एक प्रोफेसर जिसने राष्ट्रीय स्तर पर अवॉर्ड जीतने वाली फिल्में बनाईं... जिसने संसद की उस कमेटी में जगह पाई जो महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करती है, आज उसी पर 11 छात्राओं ने वाइवा के दौरान नंबरों का सौदा करने का संगीन आरोप लगा दिया है! राजनीति की वो आवाज, जो मणिपुर हिंसा के समय राष्ट्रीय मीडिया के पक्षपात पर अकेली दहाड़ रही थी, आज JNU से बर्खास्तगी के बाद खुद विवादों के कटघरे में है. मणिपुर से कांग्रेस के चर्चित सांसद डॉ. अंगोमचा बिमोल अकोइजम को यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के बाद जेएनयू प्रशासन ने बर्खास्त कर दिया है.
ADVERTISEMENT
विवाद की जड़ में जेएनयू का वो सिस्टम लगता है जहां वाइवा और इंटर एक्जाम में के नंबर सीधे प्रोफेसर के हाथ में होते हैं. 11 छात्राओं ने आरोप लगाया कि प्रोफेसर अकोइजम ने उन नंबरों को बढ़ाने के एवज में सेक्सुअल फेवर की मांग की. आरोप लगने के बाद जेएनयू ने इंटरनल कंप्लेंट कमेटी ने जांच की. रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाने के बाद प्रोफेसर अकोइजम को जेएनयू से निकाल दिया गया लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ. उनका कांग्रेस नेता और सांसद होना विवाद को और बड़ा बनाता जा रहा है.
अकोइजम ने सभी आरोपों को किया खारिज
अकोइजम ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए राजनीतिक विच हंट तो बताया लेकिन बीजेपी की नजरों में प्रोफेसर अकोइजम महिलाओं के अपराधी हैं. डॉ. बिमोल अकोइजम को जेएनयू से बर्खास्त किए जाने और दिल्ली पुलिस में एफआईआर दर्ज होने के बाद बीजेपी महिला मोर्चा ने कांग्रेस के खिलाफ बड़ा राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है. हाथों में 'सेक्स के बदले नंबर' Marks for Sex लिखे आक्रामक पोस्टर लेकर बीजेपी कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और कांग्रेस मुख्यालय का घेराव करते हुए सांसद अकोइजम और राहुल गांधी के पुतले फूंके.
बीजेपी केवल अकोइजम के जेएनयू से निकाले जाने से संतुष्ट नहीं है. अगला स्टेप है लोकसभा से उनकी संसद सदस्यता रद्द कराने का हो सकता है. बिमोल अकोइजम के खिलाफ ये बात जा रही है कि जेएनयू में कांग्रेस और लेफ्ट के छात्र संगठनों ने चुप्पी साधे रखी जबकि एबीवीपी ने मोर्चा खोला हुआ था. जेएनयू से निकाले जाने के बाद भी कांग्रेस हाईकमान पर कोई रिएक्शन नहीं आया.
डॉ. बिमोल अकोइजम का जन्म 1 मार्च 1967 को इम्फाल वेस्ट के कीशमथोंग में हुआ था. इम्फाल की तंग गलियों और मणिपुर के उग्रवाद के साए में अकोइजम का बचपन बीता. बचपन से ही मेधावी बिमोल ने पूर्वोत्तर के संकट को बहुत करीब से देखा, जिसने उनके भीतर एक एक्टिविस्ट को जन्म दिया. हायर एजुकेशन के लिए उन्होंने मणिपुर छोड़ा और दिल्ली आए. दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के किरोड़ीमल कॉलेज से Psychology में एमए और 2001 में पीएचडी पूरी की. उन्होंने 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज' (CSDS) में रिसर्चर के तौर पर काम किया. JNU के 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम्स' (CSSS) में एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त हुए. वो सिर्फ साइकोलॉजी के प्रोफेसर या नेता नहीं बल्कि फिल्ममेकर भी हैं. उन्होंने 'आज़ादी की खामोशियां' (2002), 'लैंग-गोई चल्लाबी: पैराडाइज अंडर सीज' (2004) और 'करिगी किरुनी नुंगसिरादी' (2014) जैसी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर चर्चित Documentaries और फिल्में बनाई हैं.
मैतेई समुदाय की आवाज बनकर सामने आए
डॉ. बिमोल अकोइजम की राजनीति में एंट्री किसी प्लान के तहत नहीं हुई. बल्कि मणिपुर के हालातों की उपज थी. साल 2023 से पहले JNU प्रोफेसर, रिसर्चर और फिल्ममेकर के तौर पर शांत जीवन जी रहे थे. मई 2023 में जब मणिपुर में कुकी और मसमुदायों के बीच भीषण जातीय हिंसा भड़की, तो अकोइजम के भीतर का एक्टिविस्ट जाग उठा. वे मणिपुर के बहुसंख्यक मैतेई समुदाय की आवाज बनकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने आए. दिल्ली के सेमिनारों, टीवी डिबेट्स और अखबारों के कॉलम में केंद्र और राज्य सरकार की विफलता पर इतने तार्किक और आक्रामक तरीके से बोलने लगे कि मैतेई के लोगों के लिए मसीहा बनकर उभरे.
राहुल गांधी और डॉ. बिमोल अकोइजम का कनेक्शन साल 2023 की मणिपुर हिंसा के दौरान ही मजबूत हुआ था. जब राहुल गांधी अपनी 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' और उससे पहले संकट के समय मणिपुर के राहत शिविरों के दौरे पर गए थे, तब वे हालात को समझने के लिए वहां के बुद्धिजीवियों से मिल रहे थे. इसी दौरान दिल्ली और मणिपुर के बीच किसी रणनीतिक बैठक में राहुल गांधी की मुलाकात प्रोफेसर अकोइजम से हुई.
तब तक अकोइजम राजनीति में नहीं, एकेडमिक्स की बड़ी हस्ती थे. मणिपुर की हिंसा में हाथ बीजेपी के जले जिसका राजनीतिक फायदा उठाने का मौका कांग्रेस को मिला. मणिपुर के लिए अकोइजम की दहाड़ती आवाज राहुल गांधी तक पहुंची. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस को मणिपुर में एक मजबूत चेहरे की तलाश थी. डॉ. बिमोल अकोइजम कई क्राइटेरिया और क्वालिटी के कारण फिट बैठे. राहुल गांधी की पसंद बनकर उन्होंने इनर मणिपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और बीजेपी को हराकर संसद पहुंचे. संसद में दिए उनके पहले ही आक्रामक भाषण ने उन्हें रातों-रात कांग्रेस का राष्ट्रीय हीरो बना दिया.
JNU में अपनी प्रोफेसर की नौकरी नहीं छोड़ी
लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी डॉ. बिमोल अकोइजम ने JNU में अपनी प्रोफेसर की नौकरी नहीं छोड़ी, बल्कि कानून और UGC की विशेष गाइडलाइन के आधार पर संसद और यूनिवर्सिटी के क्लासरूम, दोनों को एक साथ संभाल रहे थे. नियम के मुताबिक, देश के उच्च शिक्षण संस्थानों के परमानेंट प्रोफेसरों को चुनाव जीतने के बाद अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखने की छूट मिलती है, बशर्ते वे दोहरी सैलरी का लाभ न लें.
संविधान के तहत कोई भी व्यक्ति लाभ के पद यानी Office of Profit पर रहते हुए सांसद नहीं बन सकता, लेकिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर का पद तकनीकी रूप से इसके दायरे में नहीं आता. हितों के टकराव से बचने के लिए अकोइजम ने सांसद चुने जाने के बाद JNU प्रशासन से Extraordinary Leave ले ली. जिससे उनकी सरकारी नौकरी भी सुरक्षित रही और संसद भी पहुंच गए. उन्होंने सांसद के तौर पर मिलने वाली सैलरी और भत्ते लेने से मना किया. JNU से मिलने वाली अपनी लगभग 2.78 लाख रुपये प्रति माह की प्रोफेसर वाली सैलरी ही ले रहे थे. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के चुनावी हलफनामे के मुताबिक, उनका प्रोफाइल बेहद साधारण है. उनके पास कुल संपत्ति लगभग 97.67 लाख रुपये है.
विवाद की जड़ में जेएनयू का वो सिस्टम लगता है जहां वाइवा और इंटर एक्जाम में के नंबर सीधे प्रोफेसर के हाथ में होते हैं. 11 छात्राओं ने आरोप लगाया कि प्रोफेसर अकोइजम ने उन नंबरों को बढ़ाने के एवज में सेक्सुअल फेवर की मांग की. आरोप लगने के बाद जेएनयू ने इंटरनल कंप्लेंट कमेटी ने जांच की. रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाने के बाद प्रोफेसर अकोइजम को जेएनयू से निकाल दिया गया लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ. उनका कांग्रेस नेता और सांसद होना विवाद को और बड़ा बनाता जा रहा है.
ये भी पढ़ें: Shesh Bharat: सीएम विजय ने तमिलनाडु उपचुनाव में कैसे जीतीं दोनों ही सीटें? समझिए सियासत का पूरा गणित
ADVERTISEMENT


