वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बताए Gen Z आंदोलन के वो 5 बड़े सबक, जिसने बदल दी देश की राजनीति !

न्यूज तक डेस्क

26 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 26 2026 12:34 PM)

युवा आंदोलन की सबसे खास बात ये थी कि इसका चेहरा कोई एक बड़ा नेता नहीं था. जगह जगह-जगह से युवा खुद आगे आए. छात्रों और वालंटियर्स ने मिलकर प्रदर्शन संभाले, मीडिया से बात की और अपनी मांग रखी.

रील्स बनाने वाली पीढ़ी ने पलटी बाजी
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लेखक- राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं है. बल्कि ये पहला मौका है जब मोदी सरकार को किसी छात्र और युवा आंदोलन के दबाव में राजनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा है. हालांकि इससे पहले भी किसान आंदोलन के दौरान सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लिए थे, लेकिन इस फैसले को लेने के लिए उन्हें एक साल से भी ज्यादा का समय लग गया था. 

इस बार फैसला बहुत तेजी से और व्यक्तिगत स्तर पर लिया गया. एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री, जिन्हें सत्ता का पूरा समर्थन हासिल था, उन्हें जनआक्रोश से बचाया नहीं जा सका. पेपर लीक को लेकर छात्रों ने जो आंदोलन किया था उससे भारतीय राजनीति और लोकतंत्र को लेकर 5 बड़े सबक मिलते हैं:

1. भारत के युवाओं की ताकत को कभी कम न समझें

सालों से लोगों को लगता था कि भारत के युवा राजनीति से दूर रहते हैं, दिन भर फोन में घुसे रहते हैं और रील्स देखने में मस्त रहते हैं. लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया. मजे की बात ये है कि जिस सोशल मीडिया को लोग समय की बर्बादी कहते थे वही आंदोलन को खड़ा करने का सबसे बड़ा हथियार बन गया. इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स, व्हाट्सएप ग्रुप्स और यूट्यूब लाइव के जरिए बातें इतनी तेजी से फैलीं कि कोई राजनीतिक पार्टी भी ऐसा नहीं कर सकती.

इस आंदोलन को कोई पुराने नेता नहीं चला रहे थे. इसे चला रहे थे वे आम युवा, जिनका भविष्य बार-बार पेपर लीक और सरकारी कमियों की वजह से खराब हो रहा था. ये कोई वोट मांगने वाले नेता नहीं थे, बल्कि व्यवस्था से सवाल पूछते आम नागरिक थे. इनका कोई बड़ा चेहरा न होना ही इनकी सबसे बड़ी ताकत बनी. न तो इन्हें अपना राजनीतिक करियर बचाना था न किसी पार्टी के बड़े नेता को खुश करना था. वे इस निडरता से बोल रहे थे क्योंकि उन्हें लगा कि अब खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. जिससे सरकार को ये सबक लेना चाहिए कि युवाओं को नजरअंदाज न करें, खासकर तब जब उनका दबा हुआ गुस्सा एक साथ बाहर आ जाए. 

2. पढ़ाई और परीक्षाओं का संकट अब राजनीतिक मुद्दा बन चुका है

सालों से पेपर लीक, रिजल्ट में देरी, कोचिंग सेंटरों की लूट और पढ़ाई के भारी खर्च को छोटी-मोटी घटनाएं मानकर टाल दिया जाता था. छात्र थोड़ा विरोध करते थे और फिर अगली परीक्षा की तैयारी में लग जाते थे. लेकिन इस बार पानी सिर से ऊपर चला गया था. इस आंदोलन ने देश भर के छात्रों के दर्द को एक बड़ी आवाज दी कि भारत का एजुकेशन सिस्टम करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों का भरोसा तोड़ रहा है. पहली बार ऐसा हुआ है जब पढ़ाई और परीक्षाओं का गिरता स्तर एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा बन गया है जो चुनाव में असर डाल सकता है. सरकारें अक्सर देश के 'युवाओं की ताकत' का ढिंढोरा पीटती हैं, लेकिन अब उन्हें युवाओं की उस 'घबराहट' को भी देखना होगा. जहां लाखों होनहार बच्चे कुछ ही नौकरियों के पीछे भागने को मजबूर हैं.

3. सरकारें हमेशा सच से मुंह नहीं मोड़ सकतीं

जब भी कोई विरोध प्रदर्शन होता है मोदी सरकार का एक तय तरीका रहा है. जो है सवाल उठाने वालों को खारिज कर दो, उनके इरादों पर शक करो, साजिश का नाम दे दो या फिर इंतजार करो कि बात पुरानी हो जाए. लेकिन इस बार यह तरीका फेल हो गया. प्रदर्शनकारियों को राजनीति से प्रेरित या देशविरोधी बताने की कोशिशें टिक नहीं पाईं, क्योंकि मुद्दा बहुत सच्चा था. भारत के लगभग हर घर में कोई न कोई कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी कर रहा है. हर मां-बाप उस दर्द को समझते हैं जो बच्चे की गलती से नहीं बल्कि सिस्टम की नाकामी से मिलता है.सरकारें अपनी गलती मानकर भरोसा जीतती हैं, यह नाटक करके नहीं कि सब कुछ ठीक है. जब तक सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई, तब तक लोगों का भरोसा काफी हद तक टूट चुका था. 

4. आंदोलन चलाने के लिए किसी एक बड़े नेता की जरूरत नहीं

इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि इसका कोई एक बड़ा नेता नहीं था. इसकी जगह जगह-जगह से युवा खुद आगे आए. छात्रों और वालंटियर्स ने मिलकर प्रदर्शन संभाले, सबूत जुटाए, मीडिया से बात की और मंत्रियों से बातचीत की. यह पुराने जमाने के उन आंदोलनों जैसा नहीं था जो किसी एक मशहूर नेता के भरोसे चलते थे. आज की डिजिटल पीढ़ी मिल-जुलकर काम करना जानती है. उनके लिए ताकत किसी पद या उम्र से नहीं, बल्कि सही काम और समझ से आती है. पुरानी पार्टियां जो आज भी चापलूसी और एक नेता के इर्द-गिर्द घूमती हैं, उन्हें यह बदलाव समझना होगा.

5. लोकतंत्र आज भी काम करता है

पिछले कुछ सालों में कई लोगों को लगने लगा था कि प्रदर्शन करने से कुछ नहीं होता, सरकारी तंत्र सुनता नहीं है और सरकारें लोगों के गुस्से को आसानी से झेल जाती हैं. इस आंदोलन ने नई उम्मीद दी है. शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से डटे रहने से सत्ता को झुकना ही पड़ा. यह एक दिन में नहीं हुआ. इसके लिए काफी हिम्मत, तैयारी और उकसावे के बावजूद सब्र की जरूरत थी. सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब खुद प्रधानमंत्री को देर रात वीडियो संदेश के जरिए देश के सामने आना पड़ा. यह इस बात का सबूत था कि नीचे से उठ रही आवाजों को अब दबाया नहीं जा सकता. 

सिर्फ एक इस्तीफा काफी नहीं

यह साफ है कि सिर्फ एक मंत्री के हटने से पढ़ाई का पूरा सिस्टम रातों-रात ठीक नहीं होगा. धर्मेंद्र प्रधान के जाने भर से पेपर लीक बंद नहीं हो जाएंगे. असली परीक्षा तो तब होगी जब व्यवस्था में अंदर तक सुधार किए जाएंगे. फिर भी, लोकतंत्र में ऐसे फैसलों के बड़े मायने होते हैं। ये आम लोगों को याद दिलाते हैं कि सरकार को जवाब देना ही पड़ेगा. इस आंदोलन की सबसे बड़ी बात धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं है. इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि हजारों युवाओं को यह समझ आ गया है कि अगर वे एक साथ आ जाएं तो उनकी आवाज में बहुत ताकत है. 

नेताओं के लिए यह एक चेतावनी भी है और एक मौका भी. चेतावनी यह है कि युवाओं को बेवकूफ या नासमझ समझने की गलती न करें. उनका गुस्सा बढ़ने से पहले उनकी बात सुनें. मौका ये है कि देश के युवा कोई बहुत बड़ी चीज नहीं मांग रहे. वे सिर्फ बराबरी, सही सिस्टम और इज्जत मांग रहे हैं. वे ऐसी परीक्षाएं चाहते हैं जिन पर भरोसा हो, ऐसे कॉलेज-संस्थान चाहते हैं जो सही काम करें और ऐसी सरकार चाहते हैं जो उन्हें सिर्फ आंकड़ा न समझे. 

इस Gen Z आंदोलन ने दिखा दिया है कि भले ही देश का एक हिस्सा चमक रहा हो, लेकिन एक दूसरा भारत भी है जो परेशान है, उदास है और अब शांत बैठने को तैयार नहीं है. हर सरकार को अपने भाषणों से बाहर निकलकर इस 'दूसरे भारत' की बात सुननी ही होगी. चलते-चलते एक बात ये भी ध्यान रखने की है कि अब कभी किसी इंस्टाग्राम रील को हल्का मत समझिएगा. इस दौर में राजनीति सिर्फ पार्टियों के दफ्तरों या टीवी चैनलों से शुरू नहीं होती. कभी-कभी इसकी शुरुआत एक कॉकरोच की 30-सेकंड की रील से होती है और खत्म देश की पूरी राजनीति को हिलाकर होती है. 

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