FCRA Amendment Bill: संसद से अमेरिका तक FCRA संशोधन बिल पर बवाल, जानें क्या हैं नए प्रावधान और क्यों हो रहा है भारी विरोध

राजू झा

• 08:18 PM • 10 Aug 2026

FCRA Amendment Bill: केंद्र सरकार विदेशी चंदे और फंडिंग से जुड़े नियमों में बदलाव के लिए FCRA संशोधन विधेयक ला रही है, जिसका विपक्ष विरोध कर रहा है. प्रस्तावित बदलावों में विदेशी फंड के इस्तेमाल की स्पष्ट जानकारी, रद्द या समाप्त FCRA लाइसेंस वाली संस्थाओं की संपत्तियों पर कार्रवाई और 5 साल बाद लाइसेंस रिन्यू न होने पर पंजीकरण खत्म करने जैसे प्रावधान शामिल हैं. जानिए पूरी डिटेल.

FCRA Amendment Bill 2026
FCRA Amendment Bill 2026
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केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र में फॉरेन कंट्रीब्यूशन एक्ट यानी FCRA संशोधन विधेयक को पास कराने की तैयारी में है. हालांकि, इसे लेकर संसद में विपक्ष का भारी विरोध देखने को मिल रहा है. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी इस विधेयक का पुरजोर विरोध करेगी. एफसीआरए बिल को लेकर न सिर्फ भारत के राजनीतिक गलियारों में हलचल है, बल्कि अमेरिका से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. आइए विस्तार से समझते है क्या है यह बिल और क्यों हो रहा विरोध.

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आखिर क्या है एफसीआरए कानून और इसका इतिहास

फॉरेन कंट्रीब्यूशन एक्ट (FCRA) भारत में विदेश से मिलने वाले चंदे और आर्थिक सहायता को नियंत्रित व पारदर्शी बनाने के लिए बनाया गया एक कानून है. इसे सबसे पहले 1976 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान लागू किया था. इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय एनजीओ और संस्थानों में विदेशी शक्तियों की फंडिंग को रोकना था, ताकि कोई भी बाहरी ताकत देश के अंदरूनी मामलों को प्रभावित न कर सके. यह कानून तय करता है कि कौन विदेशी चंदा ले सकता है, किस शर्त पर ले सकता है और उसका हिसाब कैसे रखा जाएगा. साल 2010 में मनमोहन सिंह सरकार और 2020 में मोदी सरकार द्वारा इसमें संशोधन कर नियमों को और सख्त किया गया था.

सरकार द्वारा प्रस्तावित 3 बड़े बदलाव

25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद हंगामे के कारण अटका यह बिल अब मानसून सत्र में लाया जा रहा है. सरकार इसमें तीन प्रमुख बदलाव करना चाहती है. 

  • पहला बदलाव यह है कि एनजीओ और संस्थानों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट पर साफ-साफ लिखना होगा कि विदेशी पैसा किस विशेष काम के लिए और किस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में खर्च होगा. 
  • दूसरा बदलाव 'डिजाइनेटेड अथॉरिटी' (Designated Authority) का गठन करना है, जो उन एनजीओ की संपत्तियों को जब्त, मैनेज या बेच सकेगी जिनका एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द या समाप्त हो चुका है. 
  • तीसरा बदलाव समाप्ति (Cessation) से जुड़ा है, जिसके तहत 5 साल बाद रजिस्ट्रेशन रिन्यू न कराने पर लाइसेंस अपने आप खत्म हो जाएगा और विदेशी फंड से बनी संपत्ति स्वतः प्राधिकारी के पास चली जाएगी.

न्यूनतम खर्च का नियम और सजा के प्रावधान में बदलाव

नए बिल के प्रावधानों के अनुसार, एनजीओ को अपना एफसीआरए लाइसेंस बरकरार रखने के लिए हर साल अपने विदेशी फंड अकाउंट से कम से कम 1 लाख रुपये खर्च करने अनिवार्य होंगे. वहीं, कानून का उल्लंघन करने पर मिलने वाली अधिकतम सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसके अलावा, जब्त की गई धार्मिक संस्थाओं व पूजा स्थलों के मूल स्वरूप को बरकरार रखने की बात भी कही गई है, यानी मंदिर या चर्च जैसी संपत्तियों का स्वरूप बदला नहीं जाएगा.

विपक्ष के विरोध की वजह और विवादित 3 सेक्शंस

विपक्ष इस बिल को पूरी तरह से असंवैधानिक और एनजीओ व कम्युनिटी ग्रुप्स को दबाने की कोशिश बता रहा है. विवाद मुख्य रूप से तीन सेक्शंस- 14B, 16A और 16B पर केंद्रित है. सेक्शन 14B रिन्यूअल न होने पर लाइसेंस खत्म करने, 16A लाइसेंस खत्म होते ही संपत्ति पर सरकारी अथॉरिटी के नियंत्रण और 16B पुरानी संपत्तियों पर नए नियम लागू करने की अनुमति देता है. विपक्ष का आरोप है कि इन कड़े नियमों के जरिए सरकार अल्पसंख्यकों और खासकर केरल में ईसाई समूहों द्वारा संचालित संगठनों को डराने व उन पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर रही है.

किन लोगों को नहीं मिलता विदेशी चंदा

एफसीआरए कानून के तहत कुछ विशेष पदों और व्यक्तियों के विदेशी चंदा लेने पर पूरी तरह से पाबंदी है. इनमें चुनाव के उम्मीदवार, संसद व विधानसभा के सदस्य, राजनीतिक दल व उनके पदाधिकारी, न्यायाधीश व न्यायिक कर्मचारी, सरकारी व सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी शामिल हैं. इसके अलावा पत्रकार, मीडिया संस्थापक, प्रकाशक और कार्टूनिस्ट भी किसी भी प्रकार का विदेशी फंड स्वीकार नहीं कर सकते हैं.

अमेरिका क्यों दे रहा है चेतावनी और भारत का रुख

अमेरिका के राजनीतिक हलकों में इस संशोधन को लेकर काफी नाराजगी देखी जा रही है. अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद रायले नोरी ने इसे ईसाई संस्थानों और चर्चों पर हमला करार दिया है. अमेरिकी सांसदों ने यह चेतावनी तक दे डाली है कि यदि यह बिल लागू होता है तो भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है. दरअसल, भारत में आने वाले कुल विदेशी अनुदान में सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है. भारत का रुख साफ है कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाने और बिना जांच-परख के आने वाले पैसों पर रोक लगाने के लिए यह कदम जरूरी है.