General Naravane book controversy: जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (General MM Naravane) भारतीय सेना के वो जाबांज सिपाही रहे हैं, जिन्होंने मुश्किल दौर में भारतीय फौज की कमान संभाली. उनके करियर और जीवन की कहानी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है. जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की कहानी एक 'सिपाही' से 'रणनीतिकार' और अब एक 'विवादित लेखक' बनने तक का सफर है. जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अनकही कहानियों और उनकी किताब 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) पर छिड़े ताज़ा सियासी संग्राम ने पीएम मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और राहुल गांधी को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. इसीलिए मनोज मुकुंद नरवणे बने हैं हमारे शो का चर्चित चेहरा.
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जनरल नरवणे की आत्मकथा 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' के शुरुआती अध्यायों में उन्होंने अपने परिवार के बारे में दिल छू लेने वाले खुलासे किए हैं. इसका मुख्य सोर्स PTI (Press Trust of India) और The Hindu की रिपोर्ट्स हैं, जिन्होंने किताब के प्रीव्यू अंशों को कवर किया था.
इसलिए लिखी थी किताब
उन्होंने भावुक होकर लिखा है कि जब वो फील्ड पोस्टिंग पर थे तब उनकी बेटियों ने कई जन्मदिन और स्कूल के एनुअल डे बिना पिता के मनाए. उन्होंने किताब अपनी बेटियों को ये बताने के लिए भी लिखी कि वो उस दौरान कहां थे और देश के लिए क्या कर रहे थे. बेटियों के करियर सलेक्शन पर जनरल ने लिखा है कि जब उनकी बड़ी बेटी ईशा ने कथक को अपना करियर बनाने का फैसला किया तो उन्होंने उसे पूरी छूट दी. फौज में हम आदेश देते हैं, लेकिन घर में मेरी बेटियां ही मेरी बॉस हैं.
पिता ने अनुशासन, मां ने सीखाई संवेदनशीलता
जनरल नरवणे ने लिखा कि उनके पिता विंग कमांडर मुकुंद नरवणे ने उन्हें अनुशासन सिखाया. मां सुधा नरवणे ने संवेदनशीलता दी. मां के राइटर होने के कारण घर में हमेशा साहित्यिक चर्चाएं होती थीं. पत्नी के बारे में नरवणे ने लिखा कि कैसे वीना ने अपनी खुद की करियर आकांक्षाओं को पीछे रखकर 40 साल तक उनके साथ अलग-अलग सैन्य चौकियों पर जीवन बिताया.
बचपन में प्यार फिर शादी
जनरल मनोज मुकुंद नरवणे और उनकी पत्नी वीना नरवणे की मुलाकात की कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म की तरह 'बचपन के प्यार' वाली है. जनरल एम.एम. नरवणे और उनकी पत्नी वीना नरवणे की प्रेम कहानी उनके स्कूली दिनों से जुड़ी हुई है. जनरल नरवणे और वीना नरवणे बचपन के दोस्त रहे हैं. वे पुणे के एक ही स्कूल ज्ञान प्रबोधिनी में साथ पढ़े थे, जहां से उनकी दोस्ती की शुरुआत हुई. जनरल नरवणे 1980 में सेना में शामिल हुए थे. वीना नरवणे टीचर और राइटर बनकर जनरल के 42 साल के लंबे आर्मी करियर के दौरान हर कदम पर साथ देती रहीं.
सेना चीफ की पत्नी के रूप में उन्होंने आर्मी वाइफ्स वेलफेयर एसोसिएशन' (AWWA) को लीड किया. नरवणे परिवार में दो बेटियां हैं. दोनों ने सेना के बजाय अपनी पसंद की क्रिएटिव फील्ड चुने. बड़ी बेटी ईशा नरवणे ने बंदूक की बजाय घुंघरू चुनकर कथक डांसर बनी. अमलेका नरवणे कॉर्पोरेट सेक्टर में हैं. नरवणे के परिवार के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक है नहीं.
किताब को लेकर कही थी ये बात
किताब लिखने के पीछे जनरल नरवणे की नीयत जो भी रही हो लेकिन अब सरकार के निशाने पर हैं. विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के हीरो बनाने से उनके लिए चीजें सामान्य नहीं रहीं. किताब के पब्लिश होने में देरी को लेकर सवाल पर पिछले साल अक्टूबर में जनरल नरवणे ने जवाब दिया था कि मुझे लगता है कि यह मैच्योर हो रही है. पुरानी शराब की तरह. जितनी देर लगेगी, यह ज्यादा से ज्यादा विंटेज होगी. ज्यादा कीमत वाली.
इसलिए रुका किताब का प्रकाशन
अप्रैल 2024 में किताब प्रकाशित होनी थी. दिसंबर 2023 में इसके कुछ अंश न्यूज एजेंसी पीटीआई ने छापे थे. लेकिन रक्षा मंत्रालय ने इसकी समीक्षा करने की बात कहकर प्रकाशित होने से रूकवा दिया. मार्केटिंग टेक्सट में लिखा था कि कैसे एक युवा अधिकारी के तौर पर चीनियों से अपनी पहली मुलाकात से शुरुआत की. फिर गलवान में कैसे निपटे. इसमें उनके चार दशक के आर्मी करियर का जिक्र है.
मराठी परिवार में जन्में, पिता एयरफोर्स में
मनोज मुकुंद नरवणे का जन्म 1960 में महाराष्ट्र के पुणे के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ. शायद तभी ये तय हो गया कि एक दिन मनोज मुकुंद को भी देश का सिपाही बनना है. रग-रग में देशभक्ति थी. पिता मुकुंद नरवणे इंडियन एयरफोर्स में विंग कमांडर थे. मां सुधा नरवणे ने राइटर और ऑल इंडिया रेडियो में काम किया. सिपाही का बेटा सिपाही बनेगा-अक्सर कही जाने वाली ये बात नरवणे खानदान के जोश, विरासत और राष्ट्रसेवा की भावना को दर्शाता है. उन्होंने इस बात को हकीकत बनाया कि देश के सिपाही का बेटा सिपाही बनता है.
कोर्स के तीन स्टूडेंट बने तीनों सेनाओं के चीफ
पुणे के ज्ञान प्रबोधिनी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने एनडीए के लिए ट्राई किया और सलेक्शन हुआ भी. उनके बैच ने इंडियन डिफेंस ने जो रिकॉर्ड बनाया वो शायद ही टूट पाए. उनके 56वें कोर्स के तीन स्टूडेंट आगे चलकर आर्मी, नेवी, एयरफोर्स चीफ बने. इस बैच की सबसे बड़ी कहानी बनी कि जनरल नरवणे के साथ उनके बैचमेट रहे करमबीर सिंह नेवी चीफ और आर.के.एस. भदौरिया एयरफोर्स चीफ एक ही समय में बने.
सिख लाइट इंफैंट्री में हुए कमीशन
एम एम नरवणे को जून 1980 में सिख लाइट इंफैंट्री की 7वीं बटालियन में कमीशन मिला. बाद में उन्होंने जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स की दूसरी बटालियन और 106 इंफैंट्री ब्रिगेड की कमान संभाली. वे असम राइफल्स की भी कमान संभाल चुके हैं और कश्मीर के साथ पूर्वोत्तर में भी आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों को लीड कर चुके हैं.
NDA के बाद जारी रखी पढ़ाई
NDA के बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. Indian Military Academy देहरादून में ट्रेनिंग पूरी की. चेन्नई यूनिवर्सिटीस से डिफेंस स्टडीज में मास्टर डिग्री ली. इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट में एम.फिल किया. फिर डिफेंस एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज में पीएचडी करके डॉक्टोरेट की उपाधि हासिल की. स्कूल के दिनों से शुरू हुआ पेंटिंग का शौक आज तक बरकरार है.
भारतीय सेना के 27वें प्रमुख रहे
जनरल नरवणे देश के जाबांज सिपाही रहे जिसका शानदार करियर रहा और किसी विवाद में नहीं फंसे. इसीलिए एक दिन वो भी आया जब नरवणे एक दिन जनरल बनकर चीफ ऑफ स्टाफ बने. ये सब हुआ मोदी सरकार के कार्यकाल में. अब जो कांड पर कांड हो रहे हैं वो भी सब मोदी कार्यकाल में हो रहे हैं. जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भारतीय सेना के 27वें प्रमुख रहे. उन्होंने 31 दिसंबर, 2019 को जनरल बिपिन रावत से चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का कार्यभार लिया था.
सर्विस में रहते हुए जनरल नरवणे मोदी सरकार के गुड बुक्स में रहे. रिटायर होने के बाद भी सरकार की ही साइड बात बोलते रहे. उन्होंने कभी राहुल की इस थ्योरी को नहीं माना कि चीन भारत की जमीन हड़प रहा है और सरकार कमजोर दिख रही है.
रिटायर के बाद थामी कलम
30 अप्रैल 2022 को रिटायर होने के बाद से चीजें खराब होने लगी. नरवणे के लिए सरकार, सरकार के लिए नरवणे-सब बदलने लगे. जनरल नरवणे ने बंदूक छोड़कर कलम थाम ली. रिटायर होने के बाद किताब लिखी फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी. नियमों का पालन करते हुए सरकार को स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए दी और वहीं से उनकी किताब विवादित होती हुए सरकारी सेंसरशिप की शिकार हुई. आज तक किताब छपी नहीं. जब संसद में राहुल गांधी ने कारवां मैगजीन में छपे उनकी अप्रकाशित छपी किताब के अंश पढ़कर ये साबित करने की कोशिश की कि सरकार चीन का मुकाबला करने से डरती है तो बवाल मचा है. न नरवणे की किताब छपी, न राहुल गांधी की संसद वाली स्पीच पूरी हो सकी. ये जो नया हंगामा बरपा है उस पर कुछ नहीं बोल रहे जनरल मनोज मुकुंद नरवणे.
क्या 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' बाजार में आएगी?
अब यह सवाल है कि क्या 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' कभी बाजार में आएगी? या फिर ये सियासी खींचतान में कहीं दब कर रह जाएगी? इन सारे सवालों के जवाब सरकार के अलावा किसी को नहीं मालूम. राहुल गांधी इसे मोदी सरकार की कमजोरी का सबूत बता रहे हैं, जबकि बीजेपी ने देश विरोधी किताब का टैग लगा दिया. जनरल एम.एम. नरवणे ने अपनी आत्मकथा के अलावा एक फिक्शन (काल्पनिक) किताब भी लिखी है, जिसका नाम "द छावनी कॉन्स्पिरसी" (The Cantonment Conspiracy: A Military Thriller) है. यह एक सैन्य थ्रिलर उपन्यास है जो भारतीय सेना के जीवन पर आधारित है. जिसको लेकर कोई विवाद नहीं हुआ.
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