगपतियों को हजारों करोड़ की राहत आसानी से मिल जाती है. जयराम रमेश ने हेयरकट को बैंकों का सीधे-सीधे मुंडन नाम दे दिया. 

हो सकता है राहुल गांधी भी सुभाष चंद्रा को माफ कर देते या उनके मामले की अनदेखी कर देते. ऐसा तब होता जब सुभाष चंद्रा का नाम प्रो बीजेपी वालों की लिस्ट में नहीं होता. सुभाष चंद्रा कभी भाजपाई नहीं बने लेकिन भाजपाई से कम भी नहीं रहे. दोनों की अंडरस्टैंडिंग हमेशा चर्चित रही. अगर ये अंडरस्टैंडिंग नहीं रहती तो शायद आज राहुल गांधी के निशाने पर नहीं आते लेकिन ऐसा हुआ क्योंकि इसका एक लंबा पास्ट रहा है.

सुभाष चंद्रा और बीजेपी से कनेक्शन

इसमें कोई नई बात नहीं कि जब बिजनेस की कामयाबी बुलंदियों को छूए तो प्रमोटर का इंटरेस्ट राजनीति में न जगे. सुभाष चंद्रा ने भी जी और एस्सेल को आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया तो उनका भी मन राजनीति में हाथ आजमाने का हुआ. हालांकि उन्होंने कोई पार्टी जॉइन करने या आम चुनाव लड़ने से परहेज किया. 2016 में उन्होंने हरियाणा से राज्यसभा चुनाव के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरा. अघोषित अंडरस्टैंडिंग थी कि सुभाष चंद्रा निर्दलीय चुनाव में उतरेंगे और बीजेपी उनका सपोर्ट करेगी. बिलकुल ऐसा ही हुआ और सुभाष चंद्रा कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग की बदौलत राज्यसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंच गए. 

6 साल का पहला टर्म पूरा हुआ तो उन्होंने 2022 में दोबारा राज्यसभा चुनाव में उतरने की ठानी. फिर निर्दलीय नामांकन भरा. फिर बीजेपी ने समर्थन दिया लेकिन दूसरी बार राज्य चुना राजस्थान. वो दांव गलत पड़ गया. कांग्रेस ने विधायकों की ऐसी किलेबंदी की कि सुभाष चंद्रा जरूरी वोट नहीं जुटा पाए और हारकर राजस्थान से लौटे. आगे सुभाष चंद्रा दोबारा संसद नहीं पहुंच पाए. न निर्दलीय लड़े, न बीजेपी ने टिकट ऑफर की लेकिन बीजेपी-चंद्रा की मित्रता बनी रही. शायद NCLT वाली राहत किसी मित्र उद्योगपति कोटे से मिली हो जैसा कि सोशल मीडिया पर लोग अटकलें या आरोप लगा रहे हैं.

विजय माल्या ने भी किया टॉन्ट

इन दिनों में देश में ऐसे कई बिजनेस टाइकून की चर्चा है जो बैंकों के हजारों-करोड़ लेकर देश से भाग गए. विजय माल्या ऐसे ही एक भगोड़े हैं. सुभाष चंद्रा को मिली राहत की खबर लंदन में उनके कानों तक पहुंची. विजय माल्या ने सुभाष चंद्रा को बधाई भी दी, टॉन्ट भी कसा कि अगर यह सच है, तो मेरे दोस्त सुभाष को बहुत-बहुत बधाई. मुझसे घोषित 6,203 करोड़ रुपये के कर्ज के बदले बैंकों और सरकार ने अब तक 14,100 करोड़ रुपये वसूल कर लिए हैं, लेकिन मुझे कोई राहत नहीं मिली. और दूसरी तरफ 22,000 करोड़ का कर्ज महज 6.5 करोड़ में सेटल हो रहा है. शायद यही भारत का असली 'डेट रेजोल्यूशन जस्टिस' है, जिस पर मीडिया कोई सवाल नहीं उठाता. विजय माल्या को ऐसे तो कोई पसंद नहीं कर रहा लेकिन सुभाष चंद्रा केस में उन्होंने जो लिखा उसने सोशल मीडिया पर 'लोन सेटलमेंट' के नियमों को लेकर बहस गरम कर दी है. 

अकेले अपने दम पर बनाया साम्राज्य

भले सुभाष चंद्रा राजनीति में आते-जाते नहीं. भले NCLT से इतनी बड़ी और रेयर राहत नहीं पाते तब भी उनकी कहानी है तो हिसार के उस साधारण लड़के की जिसने अपने दम पर बादशाहत कायम की. डॉ. सुभाष चंद्रा इंडियन मीडिया बिजनेस वर्ल्ड में एक ऐसे क्रांतिकारी विजनरी के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने देश में एंटरनेटमेंट की दुनिया बदल दी. 1992 में जब देश में सिर्फ दूरदर्शन का राज था, तब चंद्रा ने देश का पहला डोमेस्टिक सैटेलाइट चैनल जी टीवी लॉन्च करके प्राइवेट केबल और सैटेलाइट टीवी क्रांति की नींव रखी थी. वही जी न्यूज, जी टीवी के फाउंडर, मालिक माने जाते हैं इसलिए किसी न किसी तरह चर्चा में रहते हैं लेकिन अब जो हुआ उसने एकदम चर्चित चेहरा बना दिया है सोशल मीडिया और मीडिया हेडलाडन का.

कौन हैं सुभाष चंद्रा?

सुभाष चंद्रा का जन्म 30 नवंबर 1950 को हरियाणा के हिसार जिले के आदमपुर में साधारण परिवार में हुआ था. परिवार अनाज का कारोबार किया करता था. जवानी आते-आते परिवार का पारंपरिक अनाज का कारोबार बुरी तरह डूब गया. परिवार पर करीब 3.5 लाख रुपये का कर्ज चढ़ गया, जो उस जमाने में एक बहुत बड़ी रकम थी. उस क्राइसिस में सुभाष की पढ़ाई छूटी लेकिन हार नहीं मानने का जज्बा नहीं टूटा. जेब में लेकर 17 रुपये किस्मत आजमाने निकल पड़े.

सुभाष चंद्रा ने सूझबूझ से अनाज के व्यापार को दोबारा नए तरीके से शुरू किया. उन्होंने भारतीय खाद्य निगम (FCI) को अनाज सप्लाई करने का बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया. देश में अनाज भंडारण की भारी कमी चंद्रा के लिए बड़ा बिजनेस आइडिया बनी. आइडिया था खुले मैदानों में रखे अनाज को कवर करने का. उन्होंने मशीनें मंगाकर प्लास्टिक पैकेजिंग यानी एस्सेल प्रोपैक के बिजनेस में कदम रखा. आगे चलकर वही बिजनेस टूथपेस्ट जैसे प्रोडक्ट के लिए लैमिनेटेड ट्यूब बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बन गई. फिर तो सुभाष बढ़ते ही गए.

ZEE की शुरुआत की कहानी

1992 सुभाष चंद्रा की लाइफ और इंडियन मीडिया का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था.  खाड़ी युद्ध के समय भारत में विदेशी चैनलों का क्रेज देखकर चंद्रा के मन में अपना टीवी स्टेशन शुरू करने की सोची. तब भारतीय कानून निजी टीवी चैनलों की इजाजत नहीं देता था. उन्होंने हॉन्गकॉन्ग की मीडिया कंपनियों के साथ हाथ मिलाया. तमाम विरोध, भारी रिस्क के साथ 2 अक्टूबर 1992 को जी टीवी लॉन्च कर दिया. उस Zee ब्रैंड ने आगे चलकर सरकारी दूरदर्शन का एकाधिकार हमेशा के लिए खत्म कर दिया. सुभाष चंद्रा ने भारत में प्राइवेट सैटेलाइट टीवी क्रांति की नींव रख दी. Zee TV एंटरनेटमेंट चैनल था. 1999 में उन्होंने जी न्यूज की शुरुआत की और देखते ही देखते टीवी एंटरनेटमेंट और न्यूज की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई.

ZEE ने दिलाई सुभाष चंद्रा को पहचान?

नाम ZEE रखने के लिए अंग्रेजी अल्फाबेट की तह तक गए. पाया कि Z अल्फाबेट आखिरी शब्द है. उन्होंने ऐसे चैनल के लिए सोचा जो एंटरटेनमेंट का आखिरी पड़ाव हो. एक बार दर्शक आएं तो फिर कहीं और न जाएं. ZEE ब्रैंड तो बना लेकिन आखिरी नहीं. उनके बाद बहुत सारे ब्रैंड बने, छाए और आज तक लोगों को एंटरटेन कर रहे हैं. आमतौर पर बड़े-बड़े लोग अपने ब्रैंड का क्रेडिट खुद लेते हैं, लेकिन सुभाष चंद्रा ने किसी इंटरव्यू में कहा मैंने जी को नहीं बनाया. सच तो ये है कि जब तक जी टीवी नहीं बना था, तब तक सुभाष चंद्रा को नुक्कड़ की पान की दुकान वाला भी नहीं जानता था.

डॉ. सुभाष चंद्रा की शख्सियत और उनकी जीवनशैली से जुड़ा सबसे दिलचस्प और चर्चित किस्सा उनकी एक खास देसी आदत को लेकर है, जो उनके अरबपति होने के बाद भी कभी नहीं छूटी. द प्रिंट की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक कॉरपोरेट जगत और मीडिया गलियारों में इस बात की अक्सर चर्चा होती थी कि जब सुभाष चंद्रा विदेशी दौरों या हाई-प्रोफाइल बिजनेस मीटिंग्स के लिए 'अरमानी' (Armani) ब्रांड के महंगे और आलीशान सूट पहनते थे, तब भी उनकी जेब में सिगरेट के बजाय देश की सबसे मशहूर देसी '502 पताका बीड़ी' का बंडल हुआ करता था.

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NCLT से सुभाष चंद्रा को मिली बड़ी राहत, ₹22,006 करोड़ का कर्ज… चुकाने होंगे सिर्फ ₹6.5 करोड़, उठे कई बड़े सवाल!