साल 2016... हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी का एक कमरा और रोहित वेमुला का वो आखिरी खत, जिसने देश को हिलाकर रख दिया था . उस वक्त देश के सामने ये कड़वा सच सामने आया था कि देश के प्रीमियर संस्थानों के पीछे कितना गहरा जातिवाद चलता है . आज ठीक 10 साल बाद, 2026 में क्या बदला है? क्या IIT बॉम्बे का 20 साल का छात्र साहिल वाकोडे भी उसी की भेंट चढ़ गया? सवाल बड़ा है क्योंकि यहां लड़ाई सिर्फ एक परीक्षा में ChatGPT से नकल करने के आरोप की नहीं है, बल्कि उस गहरे सामाजिक अलगाव की है जो आज भी हाशिए से आने वाले होनहार बच्चों को निगल रहा है .
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साहिल वाकोडे... ये वो नाम है जो इस वक्त देश की राजनीति, सोशल मीडिया और एजुकेशन सिस्टम के सेंटर में है. एक तरफ है एआई टेक्नोलॉजी यानी ChatGPT से नकल करने का आरोप, तो दूसरी तरफ है जातिगत भेदभाव का गहरा चक्रव्यूह. साहिल रवींद्र वाकोडे अब जिंदा नहीं ये देखने के लिए कि उनके बारे में क्या कुछ कहा-लिखा जा रहा है. इस दुनिया से थक-हारकर निराश होने के बाद चर्चित चेहरा बने साहिल वाकोडे.
मां एक शिक्षिका और पिता बैंक में काम करते हैं
साहिल वाकोडे का जन्म महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के शेलू ब्राह्मणवाडा गांव में हुआ. मां एक शिक्षिका और पिता बैंक में काम करते हैं. दलित समुदाय का साहिल मिडिल क्लास फैमिली का बेटा था जिसके सामने यही एक मकसद था कि कुछ करना है तो पढ़ना होगा और बहुत पढ़ना होगा. साहिल ने सचमुच अपने और परिवार की तकदीर बदलने के लिए कड़ी मेहनत की. साहिल ने 10वीं में 90% अंक और 12वीं में 76% अंक हासिल किए थे. स्कूल के दिनों में मैथ्स ओलंपियाड में जिला स्तर पर रैंक-1 हासिल कर चुका था . देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली JEE Advanced परीक्षा में साहिल ने ऑल इंडिया रैंक 614 हासिल की थी . एक दिन ऐसा आया जब साहिल ने इंजीनियरिंग की सबसे कठिन परीक्षा पास करके IIT बॉम्बे में एडमिशन ले लिया. साहिल ने अपने पहले ही साल में 8.5 GPA जैसा बेहद शानदार स्कोर हासिल किया था. आईआईटी बॉम्बे जैसे प्रीमियम संस्थान में 8.5 GPA लाना किसी भी छात्र के लिए बेहद उत्कृष्ट माना जाता है और यह बिना गहरी समझ और कड़ी मेहनत के मुमकिन नहीं है.
एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक सेकेंड ईयर तक सब ठीक चल रहा था साहिल का. साहिल ने जो कुछ हासिल किया वो मेहनत से मिला लेकिन कहीं न कहीं देश के प्रीमियर संस्थानों में आते ही इलीट प्रेशर और अपनी फैमिली बैकग्राउंड को छुपाने या साबित करने का जो अनकहा दवाब बच्चों पर होता है, साहिल भी उसी अंतर्द्वंद्व में फंस गए लेकिन उसकी इतनी खौफनाक परिणति होगी, ये कहां सोचा था.
मिड-सेमेस्टर का पेपर चल रहा था
18 सितंबर की दोपहर 12:30 से 12:45 के बीच, IIT बॉम्बे के एनर्जी साइंस विभाग के परीक्षा हॉल में मिड-सेमेस्टर का पेपर चल रहा था. आखिरी के 15 मिनट बचे थे, तभी अचानक इनविजिलेटर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला की नज़र साहिल पर पड़ी. वहीं से साहिल की जिंदगी बदलनी शुरू हुई और वहीं से शुरू हुई आईआईटी बॉम्बे के भीतर जंग की. आईआईटी ने दावा कर दिया कि साहिल को ChatGPT से नकल करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. प्रोफेसर उसे तुरंत परीक्षा हॉल से बाहर ले गए. इसके बाद शाम तक खबर आई कि साहिल वाकोडे नहीं रहे.
साहिल वाकोडे की रहस्यमयी मौत ने IIT बॉम्बे कैंपस को एक ऐसे राजनीतिक और सामाजिक अखाड़े में तब्दील कर दिया है, जहाँ नैरेटिव की एक बेहद महीन जंग छिड़ गई. विवाद की शुरुआत तब हुई जब IIT बॉम्बे ने बयान जारी करके ये साबित करने की कोशिश की कि साहिल ने परीक्षा में ChatGPT से नकल की थी और पकड़े जाने के 'डर या ग्लानि' में उसने जान दे दी. लेकिन, असली धमाका तब हुआ जब साहिल के परिवार ने इस 'नकल थ्योरी' को सिरे से खारिज करते हुए इसे Institutional Murder करार दे दिया.
साहिल की जिंदगी खत्म हो गई लेकिन ढेर सारे सवाल रहस्यों के साथ जिंदा है. साहिल के पिता रविंद्र वाकोडे बेटे के इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं. साहिल का परिवार का प्रोफाइल किसी 'कमजोर' पृष्ठभूमि का नहीं, बल्कि हक के लिए लड़ने वाले जागरूक नागरिकों का है, इसलिए उन्होंने सीधे तौर पर CBI जांच की मांग उठाई है.
आरोपों के सेंटर में आ गए प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला जिन्होंने साहिल को एक्जाम हॉल से निकाला था. पिता का आरोप है कि साहिल को पिछले 3 महीनों से कैंपस में जातिगत रूप से टारगेट किया जा रहा था. उनका कहना है कि परीक्षा हॉल में पकड़े जाने के बाद प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला ने न सिर्फ उसे सबके सामने अपमानित किया, बल्कि उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसका करियर पूरी तरह बर्बाद करने और सस्पेंड करने की धमकी दी थी. पिता की इसी पुरजोर कानूनी लड़ाई के कारण पुलिस को प्रोफेसर के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत बेहद गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करनी पड़ी है.
प्रशासनिक डीन पद से हटा दिया गया
प्रोफेसर डूला को छात्रों के भारी विरोध के बाद प्रशासनिक डीन पद से हटा दिया गया लेकिन, IIT बॉम्बे, दिल्ली और मद्रास के फैकल्टी फोरम प्रोफेसर के समर्थन में उतर आए हैं. उनका कहना है कि प्रोफेसर सिर्फ Academic Misconduct के खिलाफ अपना फर्ज निभा रहे थे और उनके ऊपर लगे जातिवाद के आरोप गलत हैं. डायरेक्टर शिरीष केदारे इसलिए जोरदार विरोध झेल रहे हैं क्योंकि शुरुआत में उनके ऑफिस ने साहिल को डिफैम करने वाला एक बयान जारी किया था, जिसके बाद मचे बवाल पर डायरेक्टर को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी और छात्रों की 18 सूत्रीय मांगों पर दस्तखत करते हुए इस्तीफा देना पड़ा.
साहिल की मौत के बाद कैंपस छावनी में बदल हुआ है. मामला मुंबई क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया है. CJP) के चीफ अभिजीत दिपके ने हॉस्टल में जाकर छात्रों और पीड़ित परिवार से मुलाकात की. यूपी के दलित नेता चंद्रशेखर आजाद भी घमासान में कूद चुके हैं. नकल की कहानी पीछे छूट रही है. दलित होने के कारण जातीय प्रताड़ना का आरोप ही साहिल की मौत की हेडलाइन बनता जा रहा है.
इस पूरे विवाद में बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि जो राहुल गांधी देश भर में 'जातिगत जनगणना' और 'दलित अधिकारों' को लेकर मुखर रहते हैं, वे इस मामले पर चुप क्यों हैं? क्या राहुल गांधी की यह खामोशी एक सोची-समझी रणनीति है? मामला देश के सबसे बड़े 'मेरिट' वाले संस्थान आईआईटी से जुड़ा है, जहाँ नकल बनाम जाति की एक बेहद महीन और संवेदनशील जंग चल रही है. जब रोहित वेमुला ने जातीय भेदभाव से तंग आकर जान दी तब राहुल गाँधी ने उनके लिए लड़ाई आज तक लड़ रहे हैं. उनकी प्रेरणा से रोहित वेमुला एक्ट बना ताकि कैंपस में फिर किसी रोहित वेमुला को जातीय ताने से तंग आकर जान न देनी पड़ी.
साहिल की मौत के बाद भड़का जन-आक्रोश
साहिल वाकोडे की यह संदिग्ध मौत IIT बॉम्बे के इतिहास के सबसे काले और चर्चित दर्शन सोलंकी सुसाइड केस (2023) से सीधे जाकर जुड़ती है. ठीक तीन साल पहले, इसी कैंपस में प्रथम वर्ष के दलित छात्र दर्शन सोलंकी की हॉस्टल की इमारत से गिरकर मौत हो गई थी, जिसके बाद उनके परिवार ने भी संस्थान के भीतर गहरे जातिगत भेदभाव (Caste Discrimination) और अलगाव का आरोप लगाया था. साहिल की मौत के बाद भड़के जन-आक्रोश के बीच दर्शन सोलंकी के पिता रमेश सोलंकी खुद आईआईटी बॉम्बे के मेन गेट पर चल रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए.
साहिल जवान उम्र में दुनिया में जा चुका लेकिन उसकी मौत के बाद अलग ही तमाशा शुरू हो रही है. सवालों के घेरे में आईआईटी बॉम्बे मैनेजमेंट ने एक और बड़ा कांड किया. आनन-फानन में हॉस्टल के कमरों से सीलिंग फैन (छत के पंखे) हटाकर वॉल-माउंटेड (दीवार पर लगने वाले) पंखे लगाने की मुस्तैदी शुरू कर दी है. कैंपस पर आरोप है कि मानसिक दबाव, कड़े नियमों का बोझ और परीक्षा में एक गलती होते ही करियर तबाह करने की धमकियां देने का आरोप लेकिन प्रशासन को लगता है कि असली विलेन तो कमरे की छत पर लटका वो पंखा है.
प्रशासनिक संवेदनहीनता और सतही इलाज का यह कोई पहला मामला नहीं है; आईआईटी बॉम्बे का यह 'वॉल-फैन' फॉर्मूला सीधे तौर पर देश की कोचिंग कैपिटल कोटा (Kota) के उस विवादित और फ्लॉप मॉडल की याद दिलाता है. कुछ साल पहले जब कोटा में जेईई (JEE) और नीट (NEET) की तैयारी कर रहे छात्रों की आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़े, तो वहां के प्रशासन और कोटा हॉस्टल एसोसिएशन ने हॉस्टलों में 'स्प्रिंग-लोडेड एंटी-सुसाइड पंखे' और लोहे के पिंजरे (केजेस) लगाने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया था. उस वक्त भी देश भर में यह मजाक उड़ा था.
लेकिन आईआईटी जैसे कैंपस ये समझने को तैयार नहीं कि जब तक वह कैंपस के भीतर फैले जातिगत अलगाव, 'फेल' होने पर मिलने वाली सामाजिक जिल्लत और 'पब्लिक शेमिंग' के खौफनाक ढर्रे को नहीं बदलेगा, तब तक सिर्फ पंखे बदलने से नौजवानों की जिंदगी नहीं बचाई जा सकती.
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