फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं की बरसात पर बड़ी चेतावनी, जानें क्या कहा

CJI Suryakant on Freebies: मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली और कैश ट्रांसफर पर देश की राजनीति गरम है. सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने चुनावी राज्यों में हलचल बढ़ा दी है. क्या कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं या बढ़ती मुफ्तखोरी अर्थव्यवस्था पर बोझ बन रही है? कानूनी लड़ाई और सियासी टकराव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है.

फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त (प्रतीकात्मक फोटो)
फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त (प्रतीकात्मक फोटो)

रूपक प्रियदर्शी

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 Supreme Court on freebies: क्या मुफ्त का राशन, मुफ्त की बिजली और मुफ्त के पैसे हमें आलसी बना रहे हैं? क्या राजनीतिक दल वोट बटोरने के लिए देश की तिजोरी खाली कर रहे हैं? आज देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं की इन 'मुफ्त की रेवड़ियों' पर ऐसा प्रहार किया है जिससे पूरी राजनीति में हड़कंप मच गया है. दरअसल, मुफ्त की रेवड़ियों (Freebies) पर चल रही सियासी और कानूनी जंग अब अपने चरम पर है. सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्त रुख अपनाया है, वह आने वाले चुनावों की दिशा बदल सकता है.

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लगता तो है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोक-कल्याण और मुफ्तखोरी के बीच एक रेखा खींचने का मन बना लिया है. कहीं ऐसा न हो जाए कि इस साल जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं उनके लिए कोई सुप्रीम आदेश आ जाए. वैसे भी इस साल चुनावी राज्यों में केवल असम ही है जहां बीजेपी शासन में हैं. बाकी सब राज्यों में कांग्रेस नंबर 2 की रेस में भी नहीं है और गैर-बीजेपी पार्टियों का डॉमिनेंस होना है.

चुनावी राज्यों में कैश ट्रांसफर और मुफ्त सुविधाओं की बढ़ती होड़

अगले कुछ महीनों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. यही समय होता है जब सरकारों से लोगों को कुछ मिलता है. आज कल तो सीधे कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर हजारों में कैश अकाउंट में आता है. पूरा ध्यान रहता है कि महिलाओं के हाथ में कैश पहुंचे. तमिलनाडु में स्टालिन की सरकार ने 5 हजार कैश देना शुरू भी कर दिया.
और कोई लैपटॉप भी देगा, साइकिल भी और न जाने क्या-क्या. जिस पार्टी की सत्ता होती है उसके पास देने का मौका सरकारी खजाने से होता है. जो सत्ता में नहीं रहता है वो सिर्फ वादे दे सकता है कि सत्ता में आएंगे तो ये देंगे, वो देंगे.

जनहित याचिका में ‘तर्कहीन फ्रीबीज’ पर कार्रवाई की मांग

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली की बेंच एक जनहित याचिका पर सुनवाई के लिए बैठी थी. जनयाचिका भी तमिलनाडु में फ्री बिजली देने के प्रस्ताव के खिलाफ बीजेपी नेता और वकील अश्वनी उपाध्याय ने लगाई थी. महिलाओं को 5-5 हजार देने के साथ तमिलनाडु में स्टालिन सरकार ने सभी को चाहे अमीर हो या गरीब मुफ्त बिजली देने का एलान किया है. उसी के विरोध में अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की कि चुनाव से पहले 'तर्कहीन मुफ्त उपहार' (irrational freebies) का वादा करने वाली पार्टियों का चुनाव चिन्ह जब्त किया जाए या उन्हें डी-रजिस्टर्ड किया जाए.

सीजेआई सूर्यकांत की तीखी टिप्पणी

बीजेपी पहले इसे रेवड़ी कल्चर कहती थी लेकिन चुनाव जीतने के लिए अब वो भी उपहार देने वालों में शामिल हैं. अश्वनी उपाध्याय कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले लाते हैं जो पार्टी के लाइन से मेल नहीं खाती. वो वकील के दौर पर देशहित में ऐसे मामले उठाते हैं. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सू्र्यकांत ने तमिलनाडु सरकार के वकील गोपाल सुब्रमण्यम को सुनाया कि अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, मुफ्त साइकिल और मुफ्त बिजली मिलेगी, तो काम कौन करेगा? इससे देश में 'परजीवी' (parasites) की संस्कृति पनप रही है. अंधाधुंध मुफ्त सुविधाएं देने से देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को भारी नुकसान होगा.

चीफ जस्टिस ने चिंता जताई कि ज्यादातर राज्य राजस्व घाटे यानी Revenue Deficit में हैं, फिर भी विकास की बजाय मुफ्त योजनाओं पर पैसा लुटा रहे हैं. सक्षम और अक्षम के बीच फर्क किए बिना सबको मुफ्त लाभ देना लोक कल्याण नहीं, बल्कि तुष्टीकरण है. ये हैरानी भी जताई कि चुनाव से ठीक पहले ही कैश ट्रांसफर जैसी स्कीमें अचानक क्यों प्रकट होती हैं? चीफ जस्टिस की बेंच ये सब केवल कहा है. फिलहाल कोई फाइनल ऑर्डर नहीं सुनाया लेकिन मार्च में डिटेल सुनवाई होगी.

2013 के फैसले से बढ़ा ‘रेवड़ी कल्चर’, अब पुनर्विचार की तैयारी

रेवड़ी कल्चर, फ्रीबीज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहली बार लड़ाई नहीं जा रही. ये मामला तमिलनाडु से शुरू होकर फिर तमिलनाडु पर आ पहुंचा. 2013 में DMK और AIADMK ने चुनाव के दौरान मुफ्त रंगीन टीवी, मिक्सर-ग्राइंडर और लैपटॉप बांटने के वादे किए गए थे. वकील सुब्रमण्यम बालाजी ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि ये टैक्सपेयर्स के पैसे का दुरुपयोग है और चुनाव जीतने के लिए 'रिश्वत' जैसा है. तब सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच ने फैसला सुनाया था कि पार्टियों के मेनिफेस्टो में किए गए वादे भ्रष्ट आचरण की कैटेगरी में नहीं आते. उसी फैसले के बाद पूरे देश में मुफ्त रेवड़ियों का चलन तेजी से बढ़ा. पार्टियों को कानूनी कवच मिल गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2022 में माना कि 2013 के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है, इसलिए मामला तीन न्यायाधीशों की बेंच के पास भेजा गया. हालांकि इस बार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड कड़ा दिख रहा है. CJI सूर्यकांत की बेंच ने साफ कर दिया कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है. सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर एक 'विशेषज्ञ समिति' (Expert Body) बनाने पर विचार कर रहा है, जो ये तय करेगी कि 'कल्याण' और 'मुफ्तखोरी' के बीच की कानूनी सीमा क्या होनी चाहिए.

केंद्र सरकार का विरोध और बिजली कंपनियों के कर्ज पर चिंता

अब तमिलनाडु फिर से चर्चा में है क्योंकि राज्य की बिजली कंपनी तमिलनाडु पावर डिस्ट्रिब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड भारी घाटे में है, फिर भी राज्य में मुफ्त बिजली की योजनाएं जारी हैं. तमिलनाडु सरकार ने कहा कि ये 'मुफ्त उपहार' नहीं, बल्कि 'सामाजिक कल्याण' (Welfare) हैं. मुफ्त बस यात्रा या बिजली देने से गरीब परिवारों की बचत बढ़ती है, जिससे वो अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कर पाते हैं. जो लोग मुफ्त सुविधाएं पाते हैं, वे आर्थिक रूप से सशक्त होकर टैक्स पेयर बनते हैं, जिससे राज्य का ही भला होता है. इसे 'रेवड़ी' कहना अपमानजनक है. कोर्ट ने कहा कि जब राज्य की बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMs) हजारों करोड़ के कर्ज में डूबी हों, तब भी मुफ्त बिजली (Free Electricity) देना आर्थिक रूप से आत्मघाती है.

केंद्र सरकार ने मुफ्त बिजली देने का विरोध करते हुए तमिलनाडु की बिजली कंपनी का डेटा पेश कर दिया. कहा कि कुल कर्ज का बोझ ₹1.5 लाख करोड़ से भी अधिक हो गया है. फिर भी मुफ्त बिजली देना गैर-जिम्मेदाराना और बिजली संकट का कारण बन सकता है.

चुनाव आयोग की सीमित शक्तियां और फ्रीबीज पर नियंत्रण की चुनौती

क्या चुनाव आयोग सो रहा है? नहीं, लेकिन बेबस नियमों से उसके हाथ बंधे हैं. आदर्श चुनाव आचार संहिता (MCC) के तहत पार्टियों को केवल ये बताना होता है कि वो अपने वादों के लिए पैसा कहां से लाएंगी. चुनाव आयोग के पास किसी भी पार्टी को मुफ्त वादे करने से रोकने या उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करने की शक्ति नहीं है. वैसे भी पार्टियां तो कुछ देती नहीं है. जो देती हैं चुनाव से पहले जनता के कल्याण के लिए सरकारें देती हैं. सरकारी लेन-देन के मामले में चुनाव आयोग बेबस है.

बिहार से महाराष्ट्र तक कैश योजनाओं और चुनावी जीत का समीकरण

देखिए उन राज्यों को जहां चुनाव से ठीक पहले पैसों की बरसात हुई. बिहार विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 10,000 रुपये का डायरेक्ट कैश ट्रांसफर चर्चा और विवादों में रहा. जन सुराज पार्टी ने इसे घूस बताते हुए चुनाव बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी लेकिन कोर्ट ने सुनवाई से मना करते हुए पटना हाईकोर्ट जाने के लिए कह दिया. नीतीश सरकार ने महिलाओं को 10-10 हजार दिए और प्रचंड बहुमत से जीत गए. ऐसे ही महाराष्ट्र और झारखंड में भी बीजेपी और जेएमएम सरकारों ने वापसी कर ली महिलाओं को कैश देकर.

 

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