Charchit Chehra: कौन हैं तस्लीमा नसरीन, जिनकी कोलकाता वापसी का स्वागत कर रही है बीजेपी? जानिए उनकी पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 11:57 AM • 16 Jul 2026

Charchit Chehra: करीब 19 साल बाद तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति गरमा गई है. बीजेपी उनके स्वागत की तैयारी कर रही है, जबकि इस मुद्दे पर लेफ्ट और ममता बनर्जी सरकार की पुरानी भूमिका भी चर्चा में है. आखिर कौन हैं तस्लीमा नसरीन, कैसे बदली उनकी जिंदगी, कोलकाता से बेदखली की कहानी और उनकी वापसी को बीजेपी क्यों बड़ा राजनीतिक संदेश मान रही है?

Taslima Nasrin Biography
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4 मई से बंगाल की राजनीति, समाज-सब बहुत कुछ बदल रहा है. करीब 20 साल के लंबे वनवास के बाद, कोलकाता में तस्लीमा नसरीन की वापसी हो रही है. तस्लीमा नसरीन को कोलकाता के रवींद्र सदन में साहित्यिक उत्सव समेत तीन आयोजनों में शामिल होने के लिए बुलाया गया है. बीजेपी लीडरशिप और सीएम सुवेंदु अधिकारी खुद उनके होमकमिंग का वेलकम करेंगे. बीजेपी की मैसेजिंग ये है कि लेफ्ट और ममता ने तुष्टिकरण की राजनीति के कारण एक महिला, एक मुसलमान, एक लेखिका को उसकी संस्कृति से दूर किया था, अब उसकी गरिमा बीजेपी वापस लौटा रही है. करीब 19 साल बाद कोलकाता में कदम रखने की ही चर्चा है, जिसने तस्लीमा नसरीन को चर्चित चेहरा बनाया है. 

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बचपन की बंदिशों से शुरू हुआ तस्लीमा नसरीन का सफर आज राजनीति के सबसे बड़े केंद्र बिंदु पर आकर रुक गया है. शादियों का टूटना, मां न बनने का फैसला, वतन से बेदखली और फिर कोलकाता की सड़कों पर दंगे... तस्लीमा की पूरी जिंदगी एक महासंग्राम की तरह है. आज कोलकाता की धरती पर उनकी यह वापसी सिर्फ एक लेखिका की वापसी नहीं है, बल्कि बंगाल की आने वाली राजनीति का एक नया नैरेटिव है. आइए जानते हैं उनकी पूरी कहानी.

कौन है तस्लीमा नसरीन?

25 अगस्त 1962 को बांग्लादेश के मयमनसिंह में जन्मीं तस्लीमा नसरीन के घर का माहौल कुछ अजीब ही था. पिता डॉ. रजब अली न केवल पढ़े-लिखे बल्कि जाने-माने डॉक्टर और मेडिकल प्रोफेसर थे. मां ईदउल आरा धार्मिक और पुराने ख्यालों की महिला थीं. पिता ये तो चाहते थे कि बेटी तस्लीमा पढ़-लिखकर  डॉक्टर बनें, लेकिन बेटी को घर की दहलीज के बाहर कदम रखने की आजादी नहीं दी. तस्लीमा के भाइयों को सिनेमा जाने, दोस्तों से मिलने की पूरी छूट थी, लेकिन तस्लीमा और उनकी बहन पर सख्त पाबंदियां थीं. घर के इसी डर और घुटन के बीच तस्लीमा ने खुद को किताबों और कविताओं के हवाले कर दिया. उन्होंने छिपकर कहानियां लिखना शुरू किया, जहां से उनके भीतर एक विद्रोही लेखिका ने जन्म लिया.

तस्लीमा के घर में बंदिशें लड़कियों की आजादी पर थीं, उनकी पढ़ाई पर नहीं. डॉ. रजब अली अपनी बेटियों को समाज में बड़े मुकाम पर देखना चाहते थे.  तस्लीमा के लिए पिता का बनाया नियम था कि वो स्कूल या कॉलेज से सीधे घर आएंगी. किसी दोस्त के घर जाने, सिनेमा देखने या सोशलाइट होने की इजाजत नहीं थी. पढ़ाई की पूरी छूट थी, लेकिन सामाजिक आजादी शून्य थी. तस्लीमा नसरीन को डॉक्टर नहीं बनना था. उन्हें तो लिखना था. पिता के कड़े अनुशासन और जिद के आगे झुककर उन्होंने 1976 मेडिकल में एडमिशन लिया. एक दिन ऐसा आया कि बेटी ने पिता का सपना पूरा कर दिया. 1984 में मेडिकल की पढ़ाई पूरी करके सरकारी डॉक्टर बन गईं. 

सरकारी नौकरी छोड़ लिखने का किया फैसला!

गायनेकोलॉजिस्ट बनना दूसरा टर्निंग प्वाइंट बना. आए दिन बलात्कार पीड़ित मासूम बच्चियों, दहेज के लिए जलाई गई औरतों और बेटियों को जन्म देने पर रोती माताओं का दर्द देखकर तस्लीमा का दिल दहलता रहा. उसी दर्द ने उन्हें नास्तिक और कट्टर नारीवादी बनाया. उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर सिर्फ लिखने का फैसला किया. फिर तो चीजें ऐसी होती रहीं तो तस्लीमा जैसी थी वैसे बने रहना मजबूरी और नियति बन गया. 

कैसा चर्चा में आई तस्लीमा?

1992 में भारत के बाबरी विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को देखकर तस्लीमा ने 'लज्जा' (Lajja) उपन्यास लिखा. किताब ने उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया. बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतें भड़क उठीं, किताब पर बैन लगा, लाखों लोगों ने सड़कों पर उनके खिलाफ प्रदर्शन किया और उनके सिर पर इनाम रख दिया गया. इसी मोड़ ने उन्हें रातों-रात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया. लज्जा में उन्होंने दत्ता परिवार की कहानी के जरिए सांप्रदायिक दंगों, बलात्कार और अपहरण की उन घटनाओं को बेनकाब किया जिससे परिवार अपना देश छोड़ने के लिए मजबूर हुआ. 

तस्लीमा फेमस हुई तो इंटरव्यू देने लगीं. उनकी बातों, बयानों को  इस्लाम और शरिया के खिलाफ मान लिया गया. उनके खिलाफ बांग्लादेश की सड़कों पर लाखों कट्टरपंथी उतर आए, तस्लीमा को 'नास्तिक' घोषित किया गया, उनके खिलाफ मौत के फतवे जारी हुए और सिर पर इनाम रख दिया गया. तत्कालीन बांग्लादेशी सरकार ने उनके खिलाफ ईशनिंदा का केस दर्ज कर दिया. जान बचाने के लिए तस्लीमा को अगस्त 1994 में बुर्का पहनकर, छिपते हुए अपना देश छोड़कर स्वीडन भागना पड़ा. तब से शुरू हुई भागमभाग आज तक खत्म नहीं हुई. 

तस्लीमा ने बनाई अपनी अलग पहचान!

दुनिया के कट्टरपंथ ने हमेशा मुसलमान महिलाओं को बुर्के और बंदिशों में कैद करने की वकालत की. तस्लीमा को भी डराया लेकिन उन्होंने फतवों का जवाब बंदूकों से नहीं, बल्कि बंगाली महिलाओं वाली चटक सूती, हैंडलूम साड़ियों, माथे की उस चमचमाती लाल बिंदी से दिया. हो सकता लाल बिंदी उनके लिए सिर्फ श्रृंगार हो लेकिन पूरी दुनिया में ये तस्लीमा का साइलेंट रिवॉल्यूशन का सिंबल बना कि हर औरत अपनी शर्तों पर सजने और जीने का हक रखती है.

तस्लीमा नसरीन मुसलमान हैं, महिला मुसलमान हैं. उनके पीछ मुसलमान ही पड़े रहे. करीब एक दशक यूरोप में गुजारने के बाद, बंगाली संस्कृति के मोह में तस्लीमा 2004 में कोलकाता आकर बस गईं, लेकिन 2003 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडिता' ने फिर आग लगा दी. किताब में इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणियों को ईशनिंदा माना गया, जिससे दंगे भड़क उठे. 2005 में कलकत्ता हाईकोर्ट से बैन हटाए जाने के बाद भी तस्लीमा के लिए कोलकाता में रहना नामुमकिन हो गया.

कलकत्ता से बेदखल होकर पहुंची थी दिल्ली

तस्लीमा के कलकत्ता में रहने से मुसलमान भड़कते रहेंगे, इसलिए तब की लेफ्ट की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार ने उन्हें कोलकाता से जाने के लिए कह दिया. तस्लीमा की फिर भागमभाग शुरू हुई. 2011 में ममता बनर्जी सत्ता में आईं तो तस्लीमा नसरीन ने राहत की सांस ली कि दीदी उन्हें शरण देंगी लेकिन मुसलमानों की नाराजगी के डर से ममता ने तस्लीमा को कोलकाता में दोबारा शरण देने या पैर रखने की इजाजत देने से साफ मना कर दिया. 

उस जमाने में देश में यूपीए की सरकार थी जिसे कांग्रेस चला रही थी. कोलकाता से बेदखल तस्लीमा केंद्र सरकार ने रेजिडेंस परमिट देकर दिल्ली में रहने तो दिया लेकिन इस हिदायत और बंदिशों के साथ कि वो चुप रहेंगी. तस्लीमा के मुसलमान होने, बांग्लादेशी होने के बाद भी बीजेपी ने हमेशा हमदर्दी जताई. धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ संघर्ष और अभिव्यक्ति की आजादी का बड़ा चेहरा माना. मोदी सरकार के वक्त भी भारत और दिल्ली उनके लिए सेफ हाउस बना हुआ है लेकिन खुलकर बोलने, खुलकर लिखने की बंदिश बनी रही. घर की बंदिशों से लड़ती तस्लीमा विद्रोही तो बनीं लेकिन बंदिशों के जाल से आज तक आजाद नहीं हो पाई. 

तस्लीमा नसरीन बंगाली भाषा में लिखती हैं. बाद में उनकी लोकप्रिय किताबों-लज्जा, द्विखंडिता, हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच और दुनिया की 30 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हुआ. तस्लीमा नसरीन ने अपने चार दशक से लंबे साहित्यिक सफर में बंगाली भाषा में 40 से अधिक किताबें लिखी लेकिन लज्जा और द्विखंडिता के बाद कम से कम कुछ ऐसा नहीं लिखा जिस पर इतना हंगामा हुआ हो.

तीन-तीन शादियां, लेकिन सारी टूट गईं!

तस्लीमा नसरीन डॉक्टर ही रहतीं तो जिंदगी कुछ और होती. लेखिका बनने के बाद उनका सब कुछ छूट गया. पर्सनल लाइफ में भी कम उथल-पुथल रही. तस्लीमा नसरीन की शादियां जितनी तेजी से हुईं, उतनी ही तेजी से पुरुष प्रधान समाज की बंदिशों के कारण टूटती भी चली गईं. उन्होंने तीन-तीन शादियां कीं लेकिन हर शादी कुछ ही महीनों या सालों में बिखर गया. एक कॉमन कारण ये माना जाता है कि उन्हें मां बनना मंजूर नहीं था.

तस्लीमा ने पहली शादी महज 20 साल की उम्र में साल 1982 में बांग्लादेश के मशहूर और विद्रोही कवि रुद्र मोहम्मद शाहिदुल्लाह से की थी. इसके लिए वे घर से भाग गई थीं, लेकिन रुद्र की बेलगाम जीवनशैली और वैचारिक मतभेदों के कारण 1986 में दोनों का तलाक हो गया. 1990 में उन्होंने बांग्लादेश के जाने-माने पत्रकार नईमुल इस्लाम खान से विवाह किया. यह रिश्ता भी अपनी शर्तों पर जीने की तस्लीमा की जिद और आपसी टकराव के कारण साल भर भी नहीं टिक सका और 1991 में टूट गया.

1991 में ही उन्होंने ढाका के मशहूर संपादक और लेखक मीनार मसूद से तीसरी शादी की. लेकिन घरेलू बंदिशों, पुरुषवादी अहंकार और तस्लीमा के कट्टर नारीवादी विचारों के मेल न खाने के कारण मात्र एक साल के भीतर तीसरी शादी भी हमेशा के लिए खत्म हो गई. आगे उन्होंने शादी का जोखिम नहीं लिया. तस्लीमा ने अपनी शादियों के इन कड़वे अनुभवों के बाद यह साफ समझ लिया कि शादी से स्वतंत्र और बेबाक महिला का दम घुटता है.